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गंगाजल सप्लाई करने की तैयारी, इन दिक्कतों से पाना होगा पार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला आगरा
Updated Sun, 14 Jan 2018 03:58 PM IST
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मशीनें हो गई हैं जर्जर
- फोटो : अमर उजाला
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आगरा में गंगाजल की लगभग अड़चनें दूर हो गई हैं। अगले दो-तीन महीनों में इसकी सप्लाई के भी दावे किए जा रहे हैं लेकिन, इसके वितरण के इंतजाम अधूरे हैं। कई टंकियां खराब पड़ी हैं।
देखरेख के अभाव में पंपिंग स्टेशन कबाड़ हो गए हैं। कई वर्ष पहले बिछाया गया पानी की पाइप लाइनों का नेटवर्क ढूंढना पड़ रहा है।
गंगाजल को शहर में लाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया गया है। युद्ध स्तर पर कार्य चल रहा है लेकिन इससे भी समस्या हल होती नहीं दिख रही। असल दिक्कत तो पानी के बाद इसके वितरण को लेकर आएगी।
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देखरेख के अभाव में पंपिंग स्टेशन कबाड़ हो गए हैं। कई वर्ष पहले बिछाया गया पानी की पाइप लाइनों का नेटवर्क ढूंढना पड़ रहा है।
गंगाजल को शहर में लाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया गया है। युद्ध स्तर पर कार्य चल रहा है लेकिन इससे भी समस्या हल होती नहीं दिख रही। असल दिक्कत तो पानी के बाद इसके वितरण को लेकर आएगी।
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ध्वस्त हो गया सिस्टम
दरअसल, शहर में पानी वितरण के लिए पूर्व में जो नेटवर्क विकसित किया गया था, वह ध्वस्त हो चुका है। आवास विकास, यमुनापार, सेवला क्षेत्र में सालों पहले पानी की कई टंकियां बनीं तो सही लेकिन इनसे एक बार भी पानी सप्लाई नहीं हो सकी।
स्थिति यह है कि रखरखाव के अभाव में अधिकांश टंकियां जर्जर हो गई हैं। इनको प्रयोग में ला पाना असंभव सा है। मशीनों के नाम पर लोहे के चंद टुकड़े ही बचे हैं।
लगभग दस साल पहले गंगाजल प्रोजेक्ट के तहत शहर के तमाम क्षेत्रों में पानी की पाइप लाइन डाली गई थीं। इनका सालों तक कोई प्रयोग नहीं हुआ। ऐसे में इनका भी अतापता नहीं है। करोड़ों रुपये ठिकाने लग गए।
स्थिति यह है कि रखरखाव के अभाव में अधिकांश टंकियां जर्जर हो गई हैं। इनको प्रयोग में ला पाना असंभव सा है। मशीनों के नाम पर लोहे के चंद टुकड़े ही बचे हैं।
लगभग दस साल पहले गंगाजल प्रोजेक्ट के तहत शहर के तमाम क्षेत्रों में पानी की पाइप लाइन डाली गई थीं। इनका सालों तक कोई प्रयोग नहीं हुआ। ऐसे में इनका भी अतापता नहीं है। करोड़ों रुपये ठिकाने लग गए।
इतनी बढ़ गई लागत
वर्ष 2006 में गंगाजल प्रोजेक्ट शुरू हुआ था। तब इसकी लागत लगभग 335 करोड़ थी। बाद में यह बढ़कर लगभग 400 करोड़ रुपए की लागत हो गई। अब यह प्रोजेक्ट 2887 करोड़ रुपए का हो चुका है। इन 12 सालों में लगभग दस गुना इसकी लागत बढ़ चुकी है। पर 2007 से 2014 तक मात्र 5 प्रतिशत कार्य हो पाया था।
इस प्रोजेक्ट के माध्यम से बुलंदशहर के पालड़ा झील से 150 क्यूसेक गंगाजल लाने की योजना है। इसमें से करीब 10 क्यूसेक पानी मथुरा और शेष 140 क्यूसेक पानी आगरा को मिलना है।
जापान बैंक के सहयोग से चल रही इस योजना को 2012 तक पूरा करना था लेकिन जल निगम के अधिकारियों की मेहरबानी से यह प्रोजेक्ट 2018 तक भी पूरा नहीं हो पाया है। भाजपा सरकार के जनप्रतिनिधियों का दावा है कि दो-तीन महीने में यह योजना पूरी हो जाएगी।
इस प्रोजेक्ट के माध्यम से बुलंदशहर के पालड़ा झील से 150 क्यूसेक गंगाजल लाने की योजना है। इसमें से करीब 10 क्यूसेक पानी मथुरा और शेष 140 क्यूसेक पानी आगरा को मिलना है।
जापान बैंक के सहयोग से चल रही इस योजना को 2012 तक पूरा करना था लेकिन जल निगम के अधिकारियों की मेहरबानी से यह प्रोजेक्ट 2018 तक भी पूरा नहीं हो पाया है। भाजपा सरकार के जनप्रतिनिधियों का दावा है कि दो-तीन महीने में यह योजना पूरी हो जाएगी।
शहर में मुख्य पाइप लाइन का रूट
कैलाश मंदिर सिकंदरा से यमुना नदी पर निर्मित सेतु से जीवनी मंडी एवं सिकंदरा जल शोधन संयंत्रों तक 1600 एमएम की एमएस पाइप लाइन बिछाई जा रही है।
जीवनी मंडी जलकल परिसर तक बिछाई जाने वाली पाइप लाइन यमुना नदी पर निर्मित सेतु से प्रारंभ होकर बाईपुर वन रेंज से होते हुए कार्यालय वन संरक्षक के सामने केंद्रीय हिंदी संस्थान रोड और उसके बाद 100 फुटा रोड दयालबाग, कमला नगर, बल्केश्वर होते हुए जीवनी मंडी तक जाएगी।
गंगा कैनाल से इनलेट बॉल्ब के जरिये पालड़ा पर बनाये गये 3 चैनलों में पानी स्टोर किया जाएगा। वहां से 7-7 फुट की दो पाइप लाइनें मथुरा तक डाली जा रही हैं।
ग्रेवटी सिस्टम द्वारा इन लाइनों में पानी सप्लाई होगी। ग्रेवटी सिस्टम दीर्घकालिक है। ज्यादा टिकाऊ है। जबकि पंपिंग सिस्टम में ज्यादा कठिनाई रहती है।
जीवनी मंडी जलकल परिसर तक बिछाई जाने वाली पाइप लाइन यमुना नदी पर निर्मित सेतु से प्रारंभ होकर बाईपुर वन रेंज से होते हुए कार्यालय वन संरक्षक के सामने केंद्रीय हिंदी संस्थान रोड और उसके बाद 100 फुटा रोड दयालबाग, कमला नगर, बल्केश्वर होते हुए जीवनी मंडी तक जाएगी।
गंगा कैनाल से इनलेट बॉल्ब के जरिये पालड़ा पर बनाये गये 3 चैनलों में पानी स्टोर किया जाएगा। वहां से 7-7 फुट की दो पाइप लाइनें मथुरा तक डाली जा रही हैं।
ग्रेवटी सिस्टम द्वारा इन लाइनों में पानी सप्लाई होगी। ग्रेवटी सिस्टम दीर्घकालिक है। ज्यादा टिकाऊ है। जबकि पंपिंग सिस्टम में ज्यादा कठिनाई रहती है।