न चंदा मामा दूर, न तारे, तकनीक से करीब आए अंतरिक्ष के नजारे

तकनीक ने हमारी दुनिया को कितनी तेजी से बदला है इसका अंदाजा लगाना तो मुश्किल है लेकिन इतना तो जरूर है कि पहले हम जो केवल सपनों में देखा करते थे उसे तकनीक की मदद से हम पूरा कर रहे हैं। अंतरिक्ष की दुनिया में भी तकनीक ने अप्रत्याशित क्रांति ला दी है। पुरातन काल से ही मनुष्यों के लिये अंतरिक्ष और उसकी यात्रा एक कौतुहल का विषय रहा है। भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के विद्वान सूरज, तारों और दूसरे ग्रहों-उपग्रहों के बारे में ज्ञान जुटाते रहे हैं।
आधुनिक काल में भी लगातार इस दिशा में विद्वान काम कर रहे हैं लेकिन 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में रॉकेट के आविष्कार ने इस दिशा में क्रांति ला दी। इस आविष्कार ने खगोल विज्ञानियों को एक ऐसी ताकत दी जिससे की वह धरती के गुरुत्वाकर्षण के विपरीत अंतरिक्ष की कक्षा में जा सकें। बस यहीं से शुरुआत हो गई अंतरिक्ष में मानवों के दखल की और उनके खोज की। अंतरिक्षयान के लिए रॉकेट इंजन बनाये जाने का काम 20वीं सदी में तीन देशों में एक साथ शुरु हुआ। इसमें तीन वैज्ञानिकों का प्रमुख योगदान रहा है, जिसमें रूस के कॉन्स्टेंटिन सिओलकॉवस्की, अमेरिका के रॉबर्ट गोडार्ड और जर्मनी के हर्मन ओबर्थ का नाम प्रमुख है।
नाजी जर्मनी ने 1930-40 के दशक में लंबी दूरी के रॉकेट का प्रयोग कर मानवों को चंद्रमा पर भेजने की संभावनाओं पर जोर दिया। इसके कुछ ही साल बाद द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लंदन पर वी-2 मिसाइल से हमला किया गया था जिसकी मारक क्षमता 200 मील थी। यह मिसाइल इंग्लिश चैनल से 60 मील की ऊंचाई पर 3,500 मील प्रति घंटे की रफ्तार से दागा गया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और रूस ने अपना खुद का मिसाइल कार्यकम शुरू किया।
सोवियत संघ ने 4 अक्टूबर 1957 को दुनिया का पहला कृत्रिम उपग्रह स्पूतनिक-1 अंतरिक्ष में छोड़कर धरती से बाहर की दुनिया में अपना पहला कदम रख दिया। इसके बाद अमेरिका ने भी अंतरिक्ष में अपने कदम बढ़ा बढ़ाए और तकनीक के दम पर यहीं से शुरुआत हुई मानवों की अंतरिक्ष यात्रा की। इसके चार साल बाद 12 अप्रैल 1961 में रूस के लेफ्टिनेंट यूरी गागारिन वोस्टोक-1 में धरती की कक्षा में जाने वाले व्यक्ति बनें। उनका यान अंतरिक्ष में करीब 108 मिनट तक रहा और गागारिन करीब 327 किमी की ऊंचाई तक पहुंचे थे।
कृत्रिम उपग्रह के विकास की कहानी

