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निराशा में बदला आशा ज्योति केंद्र
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 21 Apr 2016 01:45 AM IST
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अाशा ज्योििति
- फोटो : amar ujala
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रानी लक्ष्मीबाई आशा ज्योति केंद्र को अपनी बड़ी उपलब्धि बताकर सरकार ने ढोल तो खूब पीटे, लेकिन हकीकत में यह केंद्र मुसीबत की मारी महिलाओं को आशा की ज्योति नहीं, बल्कि निराशा का अंधेरा दे रहा है। एक ही छत के नीचे हर समस्या का समाधान करने के प्रशासन के दावे महीने भर में ही दम तोड़ गए हैं। इसके उद्घाटन के लिए तो डीएम और एसएसपी भी आए थे, लेकिन फीता काटने के बाद मुआयना तो दूर कोई अफसर इधर झांकने तक नहीं आया है। शायद यही वजह है कि दहेज, यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा की पीड़ित महिलाएं इस केंद्र से मदद मिलने की उम्मीद तक नहीं कर रही हैं। पेश है धर्मेन्द्र त्यागी की लाइव रिपोर्ट....
दोपहर के 12 बजे हैं। केंद्र खुला है। हेल्पलाइन नंबर 181 पर कोई फोन नहीं आ रहा। पूछने पर पता चलता है कि फोन खराब पड़ा है। उद्घाटन के चार दिन बाद ही यह शो पीस बन गया था। आगे बढ़ते हैं। चिकित्सा सहायता केंद्र खाली है। कानूनी सहायता केंद्र पर भी कोई मौजूद नहीं है। चाइल्ड लाइन केंद्र दीवार पर लिखा है लेकिन कुर्सी खाली है।
चिकित्सा और कानूनी सहायता केंद्र पर अभी तक नियुक्ति ही नहीं की गई है। अल्प प्रवास सेल देखिए। इसमें जरूरत पड़ने पर पीड़िता के लिए पांच दिन ठहरने की व्यवस्था है। सेल तो बना है, लेकिन यहां खाने-पीने का इंतजाम नहीं है।
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हेल्पलाइन बंद, संपर्क टूटा
181 हेल्पलाइन फोन खराब होने से महिला हेल्प लाइन ( 1090), चाइल्ड केयर ( 1098 ) और एंबुलेंस सेवा (102) से संपर्क नहीं हो पा रहा।
40 दिन में सिर्फ दो शिकायतें
हेल्पलाइन नंबर खराब होने से फोन पर शिकायतें नहीं आ पा रहीं। यहां की दुर्दशा देख महिलाएं खुद आना भी पसंद नहीं करती है। स्थिति यह है कि 40 दिन में सिर्फ दो प्रार्थना पत्र आए हैं।
ट्रामा काउंसलिंग सेल शुरू नहीं
घरेलू हिंसा, बलात्कार, दहेज के लिए हत्या के प्रयास की शिकार पीड़िताएं यहां आती हैं तो ट्रामा काउंसलिंग के चिकित्सक उसकी जांच कर तत्काल चिकित्सकीय सेवाओं की संस्तुति करते हैं। केंद्र में ट्रामा काउंसलिंग सेल तो बना है, लेकिन डाक्टरों का पैनल नियुक्त नहीं हो सका।
पुलिस भी अंधेरे मे
सेल एकांत परिसर में है। यहां सुरक्षा के लिए पुलिस चौकी खोल दी गई है। लेकिन बिजली चले जाने पर यहां जेनरेटर और इंवरटर तो दूर, इमरजेंसी लाइट तक नहीं है। पानी का भी इंतजाम नहीं किया गया है।
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दोपहर के 12 बजे हैं। केंद्र खुला है। हेल्पलाइन नंबर 181 पर कोई फोन नहीं आ रहा। पूछने पर पता चलता है कि फोन खराब पड़ा है। उद्घाटन के चार दिन बाद ही यह शो पीस बन गया था। आगे बढ़ते हैं। चिकित्सा सहायता केंद्र खाली है। कानूनी सहायता केंद्र पर भी कोई मौजूद नहीं है। चाइल्ड लाइन केंद्र दीवार पर लिखा है लेकिन कुर्सी खाली है।
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चिकित्सा और कानूनी सहायता केंद्र पर अभी तक नियुक्ति ही नहीं की गई है। अल्प प्रवास सेल देखिए। इसमें जरूरत पड़ने पर पीड़िता के लिए पांच दिन ठहरने की व्यवस्था है। सेल तो बना है, लेकिन यहां खाने-पीने का इंतजाम नहीं है।
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हेल्पलाइन बंद, संपर्क टूटा
181 हेल्पलाइन फोन खराब होने से महिला हेल्प लाइन ( 1090), चाइल्ड केयर ( 1098 ) और एंबुलेंस सेवा (102) से संपर्क नहीं हो पा रहा।
40 दिन में सिर्फ दो शिकायतें
हेल्पलाइन नंबर खराब होने से फोन पर शिकायतें नहीं आ पा रहीं। यहां की दुर्दशा देख महिलाएं खुद आना भी पसंद नहीं करती है। स्थिति यह है कि 40 दिन में सिर्फ दो प्रार्थना पत्र आए हैं।
ट्रामा काउंसलिंग सेल शुरू नहीं
घरेलू हिंसा, बलात्कार, दहेज के लिए हत्या के प्रयास की शिकार पीड़िताएं यहां आती हैं तो ट्रामा काउंसलिंग के चिकित्सक उसकी जांच कर तत्काल चिकित्सकीय सेवाओं की संस्तुति करते हैं। केंद्र में ट्रामा काउंसलिंग सेल तो बना है, लेकिन डाक्टरों का पैनल नियुक्त नहीं हो सका।
पुलिस भी अंधेरे मे
सेल एकांत परिसर में है। यहां सुरक्षा के लिए पुलिस चौकी खोल दी गई है। लेकिन बिजली चले जाने पर यहां जेनरेटर और इंवरटर तो दूर, इमरजेंसी लाइट तक नहीं है। पानी का भी इंतजाम नहीं किया गया है।