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सौतेला पिता बना हैवान: नाबालिग बेटी को पत्नी की तरह रखा...तीन साल तक किया घिनौना काम; कोर्ट ने सुनाई कठोर सजा

Thu, 14 Mar 2024 09:32 PM IST
धीरेन्द्र सिंह अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा Published by: धीरेन्द्र सिंह Updated Thu, 14 Mar 2024 09:32 PM IST
सार

नाबालिग बेटी का शारीरिक शोषण करने के मामले में कोर्ट ने फैसला सुनाया है। सौतेले पिता को कोर्ट ने आखिरी सांस तक कारावास में रहने की कोर्ट ने सख्त सजा सुनाई है।
 

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Court gave harsh punishment Stepfather Kept minor daughter as his wife did disgusting act for three years
court new - फोटो : istock

विस्तार

आगरा के जगदीशपुरा थाना क्षेत्र में एक युवक ने पत्नी की मौत के बाद सौतेली नाबालिग बेटी की जबरदस्ती मांग भर दी। उसे पत्नी बनाकर 3 साल तक घर में कैद कर दुष्कर्म किया। मौका पाकर घर से भाग कर किशोरी ने पुलिस से शिकायत की। मामले में स्पेशल जज पॉक्सो एक्ट विकास वर्मा ने पिता को दोषी मानते हुए आजीवन कारावास और 50 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई। रकम से 30 हजार रुपये पीड़िता को दिलाने के आदेश किए।
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पीड़िता ने जगदीशपुरा थाने में 28 अगस्त 2019 को तहरीर दी थी। पुलिस को बताया कि उसके पिता की मौत के बाद मां ने 6 साल पहले फतेहपुर सीकरी निवासी एक युवक के साथ दूसरी शादी की। मां के साथ वह और उसका भाई भी सौतेले पिता के साथ रहने लगे। 2016 में मां की मौत हो गई। इसके 3 महीने बाद सौतेले पिता ने उसकी मांग में जबरदस्ती सिंदूर भर दिया। घर में कैद कर पत्नी की तरह रखने लगा।
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जून 2019 में फतेहपुर सीकरी से जगदीशपुरा थाना क्षेत्र में किराये के मकान में उसे साथ लेकर रहने लगा। काम पर जाते समय उसे कमरे में बंद करके जाता। शाम को आने के बाद दुष्कर्म करता। विरोध पर मारपीट करता। 28 अगस्त 2019 को मौका पाकर वह घर से निकल गई। पड़ोसियों को आपबीती बताई। इसके बाद उनकी मदद से पुलिस को 100 नंबर पर सूचना दी। उस दौरान उम्र 14 साल थी। विशेष लोक अभियोजक पॉक्सो एक्ट विमलेश आनंद ने पीड़िता सहित 8 गवाह एवं संबंधित सबूत अदालत में पेश किए।

 
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चोट का घाव भरा जा सकता है मानसिक नहीं....कोर्ट
कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि सौतेले पिता ने पीड़िता के साथ केवल शारीरिक नहीं, मानसिक हिंसा भी की है। पीड़िता के लिए यह पीड़ा मृत्यु तक बनी रहेगी। शारीरिक चोट का घाव तो भरा जा सकता है, मगर मानसिक घाव नहीं भरा जा सकता। दोषी को कम सजा दिए जाने से देश की न्याय प्रदान करने वाली व्यवस्था पर संदेह उत्पन्न होता है। इस वजह से दोषी के प्रति सहानुभूति और उदारता दिखाना उचित नहीं है।
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