उपग्रह एक ऐसे ग्रह को कहते हैं जो किसी बड़े ग्रह के चारों ओर परिक्रमा करता है लेकिन वर्तमान में हम जिस उपग्रह की बात कर रहे हैं उसे कृत्रिम उपग्रह के नाम से जाना जाता है। ये उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में चारों तरफ दुनियाभर का चक्कर लगाते हैं। इन उपग्रहों का निर्माण मानवों ने तकनीक के दम पर किया। तो आइए जानते है कि कैसे हुआ इस कृत्रिम उपग्रह का विकास। दुनिया का सबसे पहला कृत्रिम उपग्रह सोवियत संघ ने 4 अक्टूबर 1957 को अंतरिक्ष में छोड़ा जिसका नाम स्पूतनिक-1 था।
इसके अगले ही साल अमेरिका ने 31 जनवरी 1958 को पृथ्वी की कक्षा में अपना उपग्रह स्थापित किया। इस उपग्रह को एक्सप्लोरर-1 का नाम दिया गया। यहीं से उपग्रहों की विकास यात्रा की शुरुआत हुई। तब से लेकर अबतक हजारों उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया जा चुका है। दुनिया में करीब 40 ऐसे देश हैं जो सैटेलाइट का निर्माण करने में सक्षम है लेकिन उसे अंतरिक्ष में भेजने की क्षमता केवल दश ही देशों के पास है जिनमें अमेरिका, रूस, चीन और भारत जैसे देश शामिल हैं। एक आंकड़े के अनुसार अबतक कुल 6,600 उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजा जा चुका है जिनमें से केवल 3,600 पृथ्वी की कक्षा में बनें हुए हैं। उनमें से केवल 1 हजार ही ऐसे उपग्रह हैं जो ठीक से काम करते हैं, बाकि सब उपग्रह बेकार हो चुके हैं और पृथ्वी की कक्षा में इधर उधर चक्कर लगा रहे हैं। इसने अंतरिक्ष कचरे के रुप में भी जाना जाता है।
अबतक अलग अलग काम में आने वाले कई उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजा गया है जिनमें खगोलीय, संचार, नेविगेशन, मारक, टोही, पृथ्वी अवलोकन, आकाश और मौसम उपग्रह प्रमुख हैं। इन उपग्रहों का प्रयोग अलग अलग काम के लिए किया जाता है। आज इन्हीं उपग्रहों की देन है कि हम घर में बैठे दुनिया के किसी कोने में खेले जा रहे क्रिकेट और फुटबाल मैच का सीधा प्रसारण अपने टीवी सेट पर देख पाते हैं। अगर रास्ता भटक गए तो नेवीगेशन के जरिए मोबाइल में ही रास्ता तलाश सकते हैं। दुनिया के किसी भी कोने में फोन से बात कर सकते हैं। यह सब तकनीक का ही कमाल है।
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थित एक प्रयोगशाला है। यह एक ऐसा कृत्रिम उपग्रह है जिसे मानवों के रहने योग्य बनाया गया है। इस स्टेशन में दुनियाभर के कई वैज्ञानिक कई महीनों तक रहकर शोध कार्य करते हैं। ऊंचाई पर उड़ते इस प्रयोगशाला का निर्माण कई देशों के सहयोग से किया गया है जो अंतरिक्ष अंवेषण में वैश्विक सहयोग का प्रतीक है। जो देश पहले एक दूसरे के कट्टर दुश्मन थे उन्होंने भी इस दिशा में एक साथ मिलकर काम किया।
इसका जीता जागता उदाहरण अमेरिका और रूस हैं। दुश्मनी के बावजूद इन दोनों देशों नें अंतरिक्ष में साथ मिलकर काम किया और आज भी कर रहे हैं। आईएसएस के पुर्जों को रूस के प्रोटॉन और सोयुज रॉकेटों के जरिए और अमेरिका के स्पेस शटल के जरिए अंतरिक्ष में भेजा गया था। इसका सबसे पहला पुर्जा 1998 में पृथ्वी की कक्षा में भेजा गया था। तब से लेकर आजतक इसमें कोई न कोई नया पुर्जा जोड़ा जा रहा है और वर्तमान में यह दुनिया का सबसे बड़ा कृत्रिम उपग्रह है जिसे धरती पर नंगी आंखों से भी देखा जा सकता है।
आईएसएस सूक्ष्म गुरुत्व में अंतरिक्ष के वातावरण में अनुसंधान प्रयोगशाला के रूप में कार्य करता है जिसमें चालक दल के सदस्य जीव विज्ञान, मानव जीव विज्ञान, भौतिक विज्ञान, खगोल विज्ञान, मौसम विज्ञान और अन्य क्षेत्रों में प्रयोगों का संचालन करते हैं।
कब और कैसे शुरू हुई अंतरिक्ष की सैर

धरती पर रहने वाला हर इंसान जानना चाहता है कि आखिर धरती के बाहर की दुनिया कैसी है। दूर से जो चांद तारे दिखाई देते हैं वे वास्तव में पास से कैसे दिखते होंगे। अंतरिक्ष के कई ऐसे अनसुलझे राज है जिनको जानने के लिए हम बेताब रहते हैं। हमारी इस बेताबी को तकनीक ने कई दशक पहले ही दूर कर दिया।
तकनीक के दम पर ही सबसे पहले सोवियत रूस ने अंतरिक्ष की दुनिया में अपना पहला कदम रखा। 12 अप्रैल 1961 में रूस के लेफ्टिनेंट यूरी गागारिन वोस्टोक-1 में धरती की कक्षा में जाने वाले व्यक्ति बनें। इसके बाद साल 1961 में एलन शेफर्ड अंतरिक्ष में उड़ने वाले पहले अमेरिकन बनें। 20 फरवरी 1962 को जॉन ग्लेन के ऐतिहासिक उड़ान ने उन्हें पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगाने वाला पहला अमेरिकन बना दिया। यहीं से मानव की अंतरिक्ष यात्रा की शुरुआत हो गई।
अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी ने 1961 में एक दशक के अंदर मानव को चंद्रमा पर उतारने और उसे सुरक्षित धरती पर वापस लाने का एक राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित किया। उनके इसी लक्ष्य की देन थी कि 20 जुलाई 1969 में अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग ने चंद्रमा पर अपना पहला कदम रख इसे पूरे मानव सभ्यता के लिए एक ‘ऐतिहासिक कदम’ बना दिया। तब से लेकर अबतक कई वैज्ञानिक अंतरिक्ष की यात्रा कर चुके हैं। पुरुषों के अलावा कई महिलाओं ने अंतरिक्ष में अपने कदम रखे हैं। वेलेंटिना टेरेश्कोवा अंतरिक्ष में जाने वाली पहली महिला हैं। इस दिशा में भारत भी पीछे नहीं रहा।
भारत के राकेश शर्मा को 1984 में रूस और भारत के संयुक्त अभियान के लिए चुना गया। 2 अप्रैल 1984 को रूस के शिप कमांडर यूरी मलिशेव और फ्लाइट इंजिनियर गेनाडी स्ट्रेकालोव के साथ उन्होंने चांद पर अपने कदम रखे। इन तीनों 7 दिन 21 घंटे और 40 मिनट तक रहे। पिछले 14 सालों से लगातार धरती के मानव अंतरिक्ष में बनें हुए हैं। अंतरिक्ष यात्रा की शुरुआत से लेकर अबतक हजारों अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष की यात्रा कर चुके हैं और यह सब तकनीक की ही देन है।
चांद पर बस्ती बसाने की तैयारी

