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जिंदगी को ढर्रे पर लाने की कोशिश, राख में तलाशी उम्मीदें
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जिंदगी ढर्रे पर लाने को राख में तलाशी उम्मीदें
- जले अनाज में सही दाने छांटने में जुटी हैं अग्निकांड पीड़ित घरों की महिलाएं
- तीसरे दिन भी खुले आसमान के नीचे ग्रामीण, बढ़ रहा है दर्द
अमर उजाला ब्यूरो
पटियाली। अग्निकांड से हुई तबाही के बाद गांव में राख के ढेर दिखाई दे रहे हैं। पूरी तरह टूट चुके अग्निकांड पीड़ित परिवार अब जिंदगी को ढर्रे पर लाने की कोशिश में जुटे हैं। उन्होंने राख के ढेरों में ही उम्मीदें खोजनी शुरू कर दी हैं। तमाम महिलाओं ने जले हुए अनाज में से कुछ हद तक सही दाने साफ करके निकाले।
महरी और नगला टिकुरी के परिवार पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं। पीड़ित परिवार खुले आसमान के नीचे रात गुजारने को विवश हैं। क्योंकि प्रशासन के इंतजाम नाकाफी साबित हुए हैं। अग्निकांड में सबकुछ जलकर राख हो गया। वैसे तो इन परिवारों की उम्मीदें राख के ढेर में ही भस्म हो गईं हैं, लेकिन दो वक्त के निवाले के लिए प्रभावित परिवारों ने एक बार फिर राख में उम्मीद तलाशने का प्रयास किया। उन्हें राख में दबे अधजले अनाज से कुछ आशा की किरनें दिखीं हैं। गुरुवार को महिला और पुरुषों ने राख के ढेर से अनाज साफ किया। कई परिवारों ने कुछ हद तक सही अनाज को सहेजा भी है। भले ही पीड़ित परिवार जिंदगी को ढर्रे पर लाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उन्हें सीमिति सफलता ही हाथ लग रही है। रात खुले आसमान के नीचे गुजारने के लिए मजबूर हैं तो तपती दोपहरी में सिर ढकने को चादर भी नहीं है। पीड़ित परिवारों की मानें तो प्रशासन के इंतजाम नाकाफी हैं।
पीड़ित परिवार बोले, बढ़ रहा है दर्द
पीड़ित किसान सुरेश, अमर सिंह, अशोक, चरन सिंह आदि का कहना था कि आग ने सब कुछ तबाह कर दिया। वह मंजर आंखों से अभी हट नहीं रहा। बच्चे और महिलाएं खुले आसमान में रात गुजार रहे हैं। तो दिन में आसमान से बरसती आग पेट की आग पर हावी हो रही है। खाद्यान्न का भी उचित प्रबंध नहीं है।
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जिंदगी ढर्रे पर लाने को राख में तलाशी उम्मीदें
- जले अनाज में सही दाने छांटने में जुटी हैं अग्निकांड पीड़ित घरों की महिलाएं
- तीसरे दिन भी खुले आसमान के नीचे ग्रामीण, बढ़ रहा है दर्द
अमर उजाला ब्यूरो
पटियाली। अग्निकांड से हुई तबाही के बाद गांव में राख के ढेर दिखाई दे रहे हैं। पूरी तरह टूट चुके अग्निकांड पीड़ित परिवार अब जिंदगी को ढर्रे पर लाने की कोशिश में जुटे हैं। उन्होंने राख के ढेरों में ही उम्मीदें खोजनी शुरू कर दी हैं। तमाम महिलाओं ने जले हुए अनाज में से कुछ हद तक सही दाने साफ करके निकाले।
महरी और नगला टिकुरी के परिवार पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं। पीड़ित परिवार खुले आसमान के नीचे रात गुजारने को विवश हैं। क्योंकि प्रशासन के इंतजाम नाकाफी साबित हुए हैं। अग्निकांड में सबकुछ जलकर राख हो गया। वैसे तो इन परिवारों की उम्मीदें राख के ढेर में ही भस्म हो गईं हैं, लेकिन दो वक्त के निवाले के लिए प्रभावित परिवारों ने एक बार फिर राख में उम्मीद तलाशने का प्रयास किया। उन्हें राख में दबे अधजले अनाज से कुछ आशा की किरनें दिखीं हैं। गुरुवार को महिला और पुरुषों ने राख के ढेर से अनाज साफ किया। कई परिवारों ने कुछ हद तक सही अनाज को सहेजा भी है। भले ही पीड़ित परिवार जिंदगी को ढर्रे पर लाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उन्हें सीमिति सफलता ही हाथ लग रही है। रात खुले आसमान के नीचे गुजारने के लिए मजबूर हैं तो तपती दोपहरी में सिर ढकने को चादर भी नहीं है। पीड़ित परिवारों की मानें तो प्रशासन के इंतजाम नाकाफी हैं।
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पीड़ित परिवार बोले, बढ़ रहा है दर्द
पीड़ित किसान सुरेश, अमर सिंह, अशोक, चरन सिंह आदि का कहना था कि आग ने सब कुछ तबाह कर दिया। वह मंजर आंखों से अभी हट नहीं रहा। बच्चे और महिलाएं खुले आसमान में रात गुजार रहे हैं। तो दिन में आसमान से बरसती आग पेट की आग पर हावी हो रही है। खाद्यान्न का भी उचित प्रबंध नहीं है।
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