रिपोर्ट: क्या आपके बच्चे का फोन असुरक्षित है? एआई से लेकर सोशल मीडिया तक, यूनिसेफ की सर्वे ने बढ़ाई चिंता
एक ओर इंटरनेट ने बच्चों के लिए पढ़ाई, मनोरंजन और एक-दूसरे से जुड़ना आसान बना दिया है, तो दूसरी ओर ऑनलाइन सुरक्षा का खतरा भी तेजी से बढ़ा है। बच्चों की सुरक्षा को लेकर यूनिसेफ ने हाल ही में एक चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की है। आइए जानते हैं इस रिपोर्ट में ऐसा क्या सामने आया है, जिसने पूरी दुनिया में चिंता बढ़ा दी है।

विस्तार
यूनिसेफ की एक नई और चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, 21 देशों में लगभग दो करोड़ इंटरनेट उपयोग करने वाले बच्चों को केवल एक साल के अंदर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर यौन शोषण या उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। इसमें सबसे ज्यादा मामले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर दर्ज किए गए हैं। इस गंभीर स्थिति के पीछे क्या कारण हैं और एआई का इसमें क्या खतरनाक रोल है? जानिए इस रिपोर्ट में विस्तार से...
ऑनलाइन दुनिया में बच्चों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
इंटरनेट ने बच्चों के कई नए रास्ते खोले हैं, लेकिन इसके साथ ऑनलाइन सुरक्षा का खतरा भी तेजी से बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र की बाल एजेंसी यूनिसेफ की नई रिपोर्ट ने बच्चों के ऑनलाइन यौन शोषण और उत्पीड़न को लेकर गंभीर तस्वीर सामने रखी है। रिपोर्ट के अनुसार, 21 देशों में करीब 2 करोड़ इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले बच्चों ने एक साल के दौरान डिजिटल प्लेटफॉर्म पर यौन शोषण या उत्पीड़न का सामना किया। इनमें ज्यादातर मामले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े थे।
किन उम्र के बच्चों पर ज्यादा असर?
यूनिसेफ की इस रिपोर्ट में अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका और पूर्वी यूरोप के आंकड़ें दर्ज किए गए हैं। इनमें 12 से 17 साल की उम्र के पांच में से एक से ज्यादा बच्चों ने बताया कि सर्वे से पहले वाले साल में उन्होंने ऑनलाइन कम से कम एक तरह के यौन शोषण या उत्पीड़न का अनुभव किया। यानी हर पांच बच्चों में एक से ज्यादा बच्चे इस तरह के अनुभव से प्रभावित हुए है। यूनिसेफ के मुताबिक, यह समस्या अलग-अलग क्षेत्रों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर व्यापक रूप से मौजूद है।
सर्वें में क्या सामने आया?
- सर्वे में चौंकाने वाले आंकड़ें सामने आए हैं। इसमें पाया गया कि करीब 1.5 करोड़ बच्चों को अनचाही यौन सामग्री का सामना करना पड़ा। वहीं करीब 90 लाख बच्चों पर यौन बातचीत करने या यौन तस्वीरें साझा करने का दबाव बनाया गया। लगभग 40 लाख बच्चों की यौन तस्वीरें उनकी सहमति के बिना साझा की गईं। यूनिसेफ का कहना है कि अगर इस समस्या को वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो प्रभावित बच्चों की संख्या कई करोड़ तक पहुंचने की संभावना है।
- आपको बता दें यह अध्ययन 2020 से 2026 के बीच करीब 21 देशों में किए गए राष्ट्रीय सर्वेक्षणों पर आधारित है। इनमें केन्या, पाकिस्तान, ब्राजील और सर्बिया जैसे देश भी शामिल हैं। यानी कुल मिलाकर करीब 21 हजार इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले बच्चों से जुड़ा डेटा इस अध्ययन में शामिल किया गया। यूनिसेफ ने इसे इस तरह के सबसे बड़े अध्ययनों में से एक बताया है।

