Location Tracking: हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी ट्रैक कर रही थी मरीज की गूगल लोकेशन, कोर्ट ने लगाई फटकार

नीतीश कुमार
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्लीनीतीश कुमार
Wed, 20 Aug 2025 01:58 PM IST
सार

क्या इंश्योरेंस कंपनी हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम इसलिए खारिज कर सकती है क्योंकि आपके अस्पताल में भरती रहने की टाइमलाइन हेल्थ इंश्योरेंस द्वारा जुटाई गई आपकी गूगल लोकेशन हिस्ट्री से मैच नहीं खाती है? जी हां, यह जानकर आपको भी हैरानी होगी क्योंकि ऐसा हो चुका है। आइए, जानते हैं कि क्या कानून में इंश्योरेंस कंपनियों को आपकी लोकेशन ट्रैक करने की अनुमति दी गई है और कानून में किन कमियों का इंश्योरेंस कंपनियां फायदा उठाती हैं।

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health insurance company cannot track patient location history for insurance claim rejection
गूगल लोकेशन ट्रैकिंग (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला

    विस्तार

    गुजरात के वल्लभ मोटका ने गो डिजिट जनरल इंश्योरेंस से 6.5 लाख रुपये की मेडिक्लेम पॉलिसी ली थी। सितंबर 2024 में, वायरल निमोनिया के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। इलाज के बाद, उन्होंने 48,251 रुपये का क्लेम दायर किया, लेकिन इंश्योरेंस कंपनी ने इसे खारिज कर दिया।

    कंपनी ने क्लेम खारिज करने का कारण बताया कि मोटका की Google टाइमलाइन उनके अस्पताल में रहने के दावे से मेल नहीं खा रही थी। यानी, उन दिनों जब वह अस्पताल में भर्ती रहने का दावा कर रहे हैं, उनकी Google लोकेशन हिस्ट्री में अस्पताल का पता नहीं दिख रहा है। मोटका ने इस फैसले के खिलाफ उपभोक्ता फोरम में अपील की, जहां फोरम ने इंश्योरेंस कंपनी को पूरा क्लेम चुकाने का निर्देश दिया और मोटका को राहत मिली।

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    फोरम ने सुनाया फैसला

    उपभोक्ता फोरम ने वल्लभ मोटका के मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि जब तक Google के अधिकारी खुद कोर्ट में डेटा की पुष्टि नहीं करते, तब तक टाइमलाइन की कोई कानूनी वैधता नहीं है। यह फैसला भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 63 के अनुरूप है, जिसके अनुसार इलेक्ट्रॉनिक सबूत तभी स्वीकार्य होते हैं जब उनके साथ एक प्रमाणिकता का सर्टिफिकेट हो। इस मामले में, गो डिजिट ने बिना किसी प्रमाणन के गूगल टाइमलाइन डेटा पर भरोसा किया था। फोरम ने कहा कि डेटा की प्रमाणिकता तभी साबित होगी जब गूगल खुद उस डेटा को वेरिफाई करे।

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    इंश्योरेंस कंपनी ने रखा पक्ष

    गो डिजिट इंश्योरेंस के प्रवक्ता ने कहा कि उन्होंने पीड़ित व्यक्ति से उचित सहमति के बाद ही Google टाइमलाइन डेटा हासिल किया था। हालांकि, कंपनी ने यह भी कहा कि सिर्फ Google टाइमलाइन के आधार पर क्लेम खारिज नहीं किया गया था। जांच में कई मरीज द्वारा की गई कई गड़बड़ियां पाई गई थीं, जैसे अस्पताल के रिकॉर्ड और बिल में असमानता। हालांकि, कंपनी के प्रवक्ता ने कहा कि हम फोरम के फैसले का सम्मान करते हैं और आगे के कदम उठाएंगे।

    स्पष्ट नहीं है कुछ नियम
    स्पष्ट नहीं है कुछ नियम - फोटो : Adobe stock

    क्या इंश्योरेंस कंपनियां यूज कर सकती हैं आपकी गूगल हिस्ट्री?

    अगर कानूनों को देखें तो बीमा कंपनियां किसी पॉलिसीधारक की स्पष्ट और सूचित सहमति के बिना उनकी गूगल लोकेशन हिस्ट्री का उपयोग नहीं कर सकती हैं। भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 (गोपनीयता का अधिकार) और डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 के तहत इसे चुनौती दी जा सकती है।

    इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) देश में इंश्योरेंस सेक्टर से जुड़े कानूनों को बनाने का काम करती है। IRDAI के मौजूदा नियम भी हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम को वेरिफाई करने के लिए जियोलोकेशन या मोबाइल ट्रैकिंग का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देते हैं। क्लेम का मूल्यांकन अस्पताल के रिकॉर्ड, डिस्चार्ज समरी और डॉक्टर के सर्टिफिकेट जैसे मानक सबूतों के आधार पर किया जा सकता है, न कि डिजिटल निगरानी के आधार पर।

    ग्रे जोन का फायदा उठाती हैं इंश्योरेंस कंपनियां

    कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, IRDAI के नियम इस विषय पर पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं। जिसके वजह से इंश्योरेंस कंपनियां नियामक रूप से अस्पष्ट नियमों (Grey Zone) का फायदा उठाती हैं। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि बीमा कंपनियां जांच के लिए जानकारी जुटा सकती हैं, लेकिन यह साफ नहीं है कि इसमें स्मार्टफोन ट्रैकिंग शामिल है या नहीं। इस अस्पष्टता के कारण भविष्य में भी ऐसे मामले सामने आ सकते हैं।

    कौन से डिजिटल डेटा का उपयोग कर सकती हैं बीमा कंपनियां?

    इसका मतलब यह नहीं है कि बीमा कंपनियां किसी भी डिजिटल डेटा तक नहीं पहुंच सकतीं। वे सही प्रक्रियाओं का पालन करके और आवश्यक अनुमति प्राप्त करके अस्पताल के सूचना प्रणालियों से जानकारी प्राप्त कर सकती हैं, जैसे एडमिशन लॉग और सीसीटीवी फुटेज। इसके अलावा, यदि पॉलिसी में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया हो और ग्राहक सहमत हो, तो पहनने योग्य उपकरणों (Wearable Devices) का डेटा भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

    हालांकि, बीमा कंपनियां कानूनी रूप से लाइव जीपीएस फीड, कॉल-डिटेल रिकॉर्ड, ईमेल या निजी चैट की मांग नहीं कर सकती हैं, क्योंकि यह IRDAI के "न्यूनतम जानकारी" मानदंडों के तहत नहीं आता है। हालांकि, सोशल मीडिया पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी को बिना सहमति के भी इकट्ठा किया जा सकता है।

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