Innovation: भारतीय वैज्ञानिकों की अनोखी खोज, जूतों की बदबू पर रिसर्च से मिला आईजी नोबेल पुरस्कार
भारतीय शोधकर्ताओं ने जूतों की बदबू पर अनोखा वैज्ञानिक समाधान खोजा। यूवीसी लाइट से बैक्टीरिया खत्म कर उन्होंने आईजी नोबेल प्राइज जीता। जानें पूरी रिपोर्ट।

विस्तार
भारत के शोधकर्ताओं ने एक आम लेकिन परेशान करने वाली समस्या, बदबूदार जूतों पर वैज्ञानिक रिसर्च की और इसके लिए उन्हें आईजी नोबेल प्राइज 2025 से सम्मानित किया गया। शिव नादर यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर विकाश कुमार और उनके पूर्व छात्र सार्थक मित्तल ने यह साबित किया कि जूतों में बदबू का असली कारण जगह की कमी नहीं, बल्कि उनमें पनपने वाले बैक्टीरिया हैं।
कैसे खत्म हुई जूतों की बदबू?
शोध में सामने आया कि पसीने से गीले जूतों में कायटोकोकस सेडेनटेरियस नाम का बैक्टीरिया बदबू पैदा करता है। इसे हटाने के लिए वैज्ञानिकों ने यूवीसी लाइट का इस्तेमाल किया। नतीजा यह रहा कि सिर्फ 2–3 मिनट में बदबू लगभग पूरी तरह खत्म हो गई।
क्या हैं आईजी नोबेल प्राइज और क्यों है ये खास?
यह पुरस्कार हर साल ऐसे शोध को दिया जाता है जो पहले लोगों को हंसाता है और फिर सोचने पर मजबूर करता है। इसका मकसद विज्ञान की मजेदार और रचनात्मक साइड को दुनिया के सामने लाना है। आईजी नोबेल पुरस्कार 1991 में विज्ञान हास्य पत्रिका अनल्स ऑफ इंप्रोबेबल रिसर्च द्वारा शुरू किए गए थे। समारोह हर साल बोस्टन में आयोजित होता है और इसमें पेपर एयरप्लेन, मिनी-ओपेरा और असली नोबेल विजेताओं द्वारा पुरस्कार वितरण जैसी मजेदार रस्में होती हैं।
अन्य दिलचस्प विजेता
जापान के वैज्ञानिकों को गायों को पेंट कर मक्खियों से बचाने का समाधान खोजने पर सम्मान मिला। टोगो और इटली के शोधकर्ताओं ने छिपकली और पिज्जा के बीच अनोखा रिश्ता खोजा। वहीं एक और टीम ने पाया कि लहसुन डालने से दूध बच्चों को और ज्यादा पसंद आने लगता है।
भारतीय शोधकर्ताओं की प्रतिक्रिया
भारतीय शोधकर्ताओं सार्थक मित्तल ने कहा, “हमारा उद्देश्य तो सिर्फ बेहतर शू-रैक डिजाइन करना था, लेकिन यह रिसर्च हमें इस मुकाम तक ले आई।” विकाश कुमार ने जोड़ा, “अब हमें और जिम्मेदारी महसूस होती है कि ऐसी समस्याओं पर भी शोध करें जिन पर लोग अक्सर सोचते तक नहीं।”
यह रिसर्च साबित करती है कि कभी-कभी सबसे सामान्य और मजाकिया लगने वाली समस्याएं भी विज्ञान में नई राह दिखा सकती हैं।