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जोधपुर झाल में चातक पक्षियों की दस्तक: अफ्रीका व दक्षिण एशिया में पाया जाता है जैकोबिन कूको,12 पक्षी चिह्नित

Sun, 27 Jun 2021 12:11 PM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: Abhishek Saxena Updated Sun, 27 Jun 2021 12:11 PM IST
सार

चातक पक्षी के बारे में प्रचलित है कि यह महज स्वाति नक्षत्र में मानसून में बारिश की बूंदों से ही अपनी प्यास बुझाता है। हालांकि इसके वैज्ञानिक तथ्य उपलब्ध नहीं है।

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Chatak Bird Came India from Africa In Jodhpur Jhal
जोधपुर झाल में चातक पक्षियों की दस्तक (जैकोबिन कूको) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

स्वाति नक्षत्र की मानसूनी बूंदे पीने के लिए चातक (जैकोबिन कूको) पक्षियों ने अफ्रीका से जोधपुर झाल तक का सफर तय किया है। अभी तक 12 नर व मादा पक्षी जोधपुर झाल में चिह्नित किए गए हैं। चातक पक्षी का आगमन मानसून के आने का संकेतक माना जाता है। बॉयोडायवर्सिटी रिसर्च एंड डेवलपमेंट सोसाइटी के अध्यक्ष व पक्षी विशेषज्ञ डॉ. केपी सिंह ने बताया कि मादा चातक अपना घोंसला न बनाकर अन्य पक्षियों के घोंसले में अंडे देती है। मादा चातक पक्षी जंगल बैबलर, कॉमन बैबलर या फिर रेड-वेंटेड बुलबुल के घोंसलों में अपने अंडे देती हैं।

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यह व्यवहार कोयल परिवार की अधिकांश प्रजातियों में पाया जाता है। जोधपुर झाल पर बैबलर की कई प्रजातियां निवासी प्रजनक हैं और रेड-वेंटेड बुलबुल की जनसंख्या भी बहुत है। इस कारण चातक यहां प्रजनन कर सकता है। इसकी पसंद का खुले जंगल में कांटेदार झाड़ियों वाला माहौल जोधपुर झाल में है। जोधपुर झाल के अलावा आगरा में ताज नेचर वाक और सूर सरोवर कीठम में भी इसे चिह्नित किया जाता है।
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चातक पक्षी के बारे में यह प्रचलित है 
चातक पक्षी के बारे में प्रचलित है कि यह महज स्वाति नक्षत्र में मानसून में बारिश की बूंदों से ही अपनी प्यास बुझाता है। हालांकि इसके वैज्ञानिक तथ्य उपलब्ध नहीं है।

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अफ्रीका और एशियाई देशों से आते हैं भारत
डॉ. केपी सिंह ने बताया कि जैकोबिन कूको को ही चातक बोला जाता है। इसके अन्य नाम पाइड कूको व कूको भी हैं। यह अफ्रीका और दक्षिण एशियाई देशों में भारत, श्रीलंका व म्यांमार का प्रजनक निवासी है। पूर्वी अफ्रीका से भारत में प्रवास पर आते समय सऊदी अरब इनके माइग्रेशन पाथ में शामिल है। अफ्रीकी प्रजाति सर्दियों में अफ्रीका के अन्य देशों में प्रवास पर जाती है। इसे उत्तरी व मध्य भारत में गर्मियों में मानसून पूर्व प्रवास पर देखा जाता है। इसका ऊपरी हिस्सा काले रंग का और नीचे का हिस्सा सफेद रंग का होता है। सिर पर क्रिस्ट से इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। चातक के भोजन में कैटरपिलर, कीड़े व फल शामिल हैं।

चातक के माइग्रेशन का किया जा रहा अध्ययन
डॉ. केपी सिंह ने बताया कि इंडियन इंस्टीट्यूट आफ रिमोट सेंसिंग व भारत सरकार के बायोटेक्नोलॉजी विभाग के सहयोग से भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून ने चातक पक्षी के माइग्रेशन का अध्ययन जून 2020 से प्रारंभ किया है। सेटेलाइट ट्रांसमीटर की टैगिंग से माइग्रेशन और पर्यावरण परिवर्तन के जैकोबिन कूको पर प्रभाव का अध्ययन किया जा रहा है।

उत्तर भारत में यह पक्षी मानसून से पहले ही देखा जाता है इसकी ब्रीडिंग भी चिह्नित की जाती है। दक्षिण भारत में यह पूरे वर्ष दिखाई देता है। 2017-18 में ई-बर्ड से प्राप्त डाटा के अध्ययन में यह तो ज्ञात हो चुका है कि उच्च जलवाष्प की मात्रा में वृद्धि (जो कि मानसून का सूचक है ) के साथ उत्तर भारत में चातक की संख्या में वृद्धि हो जाती है।

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