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खाद संकट: मैनपुरी में डीएपी के लिए सुबह चार बजे से किसान लगा रहे हैं लाइन, दिनभर खड़े रहकर भी खाली हाथ
Thu, 26 Sep 2024 06:17 PM IST
धीरेन्द्र सिंह
संवाद न्यूज एजेंसी, मैनपुरी
संवाद न्यूज एजेंसी, मैनपुरी
Published by: धीरेन्द्र सिंह
Updated Thu, 26 Sep 2024 06:17 PM IST
सार
उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में किसानों के लिए खाद का संकट गहरा गया है। डीएपी के लिए किसान सुबह से लाइन में लग रहे हैं। कुछ का नंबर आ रहा है, तो वहीं बड़ी संख्या में किसान खाली हाथ रह जा रहे हैं।
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डीएपी के लिए लगी लाइन
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मैनपुरी के घिरोर में फोटो में नजर आ रही ये लाइन किसी और काम के लिए बल्कि डीएपी लेने के लिए लगी है। सुबह चार बजे से ही सरकारी और निजी उर्वरक की दुकानों पर ऐसी ही लाइनें लग रही हैं। इसके बाद भी किसानों को डीएपी नहीं मिल पा रही है। वहीं दूसरी तरफ निजी दुकानदार डीएपी के साथ दूसरे उर्वरक खरीदने का भी दबाव बना रहे हैं।
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आलू की बुवाई के लिए किसानों को डीएपी की जरूरत पड़ने लगी है। खेतों में मेहनत करने के साथ ही डीएपी के लिए अलग से उन्हें मेहनत करनी पड़ रही है। कस्बा घिरोर स्थित कृषक भारती सेवा केंद्र मैनपुरी रोड पर डीएपी के लिए सुबह 4 बजे से किसान लाइन में लग जाते हैं। छह घंटे बाद सुबह 10 बजे वितरण शुरू होता है। नंबर आते-आते खाद खत्म होने से किसान खाली हाथ ही लौटते हैं। बीते दो दिनों से किसानों को ऐसी ही परेशानी झेलनी पड़ रही है। किसान सुनील कुमार बताते हैं कि दोनों दिन वे लाइन में लगे, लेकिन उन्हें डीएपी नहीं मिल सकी। वहीं बृहस्पतिवार को केंद्र बंद रहनेे से डीएपी का वितरण ही नहीं हुआ। किसानों ने डीएम से डीएपी की व्यवस्था कराने और नियमानुसार वितरण कराने की मांग की है। मांग करने वालों में किसान अंकित शर्मा, अनिल कुमार, प्रवीन कुमार, मोहित, सुरेश चंद्र, विपिन, अनुरुद्ध प्रताप आदि शामिल हैं।
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पोटाश, जिंक और जाइम खरीदने का है दबाव
सरकारी केंद्रों पर जहां डीएपी उपलब्ध नहीं हो पा रही है तो वहीं निजी दुकानदारों के अपने नखरे हैं। दरअसल अधिक कीमत वसूलने पर प्रशासन सख्त है, इससे बचने के लिए दुकानदारों ने नया फंडा अपनाया है। वे किसानों को डीएपी के साथ जिंक, पोटाश या जाइम साथ में लेने के लिए बाध्य कर रहे हैं। ये उर्वरक निम्न स्तरीय होते हैं, लेकिन इसके नाम पर अधिक कीमत वसूल की जाती है। अगर कोई ये नहीं लेता है तो उसे डीएपी भी नहीं दी जाती है।
सरकारी केंद्रों पर जहां डीएपी उपलब्ध नहीं हो पा रही है तो वहीं निजी दुकानदारों के अपने नखरे हैं। दरअसल अधिक कीमत वसूलने पर प्रशासन सख्त है, इससे बचने के लिए दुकानदारों ने नया फंडा अपनाया है। वे किसानों को डीएपी के साथ जिंक, पोटाश या जाइम साथ में लेने के लिए बाध्य कर रहे हैं। ये उर्वरक निम्न स्तरीय होते हैं, लेकिन इसके नाम पर अधिक कीमत वसूल की जाती है। अगर कोई ये नहीं लेता है तो उसे डीएपी भी नहीं दी जाती है।