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खत्म नहीं पर सहम गईं गौरैया

Thu, 21 Mar 2013 05:30 AM IST
Lucknow
Lucknow Updated Thu, 21 Mar 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। खबर अच्छी है, सबकी चहेती चिड़िया गौरैया अभी भी कंक्रीट के शहर लखनऊ में किसी तरह अपना अस्तित्व बनाए हुए है। यह जाहिर हुआ है बुधवार को ‘विश्व गौरैया दिवस’ पर पूरे लखनऊ में युवाओं व आम नागरिकों द्वारा एक साथ की गई गौरैया की गणना में। गणना रिपोर्ट का अध्ययन अभी जारी है और अब तक 1857 गौरैयाओं को देखे जाने की पुष्टि शहरवासियों ने की है। लोगोें ने 2000 से ज्यादा ई-मेल और एसएमएस के जरिए अपनी गणना रिपोर्ट भेजी है। गणना साबित करती है कि लखनऊ को अपने घर के तौर पर गौरैया ने छोड़ा नहीं है, बस प्रकृति के विपरीत असंवेदनशील विकास से वे सहमी हैं।
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गौरैया की गणना सुबह 7 से 7:30 बजे तक पूरे शहर में एक साथ की गई। इसे प्रदेश बायो डायवर्सिटी बोर्ड, रीजनल साइंस सिटी और लखनऊ विश्वविद्यालय के जूलॉजी डिपार्टमेंट ने मिलकर करवाया था। साथ ही अपने ई-मेल एड्रैस जारी किए थे, जिन पर नागरिकों से गणना रिपोर्ट भेजने की अपील की गई थी। वहीं, जूलॉजी डिपार्टमेंट के 70 से अधिक सदस्यों ने इस अभियान को लेकर शहर के विभिन्न इलाकों में पर्चे बांटकर लोगों को गौरैया संरक्षण के लिए अपने 30 मिनट देने की अपील की थी। अभियान से जुड़ी सोनिका कुशवाहा बताती हैं कि लोगों ने जबरदस्त साथ दिया। सैकड़ों ईमेल और एसएमएस भेजकर गणना की अपनी जानकारियां दीं। बहुत से लोगों ने गणना फॉर्म को ही स्कैन करके भेजा है। दूसरी ओर अभियान में सक्रिय रही जूलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अमिता कनौजिया ने बताया कि इतनी अधिक सूचनाएं आई हैं कि सभी का विश्लेषण कर गणना अभी पूरी नहीं की जा सकी है। इसके गुरुवार तक पूरा होने की संभावना है। वहीं, शोधार्थी राजकुमार ने बताया कि वे इटौंजा के बरगदी कलां गांव से हैं, यहां उन्हाेंने 30 मिनट में करीब 40 गौरैया और 4 घोंसले तलाशे। गांव के भी कुछ लोग अभियान में शामिल हुए। उनकी बातों में गौरैया की संख्या को लेकर चिंता थी। वे बता रहे थे कि पोखरों और खलिहानों के पास अब गिनी-चुनी गौरैया दिखती हैं, जबकि कुछ वर्ष पूर्व तक सैकड़ों की संख्या में वे झुंड में उड़ा करती थी।
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कहां और क्यों मिलीं ज्यादा
खदरा, त्रिवेणीनगर, गोमतीनगर, आलमबाग, डालीगंज, बाबूगंज, रजनीखंड, रुचि खंड, प्रेमनगर। पक्षी विज्ञानी इसकी वजह इन क्षेत्रों में हरियाली, सुरक्षित आवासों की उपलब्धता, बिल्लियों बड़े पक्षियों जैसे परभक्षियों की कमी मानते हैं।
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फायदा-सुधार : गौरैया को पर्यावरण का बैरोमीटर माना गया है। इनकी संतुलित संख्या में होने का मतलब है कि क्षेत्र की आबोहवा साफ है और पर्यावरण सुरक्षित है। हालांकि जिन क्षेत्रों में इसकी संख्या ज्यादा मिली वह शहर के बाकी क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा हरे भरे हैं, लेकिन अनुभवी लोगों ने अपनी गणना रिपोर्ट में बताया कि 10 वर्ष पहले के लखनऊ के मुकाबले उन्हें बहुत कम गौरैया दिखाई दी हैं।

कहां कम और क्यों?
आईटी चौराहा, महानगर, कपूरथला, न्यू हैदराबाद, हनुमान सेतु आदि क्षेत्र। इन क्षेत्रों में ट्रैफिक के बढ़ते दबाव से लेकर हरियाली और सुरक्षित आवासों की कमी को वजह माना जा रहा है।
नुकसान-सुधार : गौरैया की संख्या कम होने का नुकसान न केवल वातावरण में सूनेपन के तौर पर सामने आता है, बल्कि यह भी बताता है कि इसमें जल्द और बड़े सुधार के लिए काम करने की जरूरत है। सुधार के लिए जरूरी है कि लोग खुद शुरुआत करें। पक्षियों के लिए सुरक्षित और छायादार स्थान पर दाना-पानी रखते हुए इसकी शुरुआत की जा सकती है।

गौरैया की घटती संख्या पर्यावरण के लिए खतरा
लखनऊ। गौरैया की घटती संख्या हमारे लिए एक संकेत है कि पर्यावरण के लिए हम गंभीर खतरे पैदा कर रहे हैं। हमें समझना होगा कि पृथ्वी सिर्फ मनुष्यों के लिए नहीं है, बल्कि दूसरे जीवों के लिए भी है। हमें उन्हें भी जीने के लिए जगह देनी होगी। यह कहना है उप्र बायो डायवर्सिटी बोर्ड की निदेशक प्रतिभा सिंह का। वे बुधवार को रीजनल साइंस सिटी में ‘विश्व गौरैया दिवस’ पर आयोजित कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि बोल रही थी। इस मौके पर लखनऊ विश्वविद्यालय के जूलॉजी एचओडी प्रो. एके शर्मा, साइंस सिटी के प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेटर उमेश कुमार, विभाग की ही प्रो. अमिता कनौजिया ने भी व्याख्यान दिए। प्रश्नोत्तरी, पोस्टर मेकिंग व पेंटिंग प्रतियोगिताएं भी आयोजित हुईं, जिसमें दर्जनों स्कूलों के 350 से अधिक विद्यार्थियों और शिक्षकों ने हिस्सा लिया। प्रतियोगिताओं में हर्षिल, अंजली आब्दी, अविरल चारिया, सोनम अग्रवाल, निहित वर्मा, मनलिसा गुप्ता, पलक पोद्दार पुरस्कृत हुए।

ताकि आवै गौरैया रानी ः खुशहाल स्वास्थ्य सेवा संस्थान ने भी इंदिरानगर में एक गोष्ठी का आयोजन किया, जिसमें बड़ी संख्या में नागरिक मौजूद रहे। संस्थान अध्यक्ष शिवराम मिश्र ने सभी से अपील की कि वे अपने घरों के सामने पक्षियों के लिए दाना-पानी रखें और उन्हें आने वाली गर्मियों में मदद करें। वहीं, भोजपुरी कवि कृष्णानंद राय ने कविताओं के जरिए गौरैया को बचाने की अपील की।
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