तकनीक ने मानव को वह ताकत दी जिससे वह अपने सपनों न सिर्फ पूरा कर रहा है बल्कि उसको जी भी रहा है। धरती पर रहने वाला इंसान अब चंद्रमा और दूसरे ग्रहों पर घर बनाने के लिए सोच रहा है। चंद्रमा के साथ-साथ अब मंगल ग्रह पर मनुष्यों को भेजने की तैयारियां चल रही हैं। चंद्रमा पर घर बनाने के लिए दुनिया में कई व्यावसायिक कंपनियां तेजी से काम कर रही हैं। हाल ही में नासा ने भी चंद्रमा पर एक गांव बसाने की बात कही है।
नासा का कहना है कि उस गांव में केवल कुछ घर, चर्च और जीने के साधन नहीं रहेंगे बल्कि रोबोट की मदद से वहां हर संभव सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। इसके अलावा कई ऐसी कंपनियां है जो व्यावसायिक उड़ान की तैयारी में लगी हैं। इनमें वर्जिन गैलेक्टिक और स्पेस एक्स प्रमुख हैं। जहां लोग चांद पर जाने और वहां घर बसाने की बात कर रहे हैं वहीं प्राइवेट स्पेस फ्लाइट कंपनी स्पेस एक्स की नींव रखने वाले अरबपति एलॉन मस्क मंगल पर 80 हजार लोगों को भेजने की तैयारी कर रहे हैं।
इसके लिए हर शख्स को पांच लाख डॉलर, यानी 2.77 करोड़ रुपये खर्च करना होगा। हालांकि, यह सपना कब पूरा होगा यह ठीक से कहा नहीं जा सकता लेकिन तकनीक ने इंसान को वह ताकत दी है कि जिससे वह धरती के बाहर भी घर बसाने की तैयारी कर रहा है।
पृथ्वी से परे जीवन की तलाश

मानव जीवन की शुरुआत से ही लोग पराग्रहियों की बात करते आ रहे हैं। हमारे इतिहास के साथ ही दुनियाभर में कई ऐसे जगह है जहां पराग्रहियों के आने के सबूत मिले हैं। अक्सर ऐसा सुनने को मिलता रहा है की दुनिया के किसी कोने में उड़नतस्तरी देखी गई है। एलियन्स पर अबतक न जाने कितनी ही सीरियल और फिल्में बन चुकी हैं। यह सब इस बात की ओर ही इशारा करती है कि हमारे अलावा भी ब्रह्मांड में कहीं जीवन जरूर है। दूसरे ग्रहों पर जीवन की तलाश में दुनिया के कई देश काम भी कर रहे हैं। कई बार नासा ने भी दूसरे ग्रहों पर एलियन देखने का दावा किया है।
खैर, अब एलियन को खोजे तो कैसे? तो इसका जवाब है तकनीक से। इस दिशा में तकनीक ने इतना विकास कर लिया है कि धरती से कई अरब मील दूर स्थित ग्रहों के बारे में भी जानकारियां इकट्ठी की जा रही हैं इस उम्मीद में की कहीं तो दूसरा जीवन मिले। ऐसा नहीं है कि केवल हम ही दूसरे ग्रहों पर जीवन की तलाश कर रहे हैं बल्कि दूसरी दुनिया के लोग भी शायद हमारी तलाश कर रहे हों। ऐसा माना जाता है कि दुनिया में कई ऐसे जगह हैं जहां एलियन उतरे थे। उन्हीं में एक है अमेरिका का 'एरिया 52'। यह एक पूर्ण प्रतिबंधित मिलिटरी क्षेत्र है जिसके ऊपर से परिंदों के उड़ने पर भी पाबंदी है।
ऐसा माना जाता है कि कई दशक पहले यहां एक अनआइडेंटिफाइड फ्लाइंग ऑबजेक्ट (यूएफओ) क्रैश कर गया था और वहां कुछ एलियन्स उतरे थे। इस इलाके को बाद में सरकार ने प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित कर दिया था। इस दिशा में अपनी खोज को और बढ़ाने के लिए हाल ही में दुनिया के मशहूर वैज्ञानिक स्टीफन विलियम हॉकिन्स के नेतृत्व में एक 10 करोड़ डॉलर की परियोजना का शुरुआत हुआ। इस परियोजना का मुख्य लक्ष्य धरती के बाहर दूसरे जीवन की तलाश करना है।