सावधानः इन नंबरों के इस्तेमाल से हो सकती है जेल

क्या आपको पता है कि कुछ अंकों को दूसरे से साझा करने पर पाबंदी है? चौंक गए न! आप ये सोच रहे होंगे कि अंकों पर भला कोई कैसे पाबंदी लगा सकता है? पर ये बात सही है। दुनिया में कुछ ऐसे नंबर्स हैं, जिन्हें, बिना इजाजत या बिना पैसे दिए इस्तेमाल करने और शेयर करने पर रोक लगी है। अगर आप ऐसा करते हैं तो कानूनन जुर्म करते हैं।
इसके लिए आप पर जुर्माना भी हो सकता है और आपको जेल की हवा भी खानी पड सकती है। वैसे ये अंक सामान्य नहीं हैं। खास तरह के और लंबी सीरिज के नंबर होते हैं। असल में ये किसी खास प्रोग्राम के, फिल्म के कंप्यूटर कोड होते हैं। इन कोड्स का कुछ कंपनियों के पास कॉपीराइट होता है।
उनकी इजाजत के बगैर, या फिर उन्हें पैसे दिए बगैर आप इन्हें इस्तेमाल नहीं कर सकते। अगर आपने पैसे देकर खास कोड हासिल कर भी लिया है तो उसे दूसरों से मुफ्त में साझा करना भी कई बार गैरकानूनी होता है। क्या आप अंकों के मकडजाल में उलझा हुआ महसूस कर रहे हैं? चलिए बात को समझने के लिए वक्त का पहिया थोडा पीछे घुमाते हैं।
बात 1999 की है। नॉर्वे के एक लडके, जॉन योहानसेन ने अपने दो साथियों के साथ मिलकर एक कंप्यूटर प्रोग्राम तैयार किया था। इस कंप्यूटर प्रोग्राम का नाम DeCSS था। इसकी मदद से जॉन और
उनके साथियों ने ताजा-ताजा रिलीज हुई हॉलीवुड फिल्म 'द मैट्रिक्स' को डाउनलोड कर लिया।
किसी कंप्यूटर प्रोग्राम का अंकों से क्या ताल्लुक?

जॉन के कंप्यूटर प्रोग्राम DeCSS की खूबी ये थी कि इसकी मदद से लोग ऐसी ही डीवीडी में सेंध लगाकर उसे डाउनलोड कर सकते थे। इसके लिए उन्हें न कंपनी की इजाजत की जरूरत थी, न पैसे
खर्च करने की। अगर इस कार्यक्रम का बहुत से लोग इस्तेमाल करने लगते, तो फिल्म की डीवीडी बेचने वाली कंपनी को तगडा झटका लगना तय था।
सीलिए जब कंपनी को जॉन के कंप्यूटर प्रोग्राम DeCSS के बारे में पता चला तो उसने जॉन पर कॉपीराइट के उल्लंघन का मुकदमा कर दिया। हालांकि जॉन तो बच निकले। पर उनके कंप्यूटर प्रोग्राम से नई बहस छिड गई। बहस ये थी कि क्या कुछ अंकों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई जा सकती है?
आप पूछेंगे कि किसी कंप्यूटर प्रोग्राम का अंकों से क्या ताल्लुक? असल में हर कंप्यूटर प्रोग्राम कुछ खास अंकों का कोड होता है। अब जिस भी कंपनी ने ये कोड तैयार किया है, उसका इस पर कॉपीराइट
होता है। उसकी इजाजत के बगैर वो खास कोड या नंबर इस्तेमाल करना गैरकानूनी है।
मगर इसके विरोधी लोगों का कहना है कि किसी नंबर पर किसी का हक कैसे हो सकता है? वो तो सबके इस्तेमाल के लिए हैं। अगर किसी ने उन खास अंकों में अपना प्रोग्राम कोड कर दिया है तो
उसके लिए दूसरों के उस खास नंबर्स के इस्तेमाल करने पर पाबंदी क्यों लगे?
जब जॉन के DeCSS प्रोग्राम पर कंपनियों ने शिकंजा कसना शुरू किया। तो अंकों के इस्तेमाल की आजादी के समर्थकों ने इसे जोर-शोर से इंटरनेट पर शेयर करना शुरू कर दिया। इसकी कई कॉपी बन
गईं। किसी ने गानों की शक्ल में कॉपी किया तो किसी ने नंबर्स की शक्ल में।
काफी विवादित और चर्चित था यह कंप्यूटर कोड मामला

विरोध करने वालों का कहना था कि किसी खास विचार पर रोक नहीं लगाई जा सकती। इस पूरे मसले पर नजर रखने वाले अमरीकी एक्सपर्ट डेव टोर्ट्जकी कहते हैं कि दुनिया भर के कंप्यूटर प्रोग्रामर्स ने इस मामले में खूब दिलचस्पी ली। उस दौर में किसी खास कोड पर पाबंदी लगाने का ये पहला बडा मामला था।
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के इंजीनियर फिल कार्मोडी ने तो विरोध जताने के लिए DeCSS प्रोग्राम को ही नए कंप्यूटर कोड की शक्ल में ढाल दिया। ये 1905 अंकों का एक पूर्णांक था। फिल का ये कोड कुछ
ज्यादा ही लंबा था। लेकिन कंप्यूटर और अंकों के इतिहास में ये एक बहुत बडा पडाव था।
अब इस अंक पर कोई अदालत या कोई कानून पाबंदी नहीं लगा सकता था। हालांकि बाद में फिल कार्मोडी ने खुद लिखा कि किसी खास कोड की मदद से बिना पैसे दिए किसी डीवीडी को डाउनलोड करना या इस्तेमाल करना गैरकानूनी है। लेकिन, जिस तरह अमरीकी कानून लागू किया जा रहा है वो भी गलत है।
क्योंकि ये कानून आम लोगों के लिए नहीं, बडी कंपनियों का मददगार है। DeCSS कार्यक्रम के हवाले से विरोध की मुहिम में शामिल थे एक और कंप्यूटर प्रोग्राम, सेथ शोएन। वो इलेक्ट्रॉनिक फ्रंटियर फाउंडेशन में काम करते हैं। उन्होंने हैकू भाषा में DeCSS प्रोग्राम का गीत तैयार किया था।
कार्मोडी की कोशिश काबिले तारीफ थी

