{"_id":"124-54252","slug":"Lucknow-54252-124","type":"story","status":"publish","title_hn":"परिवार और दोस्तों से जुड़ी है दिमागी सेहत ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
परिवार और दोस्तों से जुड़ी है दिमागी सेहत
Lucknow
Updated Mon, 11 Mar 2013 05:31 AM IST
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केस 1
40 वर्षीय अजय कुमार खुद का ध्यान नहीं रख पाते थे। अक्सर घर से निकलकर लखनऊ की सड़कों पर भटकते रहते थे। परिवार के सदस्य मुश्किल से उन्हें ढूंढकर ला पाते थे। जुलाई 2011 में मानसिक केंद्र में जांच के दौरान मालूम हुआ कि वे 20 साल से पैरानॉइड सिजोफ्रेनिया से ग्रस्त हैं। अजय को तीन महीने भर्ती रखा गया। इस दौरान उन्हें रोजमर्रा के काम करना, अपनी देखभाल, साफ-सफाई, बातचीत करना, सामाजिक होना आदि सिखाया गया। अजय के व्यवहार में धीरे-धीरे सुधार आया और आज वे इंदिरानगर में अपने एक रिश्तेदार की दुकान संभालते हैं और आत्मनिर्भर हैं।
केस - 2 दिमागी संतुलन संभाल अब ये शिक्षिका ओपीडी संभालती हैं
एमए और बीएड कर चुकी बिनिया चौधरी 23 साल से सिजोफ्रेनिया से पीड़ित रही। बीमारी बढ़ने से पहले वे बतौर शिक्षिका काम कर चुकी थीं, लेकिन उनकी स्थिति बिगड़ने पर उन्हें बहुत देरी से ही सही मनोविकार केंद्र में 2010 में दिखाया गया। यहां उन्हें भर्ती किया गया, लेकिन वे चुप रहना ही पसंद करती और किसी से कोई बात नहीं करतीं। न ही किसी गतिविधि का हिस्सा बनती, लेकिन लगातार दोस्ताना माहौल और सहयोग मिलने से वे धीरे-धीरे सामाजिक होने लगी। वे उच्च शिक्षित तो थीं ही, अब वे इसी केंद्र में ओपीडी संभाल रही हैं।
(लखनऊ के इन नागरिकों के नाम परिवर्तित हैं)
लखनऊ। ये चंद उदाहरण लखनऊ के उन लोगों के हैं, जिन्हाेंने अपना दिमागी संतुलन खोने के बाद सही इलाज कराकर मुख्यधारा में लौट आए हैं। इस तरह के मामलों को रविवार को रिचमंड फैलोशिप सोसाइटी की लखनऊ ब्रांच द्वारा आयोजित एक राष्ट्रीय वर्कशॉप में प्रस्तुत करते हुए बताया गया कि किस तरह मानसिक रोग में इलाज की सफलता पुनर्वास में परिणित हो सकती है। इस मौके पर देश भर से आए मनोचिकित्सा विशेषज्ञों ने अपने अनुभव साझा किए।
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गोमतीनगर स्थित नव उदय मेंटल हेल्थ इंस्टीट्यूट में आयोजित इस दो दिवसीय कार्यक्रम में लखनऊ ब्रांच के अध्यक्ष डॉ. अनिल अग्रवाल ने बताया 90 प्रतिशत मानसिक रोगियों को इलाज से पुनर्वास किया जा सकता है, लेकिन अधिकतर रोगी चिकित्सकों तक पहुंच ही नहीं पाते हैं। इसके चलते जहां उनका इलाज नहीं हो पाता, वहीं समाज में दूसरे लोग उन्हें ऐसी टिप्पणियां करते हैं, जिनसे उनकी स्थिति और बिगड़ने लगती है। उन्हाेंने बताया कि एक ओर केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक जैसे राज्य अपने यहां कानूनी तौर पर मनोरोगियों के इलाज-पुनर्वास की व्यवस्था कर रहे हैं, वहीं उत्तर प्रदेश में आज भी ऐसा कोई कानून नहीं है। जबकि देश में करीब 60 लाख मनोरोग पीड़ित निवास करते हैं। डॉ. शशि रॉय ने इसके लिए सरकार द्वारा आर्थिक सहयोग बढ़ाने की जरूरत बताई। डॉ. अनिशा शाह और डॉ. मैथ्यू वर्गीस ने भी पुनर्वास के तरीकों पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन आलोक सक्सेना ने किया और सेमिनार के समापन पर सभी का आभार जताया।
देरी से बढ़ती है समस्या
अधिकतर मामलों में मरीज को चिकित्सक तक पहुंचाने में बहुत देर कर दी जाती है। इसकी वजह तथाकथित सामाजिक शर्मिंदगी है। लोगों में यह सोच गहरी पैठ की हुई है कि अगर वे अपने परिवार के सदस्य को मनोचिकित्सक को दिखाएंगे तो लोग सदस्य को घोषित तौर पर पागल कहना शुरू कर देंगे जबकि मनोरोग किसी भी अन्य तरह के रोग की तरह हैं, जिनका समय पर इलाज जरूरी है और इसमें शर्माने की कोई बात नहीं है। इस रोग में परिवार को एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम बनकर रोगी का सहयोगी बनना चाहिए न कि उसे अपने लिए शर्म की वजह मानें। दूसरी ओर समाज को भी एक संवेदनशील रवैया रखना चाहिए।
रिश्तों में अपेक्षाएं प्रमुख वजह
मनोरोगों की ज्यादातर वजह दोस्ती, प्यार और नजदीकी रिश्तों में मिली असफलता या अपेक्षाओं के पूरा न होना है। काउंसिलर शीबा अपने अनुभव बताती हैं कि खुद अपने से जुड़ी अपेक्षाएं पूरी नहीं होने पर भी व्यक्ति टूटने लगता है। ऐसे में परिवार और दोस्तों को व्यक्ति साथ देना चाहिए। उसे अकेला छोड़ने से उसके संभलने के विकल्प खत्म हो जाते हैं। वह भ्रम, अनिंद्रा, अविश्वास, हीन भावना, चिंता और नीरसता से घिर कर मनोरोग का शिकार हो जाता है। एम्स के प्रो. डॉ. सुधीर खंडेलवाल बताते हैं कि इलाज के दौरान भी परिवारों की भूमिका सबसे अहम होती है।
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40 वर्षीय अजय कुमार खुद का ध्यान नहीं रख पाते थे। अक्सर घर से निकलकर लखनऊ की सड़कों पर भटकते रहते थे। परिवार के सदस्य मुश्किल से उन्हें ढूंढकर ला पाते थे। जुलाई 2011 में मानसिक केंद्र में जांच के दौरान मालूम हुआ कि वे 20 साल से पैरानॉइड सिजोफ्रेनिया से ग्रस्त हैं। अजय को तीन महीने भर्ती रखा गया। इस दौरान उन्हें रोजमर्रा के काम करना, अपनी देखभाल, साफ-सफाई, बातचीत करना, सामाजिक होना आदि सिखाया गया। अजय के व्यवहार में धीरे-धीरे सुधार आया और आज वे इंदिरानगर में अपने एक रिश्तेदार की दुकान संभालते हैं और आत्मनिर्भर हैं।
केस - 2 दिमागी संतुलन संभाल अब ये शिक्षिका ओपीडी संभालती हैं
एमए और बीएड कर चुकी बिनिया चौधरी 23 साल से सिजोफ्रेनिया से पीड़ित रही। बीमारी बढ़ने से पहले वे बतौर शिक्षिका काम कर चुकी थीं, लेकिन उनकी स्थिति बिगड़ने पर उन्हें बहुत देरी से ही सही मनोविकार केंद्र में 2010 में दिखाया गया। यहां उन्हें भर्ती किया गया, लेकिन वे चुप रहना ही पसंद करती और किसी से कोई बात नहीं करतीं। न ही किसी गतिविधि का हिस्सा बनती, लेकिन लगातार दोस्ताना माहौल और सहयोग मिलने से वे धीरे-धीरे सामाजिक होने लगी। वे उच्च शिक्षित तो थीं ही, अब वे इसी केंद्र में ओपीडी संभाल रही हैं।
