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महाशिवरात्रि: कृष्ण की लीला भूमि पर गोपी रूप में विराजमान हैं भगवान भोलेनाथ, हर दिन होता है शृंगार
Fri, 21 Feb 2020 12:02 AM IST
मुकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा(वृंदावन)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा(वृंदावन)
Published by: मुकेश कुमार
Updated Fri, 21 Feb 2020 12:02 AM IST
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गोपेश्वर महादेव
- फोटो : Amar Ujala
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भगवान श्रीकृष्ण की लीला स्थली कहे जाने वाले वृंदावन में महादेव गोपी के रूप में विराजमान हैं। यहां उनका प्रतिदिन गोपी के रूप में ही शृंगार होता है। उन्हें नथ सहित 16 शृंगार निवेदित किया जाता है।
शिव के इस गोपी स्वरूप के दर्शन के लिए ब्रज ही नहीं दूरदराज से भी भक्त आते हैं। वृंदावन में तो उन्हें कोतवाल की संज्ञा दी जाती है। महाशिवरात्रि पर गोपेश्वर महादेव मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
कहते हैं कि श्रीकृष्ण के महारास के दर्शनों की लालसा में भोले नाथ ने वृंदावन में गोपी रूप धारण कर लिया था। शिव का यह दुर्लभ स्वरूप वृंदावन के अलावा किसी और स्थान पर नहीं मिलता है।
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शिव के इस गोपी स्वरूप के दर्शन के लिए ब्रज ही नहीं दूरदराज से भी भक्त आते हैं। वृंदावन में तो उन्हें कोतवाल की संज्ञा दी जाती है। महाशिवरात्रि पर गोपेश्वर महादेव मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
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कहते हैं कि श्रीकृष्ण के महारास के दर्शनों की लालसा में भोले नाथ ने वृंदावन में गोपी रूप धारण कर लिया था। शिव का यह दुर्लभ स्वरूप वृंदावन के अलावा किसी और स्थान पर नहीं मिलता है।
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इसलिए धारण किया था गोपी रूप
श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि जब रास करने की अभिलाषा से श्रीकृष्ण ने वेणु वादन आरंभ किया तो उसके स्वर को सुन भोलेनाथ भी प्रभु के रास दर्शन की अभिलाषा में वृंदावन आ पहुंचे।
सखियों ने उन्हें रोकते हुए कहा यहां पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। रास में प्रवेश का अधिकार केवल गोपियों को हैं। यह सुनकर भोलेनाथ ने तत्काल गोपी वेश धारण किया और बन गए गोपेश्वर महादेव।
पौराणिक मान्यता है कि श्रीकृष्ण की इस पावन लीला के बाद उनके प्रपौत्र वज्रनाभ ने इन्हें खोजकर वंशीवट के समीप स्थापित किया। तभी से गोपेश्वर महादेव यहां भक्तों को दर्शन लाभ दे रहे हैं।
वृंदावन शोध संस्थान के शोध एवं प्रकाशन अधिकारी डॉ. राजेश शर्मा ने बताया कि चाचा हितवृंदावनदास ने इसका उल्लेख अपने पद नाम विदित गोपेश्वर जिनकौ, ते वृंदा कानन कुतवार में भी किया है।
सखियों ने उन्हें रोकते हुए कहा यहां पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। रास में प्रवेश का अधिकार केवल गोपियों को हैं। यह सुनकर भोलेनाथ ने तत्काल गोपी वेश धारण किया और बन गए गोपेश्वर महादेव।
पौराणिक मान्यता है कि श्रीकृष्ण की इस पावन लीला के बाद उनके प्रपौत्र वज्रनाभ ने इन्हें खोजकर वंशीवट के समीप स्थापित किया। तभी से गोपेश्वर महादेव यहां भक्तों को दर्शन लाभ दे रहे हैं।
वृंदावन शोध संस्थान के शोध एवं प्रकाशन अधिकारी डॉ. राजेश शर्मा ने बताया कि चाचा हितवृंदावनदास ने इसका उल्लेख अपने पद नाम विदित गोपेश्वर जिनकौ, ते वृंदा कानन कुतवार में भी किया है।