{"_id":"6030f0c68ebc3ee907507c2d","slug":"agra-mohalla-ghatiya-mamu-bhanja-history-in-hindi","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"घटिया मामू-भांजा: आगरा के इस मोहल्ले का नाम सुनकर चौंक जाते हैं लोग, दिलचस्प है इतिहास","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
घटिया मामू-भांजा: आगरा के इस मोहल्ले का नाम सुनकर चौंक जाते हैं लोग, दिलचस्प है इतिहास
Sat, 06 Mar 2021 01:36 PM IST
मुकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: मुकेश कुमार
Updated Sat, 06 Mar 2021 01:36 PM IST
विज्ञापन
आगरा का मोहल्ला घटिया मामू-भांजा
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
ऐतिहासिक शहर आगरा के हर इलाके के नामकरण का अपना इतिहास है। इनमें कुछ ऐसे मोहल्ले भी हैं, जिनके सुनकर लोग चौंक जाते हैं। घटिया आजम खां की तरह ही शहर की एक और बस्ती के साथ घटिया शब्द जुड़ा है। यह है घटिया मामू-भांजा। इसका इतिहास दिलचस्प है।
विज्ञापन
इस बस्ती का यह नाम मुगलकाल में पड़ा था। मामा-भांजा का नाम क्या था, इसका जिक्र इतिहास की किताबों में नहीं मिलता था लेकिन यह उल्लेख जरूर है कि इन मामा-भांजे की इस इलाके में तूती बोलती थी, इसी से नाम पड़ गया घटिया मामू-भांजा। घटिया का अर्थ घाटी से है, क्योंकि यह निचला इलाका है।
विज्ञापन
संबंधित खबर- आगरा के इस इलाके का नाम क्यों पड़ा 'घटिया आजम खां', रोचक है इसका इतिहास
विज्ञापन
इतिहासकार बाला दुबे की किताब 'मोहल्ले आगरा के' में इसका उल्लेख है। ढोली खार के पास का इलाका पहले घाटी मामू-भांजा और फिर घटिया मामू-भांजा कहा जाने लगा। मुगलकाल में यहां मांस की मंडी थी। इसमें दो लोगों का दबदबा था, उनका रिश्ता मामा-भांजे का था। यहां कई बार सांप्रदायिक बवाल हुआ। उत्तर मुगल काल में यहां अखाड़े खुल गए। कई मशहूर पहलवान यहां से निकले।
1929 में हुआ था दंगा
घटिया मामू-भांजा में 1929 में दंगा हुआ था। कई लोगों की जान गई। अंग्रेजों की पलटन को डेरा डालना पड़ा। दंगे का केस जज बैनट की अदालत में चला। वकील ऐल्सटन और शिवदत्त भार्गव के बीच बहस ली। इसके बाद दंगे के दोषी अजमेरी को फांसी की सजा सुनाई गई। बाद में यह उम्रकैद में बदली थी।
1947 में बदल गई तस्वीर
घटिया मामू-भांजा की तस्वीर 1947 में बदल गई। बंटवारे के वक्त यहां के कई लोग पाकिस्तान चले गए। उनकी जगह दूसरे लोग आए।
अपने शहर की खबरों से अपडेट रहने के लिए पढ़ते रहिए amarujala.com । अमर उजाला आगरा के फेसबुक पेज को लाइक और फॉलो करने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं।
घटिया मामू-भांजा में 1929 में दंगा हुआ था। कई लोगों की जान गई। अंग्रेजों की पलटन को डेरा डालना पड़ा। दंगे का केस जज बैनट की अदालत में चला। वकील ऐल्सटन और शिवदत्त भार्गव के बीच बहस ली। इसके बाद दंगे के दोषी अजमेरी को फांसी की सजा सुनाई गई। बाद में यह उम्रकैद में बदली थी।
1947 में बदल गई तस्वीर
घटिया मामू-भांजा की तस्वीर 1947 में बदल गई। बंटवारे के वक्त यहां के कई लोग पाकिस्तान चले गए। उनकी जगह दूसरे लोग आए।
अपने शहर की खबरों से अपडेट रहने के लिए पढ़ते रहिए amarujala.com । अमर उजाला आगरा के फेसबुक पेज को लाइक और फॉलो करने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं।