क्यूआर कोड ट्रेसिंग सिस्टम पर चीन का इतना जोर क्यों? कोरोना के नाम पर बने एप से लोगों की निजता में घुसपैठ के आरोप

Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंगHarendra Chaudhary
Wed, 25 Nov 2020 06:45 PM IST
सार
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Why China has so much emphasis on QR code tracing system,  Allegations of intrusion into people privacy with an app named after Corona
Chinese President Xi Jinping - फोटो : ANI

    विस्तार

    चीन ने अपने देश में पिछले अप्रैल में क्यूआर ट्रेसिंग सिस्टम लागू किया था। तब उसकी यह कहकर आलोचना हुई थी कि कोरोना पीड़ितों पर नजर रखने के बहाने चीन अपने देश में आम नागरिकों की निगरानी का सिस्टम बना रहा है। उसके बावजूद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पिछले दिनों जी-20 की शिखर बैठक में यह प्रस्ताव रख दिया कि कोविड-19 क्यूआर कोड ट्रेसिंग सिस्टम को दुनिया भर में अपनाया जाए, ताकि लोग निर्भय होकर अंतरराष्ट्रीय यात्रा कर सकें।

    चीन में आज क्यूआर आधारित हेल्थ सर्टिफिकेट्स का व्यापक रूप से इस्तेमाल हो रहा है। इस सिस्टम में इलेक्ट्रॉनिक बारकोड का इस्तेमाल व्यक्तियों की यात्रा और हेल्थ हिस्ट्री को स्टोर करके रखने के लिए किया जाता है। चीन का दावा है कि ये सिस्टम लागू करने से उसे कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने में मदद मिली है। बारकोड संबंधित व्यक्ति को रंग संकेतों से संभावित कोरोना संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने संबंधी सूचना उसे देता है। रंग ट्रैफिक लाइट जैसे हैं। यानी हरा का मतलब है बिल्कुल सुरक्षित। उसके बाद पीला और फिर लाल संकेत आते हैं।

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    जी-20 की बैठक में शी जिनपिंग ने कहा कि महामारी के दौरान विश्व अर्थव्यवस्था के ठीक से संचालन के लिए यह जरूरी है कि सभी देश एक जैसी नीतियां और मानक अपनाएं। उन्होंने कहा- "चीन ने अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्य क्यूआर कोड के जरिए हेल्थ सर्टिफिकेट की वैश्विक व्यवस्था कायम करने का प्रस्ताव रखा है। हमें उम्मीद है कि अधिक से अधिक देश इस व्यवस्था में शामिल होंगे।" लेकिन शी ने यह साफ नहीं किया कि जिस क्यूआर सिस्टम का प्रस्ताव वे रख रहे हैं, उसका डिजाइन कौन तैयार करेगा और उसका संचालन किसके हाथों में होगा।

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    कोरोना महामारी आने के बाद कई देशों ने अपने नागरिकों की निगरानी के लिए ऐप आधारित सिस्टम लागू किए हैं। उन सबका दावा है कि ये सिस्टम नागरिकों को कोरोना वायरस के संक्रमण के बारे में आगाह कर देता है। लेकिन इन अलग-अलग देशों में लागू प्रणालियों के बीच कोई तालमेल नहीं है। बताया जाता है कि उनकी सफलता के स्तर में भी फर्क है।

    पिछले दिनों ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में बताया गया था कि अगर किसी देश के 56 फीसदी नागरिक भी ट्रेसिंग ऐप का इस्तेमाल करें, तो उससे कोविड-19 का प्रसार रोकने में काफी मदद मिल सकती है। लेकिन कोरोना वायरस एप्स को लेकर यह शिकायत भी उठी है कि इससे लोगों की निजता भंग होती है। खासकर पश्चिमी देशों में इस मुद्दे पर हाल के महीनों में गंभीर बहस हुई है।

    अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन के मुताबिक ब्रिटेन और फ्रांस में बहुत से लोग इसलिए कोरोना वायरस ऐप्स का इस्तेमाल नहीं करना चाहते, क्योंकि उससे उनकी निजी सूचनाएं किसी बाहरी सर्वर पर स्टोर हो जाती हैं। ये सवाल रहा है कि इन सूचनाओं का दुरुपयोग नहीं होगा, इसकी गारंटी कैसे की जाएगी।

    इसीलिए जब से शी जिनपिंग ने ये प्रस्ताव रखा है, पश्चिमी देशों में उस पर कड़ी प्रतिक्रिया देखी गई है। हांगकांग स्थित चाइनीज यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर स्टुअर्ट हरग्रीव्स ने एक मीडिया इंटरव्यू में कहा कि क्यूआर कोड अनिवार्य रूप से निजता का उल्लंघन नहीं करते। लेकिन अगर इनके जरिए किसी और सर्वर पर व्यक्तियों की स्वास्थ्य संबंधी सूचनाओं को स्टोर करके रखा जाता है, तो निजता का मुद्दा अहम हो जाता है। खासकर ऐसा इसलिए है, क्योंकि जिसकी सूचना ली जाती है, खुद उसे पता नहीं होता कि उसकी कौन-सी सूचनाएं ली गईं, उन्हें कहां रखा गया है और उनका किस तरह का इस्तेमाल होगा।

    ऑस्ट्रेलिया के बायो-सिक्युरिटी विशेषज्ञ रेना मैकलनटाइर ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय कोरोना वायरस एप के साथ सबसे बड़ी समस्या डाटा की निजता संबंधी सुरक्षा की होगी। अगर डाटा विश्व स्वास्थ्य संगठन या संयुक्त राष्ट्र के पास रहे, तो फिर कम सवाल उठेंगे। वरना, यह सवाल बना रहेगा कि किसी एक देश के नागरिक की सूचनाएं किसी दूसरे देश की सरकार के पास क्यों रहनी चाहिए?

    चीन ने ये प्रस्ताव उस समय रखा है, जब चीन की 5जी टेक्नोलॉजी को लेकर दुनिया भर में विरोध देखने को मिला है। अमेरिका और कई यूरोपीय देशों ने चीनी कंपनी हुवावे की 5जी टेक्नोलॉजी पर रोक लगा दी है और दूसरे देशों से भी ऐसा करने को कहा है। वैसे समय में चीन के क्यूआर कोड को दुनिया में ज्यादा समर्थन मिल सकेगा, इसकी संभावना कम ही है।

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