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(लखनऊ के इन नागरिकों के नाम परिवर्तित हैं)
लखनऊ। ये चंद उदाहरण लखनऊ के उन लोगों के हैं, जिन्हाेंने अपना दिमागी संतुलन खोने के बाद सही इलाज कराकर मुख्यधारा में लौट आए हैं। इस तरह के मामलों को रविवार को रिचमंड फैलोशिप सोसाइटी की लखनऊ ब्रांच द्वारा आयोजित एक राष्ट्रीय वर्कशॉप में प्रस्तुत करते हुए बताया गया कि किस तरह मानसिक रोग में इलाज की सफलता पुनर्वास में परिणित हो सकती है। इस मौके पर देश भर से आए मनोचिकित्सा विशेषज्ञों ने अपने अनुभव साझा किए।
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गोमतीनगर स्थित नव उदय मेंटल हेल्थ इंस्टीट्यूट में आयोजित इस दो दिवसीय कार्यक्रम में लखनऊ ब्रांच के अध्यक्ष डॉ. अनिल अग्रवाल ने बताया 90 प्रतिशत मानसिक रोगियों को इलाज से पुनर्वास किया जा सकता है, लेकिन अधिकतर रोगी चिकित्सकों तक पहुंच ही नहीं पाते हैं। इसके चलते जहां उनका इलाज नहीं हो पाता, वहीं समाज में दूसरे लोग उन्हें ऐसी टिप्पणियां करते हैं, जिनसे उनकी स्थिति और बिगड़ने लगती है। उन्हाेंने बताया कि एक ओर केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक जैसे राज्य अपने यहां कानूनी तौर पर मनोरोगियों के इलाज-पुनर्वास की व्यवस्था कर रहे हैं, वहीं उत्तर प्रदेश में आज भी ऐसा कोई कानून नहीं है। जबकि देश में करीब 60 लाख मनोरोग पीड़ित निवास करते हैं। डॉ. शशि रॉय ने इसके लिए सरकार द्वारा आर्थिक सहयोग बढ़ाने की जरूरत बताई। डॉ. अनिशा शाह और डॉ. मैथ्यू वर्गीस ने भी पुनर्वास के तरीकों पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन आलोक सक्सेना ने किया और सेमिनार के समापन पर सभी का आभार जताया।
देरी से बढ़ती है समस्या
अधिकतर मामलों में मरीज को चिकित्सक तक पहुंचाने में बहुत देर कर दी जाती है। इसकी वजह तथाकथित सामाजिक शर्मिंदगी है। लोगों में यह सोच गहरी पैठ की हुई है कि अगर वे अपने परिवार के सदस्य को मनोचिकित्सक को दिखाएंगे तो लोग सदस्य को घोषित तौर पर पागल कहना शुरू कर देंगे जबकि मनोरोग किसी भी अन्य तरह के रोग की तरह हैं, जिनका समय पर इलाज जरूरी है और इसमें शर्माने की कोई बात नहीं है। इस रोग में परिवार को एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम बनकर रोगी का सहयोगी बनना चाहिए न कि उसे अपने लिए शर्म की वजह मानें। दूसरी ओर समाज को भी एक संवेदनशील रवैया रखना चाहिए।
रिश्तों में अपेक्षाएं प्रमुख वजह
मनोरोगों की ज्यादातर वजह दोस्ती, प्यार और नजदीकी रिश्तों में मिली असफलता या अपेक्षाओं के पूरा न होना है। काउंसिलर शीबा अपने अनुभव बताती हैं कि खुद अपने से जुड़ी अपेक्षाएं पूरी नहीं होने पर भी व्यक्ति टूटने लगता है। ऐसे में परिवार और दोस्तों को व्यक्ति साथ देना चाहिए। उसे अकेला छोड़ने से उसके संभलने के विकल्प खत्म हो जाते हैं। वह भ्रम, अनिंद्रा, अविश्वास, हीन भावना, चिंता और नीरसता से घिर कर मनोरोग का शिकार हो जाता है। एम्स के प्रो. डॉ. सुधीर खंडेलवाल बताते हैं कि इलाज के दौरान भी परिवारों की भूमिका सबसे अहम होती है।