Vivo-Dixon Deal: वीवो और डिक्सन की मेगा डील को मिली सरकारी मंजूरी, देश में बनेंगे वीवो के स्मार्टफोन्स
केंद्र सरकार ने डिक्सन टेक्नोलॉजीज और वीवो मोबाइल इंडिया के जॉइंट वेंचर को मंजूरी दे दी है। इस फैसले के बाद दोनों कंपनियां भारत में स्मार्टफोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का निर्माण कर सकेंगी। यह साझेदारी 'मेक इन इंडिया' को मजबूती देने के साथ स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग और रोजगार के अवसर भी बढ़ा सकती है।

विस्तार
भारत में स्मार्टफोन निर्माण को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। केंद्र सरकार ने डिक्सन टेक्नोलॉजीज (Dixon Technologies) और वीवो मोबाइल इंडिया (Vivo Mobile India) के जॉइंट वेंचर को मंजूरी दे दी है। इस मंजूरी के बाद दोनों कंपनियां मिलकर भारत में स्मार्टफोन और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का निर्माण कर सकेंगी।
नई कंपनी में डिक्सन टेक्नोलॉजीज की 51% हिस्सेदारी होगी, जबकि वीवो मोबाइल इंडिया के पास 49% हिस्सेदारी रहेगी। बहुमत हिस्सेदारी डिक्सन के पास होने से यह कंपनी आगे चलकर उसकी सहायक कंपनी (सब्सिडियरी) के रूप में काम करेगी।
सरकार की मंजूरी क्यों जरूरी थी?
यह साझेदारी चीनी कंपनी वीवो से जुड़ी होने के कारण सीधे लागू नहीं हो सकती थी। भारत सरकार के नियम के तहत चीन समेत भारत से सीमा साझा करने वाले देशों के निवेश पर पहले सरकारी मंजूरी लेना अनिवार्य है। यह नियम 2020 में लागू किया गया था। सरकार ने 8 जुलाई को इस निवेश को मंजूरी दे दी, जिसके बाद इस परियोजना का रास्ता साफ हो गया।
क्या करेगी नई कंपनी?
यह जॉइंट वेंचर ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर (OEM) के तौर पर काम करेगा। यानी कंपनी मुख्य रूप से वीवो के लिए स्मार्टफोन बनाएगी। हालांकि इसका काम सिर्फ वीवो तक सीमित नहीं रहेगा। जरूरत पड़ने पर यह दूसरी कंपनियों के लिए भी स्मार्टफोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद तैयार कर सकेगी। इससे डिक्सन के कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग कारोबार का भी विस्तार होगा।
कैसे चलेगा कारोबार?
हालांकि डिक्सन के पास ज्यादा हिस्सेदारी होगी, लेकिन नई कंपनी के संचालन में दोनों कंपनियों की बराबर भागीदारी रहेगी। निदेशक मंडल में डिक्सन और वीवो, दोनों को दो-दो सदस्य नियुक्त करने का अधिकार मिलेगा। यानी कारोबार से जुड़े अहम फैसले दोनों कंपनियां मिलकर लेंगी।
एक साल में पूरा होगा समझौता
डिक्सन और वीवो ने इस साझेदारी की घोषणा दिसंबर 2024 में की थी। इसके बाद दोनों ने अंतिम समझौतों पर हस्ताक्षर किए और अब सरकारी मंजूरी भी मिल गई है। हालांकि कंपनी के पूरी तरह शुरू होने से पहले कुछ नियामकीय और परिचालन संबंधी औपचारिकताएं पूरी की जानी बाकी हैं। डिक्सन का कहना है कि पूरा सौदा एक वर्ष के भीतर पूरा होने की उम्मीद है।
यह साझेदारी दिखाती है कि वैश्विक स्मार्टफोन कंपनियां अब भारत में स्थानीय स्तर पर निर्माण बढ़ाने पर जोर दे रही हैं, जबकि भारतीय कंपनियों को भी अपने विनिर्माण कारोबार का विस्तार करने का अवसर मिल रहा है।
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