क्रोम में नया सिक्योरिटी फीचर: फेक एप्स और संदिग्ध वेबसाइट्स खोलते ही मिलेगा अलर्ट, जेमिनी कैसे पकड़ेगा स्कैम?

जागृति शुक्ला
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्लीजागृति शुक्ला
Wed, 21 Oct 2026 04:33 PM IST
सार

सावधान, आपके कंप्यूटर में वायरस घुस आया है...इंटरनेट इस्तेमाल करते समय क्या आपकी स्क्रीन पर भी कभी ऐसा पॉप-अप आता है? तो अनजाने में मैसेज पर हुआ एक गलत क्लिक आपकी जेब खाली कर सकता है। इसी समस्या से निपटने के लिए गूगल ने क्राेम में नया सुरक्षा फीचर पेश किया है, जो साइबर ठगी होने से पहले ही संदिग्ध वेबसाइट्स की पहचान कर आपको अलर्ट भेज सकता है। आइए जानते हैं कैसे...

Chrome Security Upgrade, Google Rolls Out Two-Tier Warnings, ClickFix Protection
गूगल क्रोम अपडेट - फोटो : एआई जनरेटेड

    विस्तार

    इंटरनेट पर किसी वेबसाइट को खोलना या कोई अपडेट डाउनलोड करना कई बार साइबर ठगी का कारण बन सकता है। कुछ वेबसाइट्स असली कंपनियों जैसी दिखती हैं, तो कुछ कंप्यूटर में समस्या होने का डर दिखाकर यूजर्स से डेटा ले सकती हैं। यूजर्स को ऐसी ही धोखाधड़ी से बचाने के लिए गूगल ने क्राेम ब्राउजर की सुरक्षा को और मजबूत किया है। कंपनी ने नए चेतावनी सिस्टम की घोषणा की, जो संदिग्ध और खतरनाक वेबसाइट्स के बीच अंतर कर सकता है। इसके साथ ही जेमिनी एआई की मदद से ऑनलाइन स्कैम पहचानने की क्षमता भी बढ़ाई गई है।

    क्रोम संदिग्ध वेबसाइट्स की पहचान कैसे करेगा ?

    1. संदिग्ध साइट्स:जब क्रोम किसी वेब पेज पर ऐसी गतिविधियों को पहचानता है, जो आमतौर पर धोखाधड़ी वाली वेबसाइट्स में देखने को मिलती हैं, तो यह चेतावनी की तरह दिखाई दे सकती है। ऐसे में डेस्कटॉप और मोबाइल दोनों पर पॉप-अप आएगा, जबकि पीछे खुला वेब पेज धुंधला दिखाई देगा। अगर यूजर को लगता है कि वेबसाइट को गलती से संदिग्ध बताया गया है, तो उसे सुरक्षित साइट के रूप में चिह्नित करें का विकल्प भी मिल सकता है।
    1. खतरनाक साइट्स: अगर वेबसाइट को अधिक जोखिम वाली और खतरनाक माना जाता है, तो क्राेम पहले की तरह ज्यादा साफ चेतावनी दिखाएगा। इसमें लगभग पूरी स्क्रीन लाल रंग की हो जाएगी और वेबसाइट के कंटेंट की जगह लाल-लाल दिखने लगेगा।

    जेमिनी एआई से स्कैम पहचानने की क्षमता बढ़ी

    • गूगल ने क्रोम के एन्हांस्ड प्रोटेक्शन फीचर में जेमिनी आधारित स्कैम डिटेक्शन को भी मजबूत किया है। पहले क्रोम डिवाइस पर मौजूद जेमिनी मॉडल की मदद से खासतौर से तकनीक सपोर्ट के नाम पर होने वाली ठगी को पहचानता था। अब कंपनी ने ज्यादा सक्षम सर्वर-साइड जेमिनी मॉडल का इस्तेमाल शुरू किया है और इस सुविधा का दायरा बढ़ाया है।
    • अब यह सिस्टम उन धोखाधड़ी वाली वेबसाइट्स को भी पहचानने में मदद करेगा, जो नकली एंटीवायरस सॉफ्टवेयर या ब्राउजर अपडेट का इस्तेमाल करती हैं। ऐसी वेबसाइट्स यूजर्स को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर सकती हैं कि उनके डिवाइस में कोई समस्या है या उसे ठीक करने के लिए तुरंत कोई सॉफ्टवेयर डाउनलोड करना जरूरी है।

    जेमिनी कैसे पहचानता है फर्जी वेबसाइट?

