अति आत्मविश्वास से बच्चे हो रहे हैं साइबर अपराधों के शिकार, माता-पिता के लिए हैं ये चुनौतियां

विस्तार
लॉकडाउन में इंटरनेट के सहारे बच्चों की शिक्षा आगे बढ़ाने की कोशिशें हो रही हैं। इससे अभिभावक खुश हैं तो बच्चे भी ऑनलाइन क्लास के नए अनुभव का रोमांच महसूस कर रहे हैं। लेकिन इस नए अनुभव के साथ उनके लिए नए खतरे भी सामने आए हैं।
इस उम्र में कुछ 'नया' खोजने और आजमाने की उनकी चाहत उन्हें गलत चीजों का शिकार बना रही है। वे इंटरनेट की दुनिया के शातिर अपराधियों का आसान शिकार भी बन रहे हैं। साइबर एक्सपर्ट बताते हैं कि इंटरनेट की अथाह दुनिया में इस प्रकार के कंटेंट बच्चों तक पहुंचने से रोकने की संभावनाएं काफी कम हैं। इसका सबसे सही तरीका उन्हें भरोसे में लेकर सही और गलत की पहचान करवाना ही हो सकता है।
साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल ने अमर उजाला को बताया कि बच्चों की जिंदगी में यह पहला अनुभव है जब वे इतना अधिक समय एकांत में बिता रहे हैं। ऐसे में अकेलेपन को दूर करने के लिए वे सबसे ज्यादा सोशल मीडिया का सहारा ले रहे हैं।
अगर बच्चों की गतिविधियों पर कोई ध्यान नहीं रखा जाएगा तो ऐसे में उनके किसी गलत गतिविधियों में फंस जाने की संभावना हो सकती है। ऐसे में सबसे बेहतर है कि माता-पिता भी जितना संभव हो, अपने बच्चों के साथ उनके ऑनलाइन कार्यक्रमों से परिचित रहें।
बच्चे अति आत्मविश्वास के शिकार
पवन दुग्गल के मुताबिक आज के बच्चे अति आत्मविश्वास के शिकार हैं। दसवीं-बारहवीं तक आने पर उन्हें लगता है कि वे हर चीज को अपने अभिभावकों से ज्यादा बेहतर जानते हैं।
उनके पास ज्यादा सूचनाएं हैं और वे परिस्थितियों से ज्यादा बेहतर तरीके से निबट सकते हैं।
यही कारण है कि जब कभी वे फंस जाते हैं तो भी वे अपने अभिभावकों की मदद लेना जरूरी नहीं समझते।
जानबूझकर करते हैं अपराध
दिल्ली पुलिस के पूर्व एसीपी वेद भूषण ने कहा कि कुछ बच्चे जो साइबर अपराध को अंजाम देते हैं, वे बिल्कुल भी अनजाने में नहीं करते। उन्हें इस बात का पूरी तरह अहसास होता है कि वे क्या कर रहे हैं और इसका क्या परिणाम हो सकता है।
इसलिए इन बच्चों से निपटने के लिए एक बेहतर रणनीति अपनाई जानी चाहिए। उन्हें यह पता होता है कि हमारा साइबर लॉ बहुत मजबूत नहीं हैं और उनकी उम्र कम है, इसलिए वे इस तरह के अपराध में कभी पकड़े भी गए तो आसानी से बाहर आ जाएंगे। यही कारण है कि वे इस तरह के अपराध करते रहते हैं।
कानून में हो बदलाव
विशेषज्ञों के मुताबिक हमारे साइबर कानून समय के हिसाब से अपडेटेड नहीं हैं। इसे नई-नई परिस्थितियों के मुताबिक अपडेट किया जाना चाहिए। इसमें बच्चों की परिस्थितियों को ज्यादा बेहतर ढंग से समझने वाली पुलिसिंग की आवश्यकता है। इसके साथ ही इन चीजों की मीडिया में रिपोर्टिंग पर भी संवेदनशीलता बरतने की आवश्यकता है।
मनोचिकित्सक ने बताया
वहीं, बीएलके अस्पताल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक मनीष जैन ने बताया कि इस तरह के अपराधों की संख्या इतनी अधिक नहीं है कि उसे एक सामान्य ट्रेंड मान लिया जाए।
उनके मुताबिक यह सामान्य है कि अगर लाखों बच्चे इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं तो उसमें से कुछ गलत तरीकों को आजमाने लगें।
इस परिस्थिति से निबटने के लिए माता-पिता को अपने बच्चों से ज्यादा दोस्ताना माहौल बनाना चाहिए और उनकी चीजों पर बहस करना चाहिए।
कुछ उपाय संभव
हालांकि, इंटरनेट सेवा लेते समय माता-पिता कुछ सेवाओं, गलत वेबसाइट्स को प्रतिबंधित कर सकते हैं। लेकिन इससे उनमें अपने माता-पिता के प्रति अविश्वास भी पैदा होता है। यह बहुत कारगर भी साबित नहीं होता।
वहीं, बच्चे प्रॉक्सी सर्वर के सहारे इसकी काट भी खोज सकते हैं। कुछ मामलों में सर्च इंजन कंपनियों को सरकार के स्तर पर मिलकर गलत चीजों पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश भी की जा सकती है। लेकिन यह भी बहुत कारगर साबित नहीं हो सकता है। इसलिए इस स्थिति में बच्चों को भरोसे में लेकर उन्हें सही चीजों के प्रति आगाह करना चाहिए।