60 फीसदी मामले सोशल मीडिया पर
इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सोशल मीडिया को ऑनलाइन यौन शोषण बड़ा माध्यम बना है। इसमें लगभग 60 फीसदी रिपोर्ट किए गए मामले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ही हुए हैं। इनमें फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं। वहीं करीब 14 फीसदी मामले ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े थे। इससे पता चलता है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा की चुनौती सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है।
कई मामलों में आरोपी बच्चा पहले से जानता था
ऑनलाइन शोषण के मामलों में एक और चिंताजनक बात सामने आई है कि इसमें आधे से ज्यादा मामलों में आरोपी बच्चे का पहले से जाना-पहचाना व्यक्ति था। इनमें दोस्त, रिश्तेदार या रोमांटिक पार्टनर शामिल थे। वहीं करीब 38 फीसदी मामलों में बच्चे ने आरोपी से पहली बार ऑनलाइन मुलाकात की थी। इससे यह भी सामने आता है कि बच्चों के लिए खतरा सिर्फ किसी अनजान व्यक्ति से नहीं, बल्कि उनके परिचित लोगों से भी हो सकता है।

कितने मामलों की हुई रिपोर्ट?
चिंता की बात तो यह भी है कि इतने बड़े पैमाने पर घटनाएं सामने आने के बावजूद रिपोर्टिंग बेहद कम रही। पुलिस, सामाजिक कार्यकर्ता या हेल्पलाइन तक पहुंचने वाले मामले एक फीसदी से भी कम थे। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में बच्चे ऑनलाइन शोषण या उत्पीड़न का सामना करने के बाद भी मदद के लिए आगे नहीं आ रहे हैं।
एआई से बढ़ा एक नया खतरा
रिपोर्ट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई से जुड़े खतरे को भी गंभीरता से उठाया गया है। नौ देशों के आंकड़ों के अनुसार, अनुमानित 11 लाख बच्चों ने बताया कि उनके बारे में एआई से बनाई गई यौन तस्वीरें या वीडियो तैयार किए गए। एआई टूल्स के तेजी से इस्तेमाल के बीच बच्चों की तस्वीरों और पहचान का गलत इस्तेमाल एक नई चुनौती बनकर सामने आया है।
मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर
सबसे बड़ा खतरा है कि ऑनलाइन यौन शोषण या उत्पीड़न का असर सिर्फ डिजिटल दुनिया तक सीमित नहीं रहता। ऐसे अनुभवों का बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे अनुभव झेलने वाले बच्चों में आत्महत्या के विचार या आत्म-नुकसान की संभावना करीब चार गुना ज्यादा पाई गई। इन बच्चों में चिंता का स्तर भी काफी अधिक था।
बच्चे चुपचाप सहते रहते हैं: यूनिसेफ
यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसेल ने कहा कि इस तरह के अनुभव बच्चों के लिए गहरा भावनात्मक और मानसिक संकट पैदा करते हैं। उनके अनुसार, कई बच्चे इस तरह की घटनाओं को चुपचाप सहते रहते हैं क्योंकि उन्हें पता नहीं होता कि मदद के लिए कहां जाना है।
सरकारों और टेक कंपनियों से सुरक्षा बढ़ाने की अपील
यूनिसेफ ने सरकारों और टेक कंपनियों से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों की सुरक्षा के उपाय मजबूत करने की अपील की है। एजेंसी ने कहा है कि बदलते ऑनलाइन शोषण के तरीकों से निपटने के लिए कानूनों को अपडेट करने की जरूरत है। इसमें एआई से बनाई जाने वाली यौन सामग्री जैसे नए खतरों को भी शामिल करना होगा।
इसके साथ ही बाल संरक्षण व्यवस्था और रिपोर्टिंग सिस्टम को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है, ताकि बच्चे ऑनलाइन शोषण या उत्पीड़न का सामना करने पर आसानी से मदद हासिल कर सकें।
सोशल मीडिया और एआई के दौर में बढ़ी जिम्मेदारी
एक्सपर्ट्स कहते हैं कि यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा अब सिर्फ माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं रह गई है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, टेक कंपनियों और सरकारों को भी बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था तैयार करनी होगी। खासकर एआई के बढ़ते इस्तेमाल के बीच बच्चों की तस्वीरों और निजी जानकारी के दुरुपयोग को रोकना आने वाले समय की बड़ी चुनौती बन सकता है।