    • जेमिनी वेबसाइट के पेज पर मौजूद कंटेट सामग्री का विश्लेषण कैसे करता है, इसमें यह देखा जाता है कि पेज पर किस ब्रांड का नाम इस्तेमाल हो रहा है, वेबसाइट का उद्देश्य क्या है और उसमें धोखाधड़ी के संकेत कितने मजबूत हैं।
    • इसके बाद क्रोम का सेफ ब्राउजिंग सिस्टम इस विश्लेषण को दूसरे संकेतों, जैसे वेबसाइट के डोमेन की विश्वसनीयता, के साथ मिलाकर खतरे का आकलन करता है। यानी वेबसाइट के बारे में अंतिम फैसला केवल एक संकेत के आधार पर नहीं लिया जाता, बल्कि कई जानकारियों को साथ देखकर किया जाता है।
    • गूगल के अनुसार, वेबसाइट के मुख्य टेक्स्ट को सर्वर पर विश्लेषण के लिए तभी भेजा जाता है, जब उसमें धोखाधड़ी के ठोस संकेत मिलते हैं। कंपनी का कहना है कि भेजी गई सामग्री को अस्थायी रूप से प्रोसेस किया जाता है। इसे लॉग या स्टोर नहीं किया जाता और एआई मॉडल को ट्रेन करने के लिए भी इस्तेमाल नहीं किया जाता।

    क्लिकफिक्स हमलों से बचाने के लिए भी नया उपाय

    • गूगल ने क्लिकफिक्स नाम के साइबर हमले से निपटने के लिए भी सुरक्षा उपाय जोड़े हैं। इस तरीके में यूजर्स को यह भरोसा दिलाया जाता है कि उनके कंप्यूटर में कोई समस्या है और उसे ठीक करने के लिए उन्हें कुछ कमांड कॉपी करके चलानी होंगी। असल में ये कमांड डिवाइस पर नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियां शुरू कर सकती हैं।
    • नए सिस्टम के तहत, अगर क्रोम को पता चलता है कि एन्हांस्ड प्रोटेक्शन इस्तेमाल करने वाले किसी यूजर ने संदिग्ध कमांड कॉपी की है, तो ब्राउजर कॉपी की गई कंटेंट से व्यक्तिगत जानकारी हटाकर उसे सेफ ब्राउजिंग के पास एनालिशिष के लिए भेजता है। अगर जांच में कमांड खतरनाक पाई जाती है, तो यूजर को चेतावनी दिखाई जाती है।
    • इसका मकसद ऐसे हमलों को रोकना है, जिनमें यूजर को खुद ही साइबर अपराधियों के बताए निर्देशों का पालन करने के लिए बरगलाया जाता है।

    यह चेतावनी सिस्टम पहले भी दूसरे फीचर में दिखा था

    बता दें क्रोम में संदिग्ध और खतरनाक चीजों के लिए अलग-अलग चेतावनी देने का तरीका नया नहीं है। गूगल ने 2024 में फाइल डाउनलोड के दौरान भी इस तरह की व्यवस्था शुरू की थी। उस समय ब्राउजर डाउनलोड होने वाली फाइल को संदिग्ध या खतरनाक मानने के आधार पर अलग-अलग अलर्ट दिखाता था। अब इसी तरह का दो-स्तरीय सिस्टम वेबसाइट ब्राउजिंग के लिए भी लागू किया जा रहा है।

    गूगल ने चेतावनियों के बीच अंतर क्यों रखा?

    • ब्राउजर की सुरक्षा में एक बड़ी चुनौती यह है कि गलत चेतावनियां यूजर्स को परेशान कर सकती हैं। अगर सुरक्षित वेबसाइट्स पर भी बार-बार अलर्ट दिखाई दें, तो लोग धीरे-धीरे उन्हें नजरअंदाज करने लगते हैं। दूसरी ओर, अगर ब्राउजर खतरे पहचानने में ढील बरते, तो यूजर्स साइबर ठगी का शिकार हो सकते हैं।
    • गूगल के अनुसार, संदिग्ध वेबसाइट की चेतावनी में खतरे को लेकर भरोसा अपेक्षाकृत कम होता है। इसका मतलब है कि वेबसाइट से नुकसान होने की आशंका है, लेकिन उसे निश्चित रूप से खतरनाक नहीं कहा जा सकता। ऐसी स्थिति में यूजर्स को तभी आगे बढ़ना चाहिए, जब वे वेबसाइट के सुरक्षित होने को लेकर आश्वस्त हों।
    • इसके विपरीत, खतरनाक वेबसाइट का अलर्ट ज्यादा भरोसे के साथ दिए गए आकलन को दिखाता है और इससे नुकसान का जोखिम भी अधिक माना जाता है। गूगल ऐसी वेबसाइटों से पूरी तरह दूर रहने की सलाह देता है।

    अधिकतर क्रोम की एन्हांस्ड प्रोटेक्शन सेटिंग डिफॉल्ट रूप से बंद रहती है। इसलिए नए सुरक्षा फीचर्स का लाभ लेने के लिए यूजर्स को इसे खुद चालू करना होगा।

    • सबसे पहले गूगल क्रोम खोलें।
    • अब ऊपर दाईं ओर दिए गए तीन डॉट्स पर क्लिक करें।
    • इसके बाद सेटिंग्स में जाएं। यहां आपको प्राइवेसी एंड सिक्योरिटी सेक्शन ओपन करें।
    • इस सेक्शन में जाते ही सेफ ब्राउजिंग पर क्लिक करें।
    • यहां से एन्हांस्ड प्रोटेक्शन का विकल्प चुने।
    • सेटिंग चालू करने के बाद क्रोम को संभावित खतरों की पहचान के लिए ज्यादा व्यापक सुरक्षा जांच करने की अनुमति मिलती है। विकल्पों के नाम या उनकी जगह क्रोम के वर्जन के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है।
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