AI Deathbots: व्यक्ति के मरने के बाद भी जिंदा रहेगा डिजिटल अवतार, क्या है ये नई एआई तकनीक और इसके बड़े खतरे?

सुयश पांडेय
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्लीसुयश पांडेय
Wed, 04 Feb 2026 11:49 AM IST
सार

AI Deathbots: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने अब इंसानी यादों और पहचान को एक नया रूप दे दिया है। 'डेथबॉट्स' या डिजिटल हमशक्ल ऐसी तकनीक है, जिसमें किसी व्यक्ति की आवाज, तस्वीरों, वीडियो और सोच के आधार पर उसका एआई अवतार तैयार किया जाता है, जो उसके गुजर जाने के बाद भी परिवार से बातचीत कर सकता है। यह तकनीक कुछ लोगों के लिए भावनात्मक सहारा बन रही है तो वहीं इसके साथ गंभीर कानूनी, नैतिक और मानसिक सवाल भी खड़े हो रहे हैं।

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Deathbots: How AI Is Creating Digital Humans Who Live On After Death
AI Deathbots - फोटो : X

    विस्तार

    आजकल की नई एआई तकनीक की मदद से अब ऐसे 'डिजिटल इंसान' बनाना मुमकिन हो गया है, जो किसी व्यक्ति के मरने के बाद भी उसकी तरह बात कर सकें। इन्हें 'डेथबॉट्स' कहा जाता है। यह एक तरह का कंप्यूटर प्रोग्राम होता है जो बिल्कुल उस इंसान की तरह आवाज निकाल सकता है, उसकी तरह दिख सकता है और उसी के अंदाज में मैसेज का जवाब भी दे सकता है। इसे बनाने के लिए उस इंसान की पुरानी फोटो, वीडियो और आवाज का इस्तेमाल किया जाता है।

    अक्सर परिवार के लोग अपने किसी करीबी की याद में इसे बनवाते हैं। लेकिन अब ऐसी कंपनियां भी आ गई हैं जहां आप जीते-जी अपना खुद का 'डिजिटल हमशक्ल' तैयार करवा सकते हैं, ताकि आपके जाने के बाद आपके घरवाले आपसे बातें कर सकें।

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    यह कैसे काम करता है?

    किसी भी व्यक्ति का एआई 'डिजिटल हमशक्ल' बनाना अब काफी आसान हो गया है। इसके लिए सबसे पहले आपको ऐसी सर्विस देने वाली किसी कंपनी के पास अपना अकाउंट बनाना होता है, जहां आपसे आपकी पसंद-नापसंद और आपके विचारों से जुड़े कई सवाल पूछे जाते हैं। इसके बाद आप अपनी आवाज में अपनी यादें और कहानियां रिकॉर्ड करते हैं और साथ ही अपनी फोटो और वीडियो भी अपलोड कर देते हैं। इन सारी चीजों का इस्तेमाल करके एआई सॉफ्टवेयर आपकी एक सटीक डिजिटल नकल तैयार कर देता है। फिर आपके जाने के बाद, जब आपके घरवाले कंपनी को इसकी जानकारी देते हैं तो वे आपके उस डिजिटल रूप से बिल्कुल असल इंसान की तरह बात कर सकते हैं। यहां गौर करने वाली बात यह है कि इसमें किसी की मर्जी के बिना उसे वापस नहीं लाया जा रहा, बल्कि आप खुद अपनी मर्जी से कंपनी को अपना डाटा दे रहे हैं ताकि वह आपका यह डिजिटल रूप बना सके।

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    कानूनी पेचीदगियां और अधिकार

    जैसे-जैसे यह तकनीक बढ़ रही है, कई ऐसे कानूनी उलझनें सामने आ रही हैं जिनका फिलहाल कोई साफ जवाब नहीं है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि कानून आपकी आवाज या आपके व्यक्तित्व को आपकी 'प्रॉपर्टी' नहीं मानता, यानी अपनी पहचान पर आपका वैसा हक नहीं है जैसा जमीन या घर पर होता है। इसके अलावा, जो फोटो या आवाज आप खुद रिकॉर्ड करते हैं उस पर तो आपका हक है, लेकिन जो बातें एआई खुद से बनाकर बोलेगा, उस पर कॉपीराइट मिलना मुश्किल है क्योंकि कानून की नजर में उसे किसी इंसान ने नहीं बल्कि मशीन ने बनाया है। एक बड़ा डर यह भी है कि अगर वह कंपनी भविष्य में बंद हो गई या तकनीक बदल गई तो आपके उस डिजिटल रूप का क्या होगा? क्या आपका वो 'डिजिटल हमशक्ल' भी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा? अगर ऐसा हुआ तो आपके परिवार को एक बार फिर वही दुख झेलना पड़ सकता है जो उन्होंने आपके जाने पर झेला था।

    नैतिक जोखिम और चुनौतियां

    डिजिटल हमशक्ल बनाने में सिर्फ कानूनी ही नहीं, बल्कि कई सामाजिक और मानसिक खतरे भी हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि एआई पूरी तरह से कंप्यूटर प्रोग्राम पर चलता है, इसलिए समय के साथ हो सकता है कि वह ऐसी बातें करने लगे जो आपकी असली सोच या स्वभाव से बिल्कुल अलग हों। इसके अलावा, एक डर यह भी है कि घरवाले आपकी यादों से बाहर निकलने के बजाय उस एआई के इतने आदी हो जाएं कि वे कभी सामान्य जीवन में लौट ही न पाएं। साथ ही, अगर कल को वह एआई कोई ऐसी बात कह देता है जिससे परिवार को दुख पहुंचे या कोई विवाद खड़ा हो जाए तो इसकी जिम्मेदारी किस पर होगी? यह भी अभी तक साफ नहीं है।

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