वो कहते हैं कि फिल कार्मोडी की कोशिश काबिले तारीफ थी। अगर जॉन योहानसन का DeCSS प्रोग्राम उन्होंने अंकों में कोड कर लिया। तो, इसका मतलब वो प्रक्रिया कुदरती तौर पर हो रही थी,
तभी तो उसे अंकों में ढाला जा सका।
वैसे कार्मोडी के इस कारनामे से पहले ही कुछ पूर्णांकों के गैरकानूनी होने की चर्चा कंप्यूटर की दुनिया में चल रही थी। कानून के प्रोफेसर इबेन मोग्लेन कहते हैं कि कोई भी कंप्यूटर फाइल, अंकों में ही
लिखी जाती है। इन्हें बाइनरी नंबर कहते हैं। एक और जीरो के ये समूह मिलकर एक खास पूर्णांक बनते हैं।
जैसे कि कोई बहुत बडा नंबर, माइक्रोसॉफ्ट वर्ड का कोड हो सकता है। इस पर माइक्रोसॉफ्ट का कॉपीराइट है। अगर आप ये नंबर इस्तेमाल करते हो, दूसरों में बांटते हो तो आपको सजा हो सकती है।
DeCSS एपिसोड के कुछ साल बाद कंप्यूटर की दुनिया में कुछ और ऐसे मामले सामने आए।
इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में ही कुछ हाई डेफिनिशन डीवीडी और ब्लू रे डिस्क के कोड सार्वजनिक कर दिए गए। इसे अंको के शॉर्ट कोड में लिखकर लोगों ने खूब शेयर किया। कई लोगों ने तो इसक टैटू भी गुदवा लिए थे।
अमरीकी संस्थाओं, मोशन पिक्चर्स एसोसिएशन ऑफ अमेरिका और एक्सेस कंटेंट सिस्टम लाइसेंसिंग एडमिनिस्ट्रेटर ने लोगों से अपील की कि वो ये कोड न शेयर करे। मगर लोगों ने ये अपील अनसुनी
कर दी। इस मुहिम की अगुवा थी डिग नाम की एक वेबसाइट।
उस वेबसाइट ने भी ये खास कोड हटाने से इनकार कर दिया। और कहा कि वो इससे पैदा हुई कानूनी चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार है। आज भी ये कोड खुले तौर पर उपलब्ध हैं।
इन अंकों को खास तरह से लिखकर इस्तेमाल करने पर रोक है

वैसे कई बार अंकों पर पाबंदी सिर्फ कंप्यूटर के कोड की वजह से नहीं लगती। इसकी और वजहें भी हो सकती हैं। जैसे कि अमरीका के कई स्कूलों में कुछ खास नंबर लिखे कपडे पहनने पर रोक है। कोलोराडो में एक स्कूल अधीक्षक ने इसकी वजह बताई, उन्होंने कहा कि 18, 81, 13, 31, 14 और 41 नंबरों का ताल्लुक कुछ आपराधिक संगठनों से है।
कई गैंग इन नंबरों से अपनी पहचान बनाते हैं। बच्चों का इन अपराधियों की तरफ झुकाव न हो जाए, इसलिए ये नंबर लिखे कपडे पहनने पर रोक है। इसी तरह चीन में तियानमेन स्क्वॉयर में 1989 में हुई घटना के चलते 4 जून 1989 अंकों को इंटरनेट पर सर्च करने पर रोक लगी हुई है। जबकि ये अंक और बातें भी जाहिर कर सकते हैं।
एक तरह से इन अंकों को खास तरह से लिखकर इस्तेमाल करने पर रोक है। मगर, रोक तो फिर भी है। कानून के जानकार, इन पाबंदियों को जायज ठहराते हैं। आज कंप्यूटर हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गए हैं। तो अंकों के इस्तेमाल और उन पर पाबंदी का ये विवाद फिलहाल सुलझने के आसार नहीं हैं।
आज आतंकी वारदातों के चलते कुछ नेता, संदेशों के एनक्रिप्शन को खत्म करने की बात कर रहे हैं। वहीं एनक्रिप्शन के हामी लोग इसे लोगों की प्राइवेसी में दखल मानते हैं। एनक्रिप्शन ठीक वही चीज
है, जैसे कि 'द मैट्रिक्स' फिल्म की डीवीडी का वो कोड जो जॉन योहानसन ने तोडा था DeCSS की मदद से।
विकीपीडिया के संस्थापक जिम्मी वेल्स कहते हैं कि अंकों पर पाबंदी हास्यास्पद है। वहीं वकीलों और अफसरों की नजर में ये जरूरी है। वजह ये कि बहुत सी चीजें हैं जो अब नंबर्स में सिमट जाती हैं।
लेकिन अंकों का खेल ऐसा है कि इन पर पूरी तरह से पाबंदी लगाना नामुमकिन है। आखिर गणित पढने और गणित करने से कौन किसे रोक सकता है?