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55 साल पहले मिली जनकपुरी महोत्सव को भव्यता, इस बार 'माहिष्मती' जैसा बनेगा जनक महल
Wed, 28 Aug 2019 12:08 AM IST
मुकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: मुकेश कुमार
Updated Wed, 28 Aug 2019 12:08 AM IST
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जनकपुरी महोत्सव
- फोटो : अमर उजाला
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उत्तर भारत की ऐतिहासिक श्रीराम लीला और जनकपुरी की तैयारियां शुरू हो गई हैं। हर साल की तरह इस बार भी भव्य रूप से जनकपुरी महोत्सव मनाया जाएगा। इस बार जनकपुरी का महल फिल्म बाहुबली के माहिष्मती महल की तर्ज पर बनाने की तैयारी है।
जनकपुरी को यह भव्यता 55 साल पहले तब मिली, जब 1964 में पुराने शहर की गलियों, मोहल्लों से निकलकर जनकपुरी का आयोजन लोहामंडी, नौबस्ता में पहुंचा। तब नौबस्ता से लेकर लोहामंडी तक सजावट और फूलों की वर्षा ने जनकपुरी के आयोजन को भव्य बना दिया था।
जनकपुरी में तब साधारण तरीके से विवाह विधि विधान और विदाई रावतपाड़ा, बारह भाई गली, बेलनगंज, छत्ता बाजार, दरेसी, किनारी बाजार, सेठ गली समेत पुराने शहर के गली मोहल्लों में ही पूरी होती थी, लेकिन 1964 में नौबस्ता लोहामंडी से जनकपुरी को भव्य रूप देने की शुरुआत हुई।
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जनकपुरी को यह भव्यता 55 साल पहले तब मिली, जब 1964 में पुराने शहर की गलियों, मोहल्लों से निकलकर जनकपुरी का आयोजन लोहामंडी, नौबस्ता में पहुंचा। तब नौबस्ता से लेकर लोहामंडी तक सजावट और फूलों की वर्षा ने जनकपुरी के आयोजन को भव्य बना दिया था।
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जनकपुरी में तब साधारण तरीके से विवाह विधि विधान और विदाई रावतपाड़ा, बारह भाई गली, बेलनगंज, छत्ता बाजार, दरेसी, किनारी बाजार, सेठ गली समेत पुराने शहर के गली मोहल्लों में ही पूरी होती थी, लेकिन 1964 में नौबस्ता लोहामंडी से जनकपुरी को भव्य रूप देने की शुरुआत हुई।
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55 साल पहले पथवारी देवी मंदिर पर सजाई गई जनकपुरी
नौबस्ता के गोपेश्वर नाथ बगीची स्थित पथवारी देवी मंदिर पर 55 साल पहले जनकपुरी सजाई गई। उन दिनों की याद करते हुए पूर्व एमएलसी अनुराग शुक्ला बताते हैं कि इस जनकपुरी की खासियत ये रही कि जिन रामबाबू को राजा जनक बनाया गया, उनके कोई संतान नहीं थी। उन्हीं से जानकी का कन्यादान कराया गया। नौबस्ता के बाद अगले साल भारत-पाकिस्तान युद्ध की वजह से 1965 में जनकपुरी का आयोजन नहीं हुआ।
स्वरूपों के हाथियों को दी मखमल की झूल
नौबस्ता, लोहामंडी में जनकपुरी की जिम्मेदारी उठाने वाले संयोजक पं. शिवदत्त शुक्ला और उनकी टीम में शामिल डॉ. श्याम सिंह, बाबू गुलाब शंकर, घनश्याम दास, कपूर चंद सराफ, भजन लाल ने श्रीराम बरात का स्वागत नौबस्ता में किया था।
तब श्रीरामलीला कमेटी को स्वरूपों के हाथियों के लिए मखमल पर सुंदर कढ़ाई वाली झूल भेंट की गई थी। लाल और कत्थई रंग की यही झूल श्रीराम बरात में शोभायात्रा में हाथियों पर कई साल तक नजर आई, लेकिन बाद में हाथी की सवारी पर प्रतिबंध लग गया।
स्वरूपों के हाथियों को दी मखमल की झूल
नौबस्ता, लोहामंडी में जनकपुरी की जिम्मेदारी उठाने वाले संयोजक पं. शिवदत्त शुक्ला और उनकी टीम में शामिल डॉ. श्याम सिंह, बाबू गुलाब शंकर, घनश्याम दास, कपूर चंद सराफ, भजन लाल ने श्रीराम बरात का स्वागत नौबस्ता में किया था।
तब श्रीरामलीला कमेटी को स्वरूपों के हाथियों के लिए मखमल पर सुंदर कढ़ाई वाली झूल भेंट की गई थी। लाल और कत्थई रंग की यही झूल श्रीराम बरात में शोभायात्रा में हाथियों पर कई साल तक नजर आई, लेकिन बाद में हाथी की सवारी पर प्रतिबंध लग गया।
श्रीरामलीला कमेटी के महामंत्री श्रीभगवान अग्रवाल ने बताया कि जनकपुरी तो हमेशा बनी, पर भव्य रूप इसे कालोनियों में जाने पर ही मिला। पुराने शहर के हर मोहल्ले में ऐसे जनक जी बनते थे, जिनके कन्या नहीं थी। कन्यादान का सौभाग्य उन्हीं को मिलता था। नौबस्ता में यादगार जनकपुरी सजी थी, तभी से बाहर का रुख हुआ।
श्रीरामलीला कमेटी के उपाध्यक्ष अनुराध शुक्ला ने कहा कि मैंने पहली बार जनकपुरी का उल्लास, खुशियां, लोगों का जुड़ाव नौबस्ता में देखा था। लोहामंडी से नौबस्ता तक बरात पर फूल बरसाए। मंदिर में सजी जनकपुरी में छत से लेकर दूर तक महिलाओं ने दीपकों से आरती की। इसकी याद में 50 साल पूरे होने पर मैने उसी मंदिर में स्वरूपों का फिर पूजन किया था।
श्रीरामलीला कमेटी के उपाध्यक्ष अनुराध शुक्ला ने कहा कि मैंने पहली बार जनकपुरी का उल्लास, खुशियां, लोगों का जुड़ाव नौबस्ता में देखा था। लोहामंडी से नौबस्ता तक बरात पर फूल बरसाए। मंदिर में सजी जनकपुरी में छत से लेकर दूर तक महिलाओं ने दीपकों से आरती की। इसकी याद में 50 साल पूरे होने पर मैने उसी मंदिर में स्वरूपों का फिर पूजन किया था।