ISRO: अब आम नागरिक भी कर सकेंगे अंतरिक्ष की सैर, इसरो शुरू करने जा रहा सिविलियन एस्ट्रोनॉट्स की भर्ती

Suyash Pandey
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्लीSuyash Pandey
Tue, 28 Apr 2026 06:44 PM IST
सार

ISRO Civilian Astronauts:

भारत में एस्ट्रोनॉट बनने का सपना अब सिर्फ मिलिट्री पायलट्स तक सीमित नहीं रहेगा। ISRO जल्द ही आम नागरिकों (विशेषकर वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और STEM प्रोफेशनल्स) को भी अपने भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों का हिस्सा बनाने की तैयारी कर रहा है। गगनयान मिशन के अगले बैच से इस एतिहासिक बदलाव की शुरुआत हो सकती है। इस लेख के जरिए जानेंगे कि ISRO को आखिर इस बड़े बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी, कौन इसके लिए योग्य होगा, और देश के आम नागरिक कब तक अंतरिक्ष की उड़ान भर सकेंगे।

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Big Move by ISRO: Ordinary Citizens Can Soon Become Astronauts for Space Missions
इसरो (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : एक्स/इसरो

    विस्तार

    भारत में अब तक एस्ट्रोनॉट यानी अंतरिक्ष यात्री बनने की एक ही अहम शर्त थी- 'मिलिट्री टेस्ट पायलट' होना। लेकिन अब यह नियम बहुत जल्द बदल सकता है। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अपने भविष्य के एस्ट्रोनॉट बैच में आम नागरिकों को भी शामिल करने की योजना बना रहा है।

    हालांकि अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन शुरुआती संकेत बताते हैं कि जल्द ही कुछ बड़ा होने वाला है। गगनयान मिशन के पहले बैच के लिए अब तक केवल इंडियन एयरफोर्स (IAF) के टेस्ट पायलट ही चुने गए हैं। इसका कारण यह था कि शुरुआत में सुरक्षा और सिस्टम की चेकिंग सबसे अहम थी।

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    लेकिन अब ISRO की चयन समिति ने सिफारिश की है कि अगले बैच में एक 'मिश्रित' होना चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक, इस नए बैच में लगभग 6 मिशन पायलट (मिलिट्री बैकग्राउंड वाले) और 4 सिविलियन स्पेशलिस्ट (STEM बैकग्राउंड वाले) शामिल किए जा सकते हैं। इसका सीधा मतलब है कि वैज्ञानिक, इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ भी भविष्य में भारत के ह्यूमन स्पेसफ्लाइट यात्रा का हिस्सा बन सकेंगे।

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    कौन कर सकेगा अप्लाई?

    जाहिर है कि यह मौका हर किसी के लिए नहीं होगा, बल्कि इसके लिए बेहद खास योग्यताओं की जरूरत होगी। ISRO मुख्य रूप से उन उम्मीदवारों को प्राथमिकता देगा जिनका STEM (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग एंड मैथमेटिक्स) बैकग्राउंड बहुत मजबूत है, यानी इसमें इंजीनियरिंग, वैज्ञानिक रिसर्च या किसी विशेष तकनीकी क्षेत्र के माहिर लोग शामिल हो सकेंगे।

    इन सिविलियन एस्ट्रोनॉट्स की भूमिका सिर्फ स्पेसक्राफ्ट के सफर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उनका मुख्य काम अंतरिक्ष में जाकर जटिल वैज्ञानिक प्रयोग करना और वहां के एडवांस सिस्टम को संभालना होगा। इसके साथ ही, ISRO अपने मिलिट्री कोटे में भी विस्तार करने की योजना बना रहा है। इससे अब सिर्फ फाइटर पायलट ही नहीं बल्कि कॉम्बैट हेलीकॉप्टर पायलटों के लिए भी अंतरिक्ष की राह आसान हो जाएगी।

    आखिर इस बड़े बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?

    अगर यह योजना हकीकत बनती है तो यह ISRO के लिए एक बहुत बड़ा बदलाव साबित होगी। दरअसल, ISRO का लक्ष्य अब सिर्फ एक बार इंसानों को अंतरिक्ष में भेजकर उपलब्धि हासिल करना नहीं है, बल्कि वह भविष्य के लिए कहीं बड़े और महत्वाकांक्षी लक्ष्यों पर काम कर रहा है। इनमें अंतरिक्ष में नियमित इंसानी उड़ानें संचालित करना, पृथ्वी की निचली कक्षा में जाकर गहराई से वैज्ञानिक शोध करना और सबसे महत्वपूर्ण- भारत का अपना स्पेस स्टेशन, 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' (BAS) तैयार करना शामिल है।

    इन बड़े सपनों को साकार करने के लिए एक बड़े और कुशल एस्ट्रोनॉट टीम की जरूरत होगी। रिपोर्ट की मानें तो ISRO एक ऐसे भविष्य की तैयारी कर रहा है, जहां साल में कम से कम दो मिशन भेजे जा सकें और क्रू की संख्या को 2 से बढ़ाकर 3 एस्ट्रोनॉट किया जा सके। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए एस्ट्रोनॉट्स का कुल पूल बढ़ाकर 40 लोगों तक करने की योजना है।

    क्या आम लोग तुरंत अंतरिक्ष की उड़ान भर पाएंगे?

    इसका सीधा जवाब है- नहीं। भले ही भविष्य में आम नागरिकों यानी सिविलियंस का चयन जल्द शुरू हो जाए, लेकिन वे शुरुआती मिशनों का हिस्सा नहीं होंगे। मौजूदा योजना के मुताबिक, सिविलियन एस्ट्रोनॉट्स की पहली उड़ान चौथे क्रू गगनयान मिशन से शुरू होने की उम्मीद है। हालांकि यह योजना बेहद रोमांचक है, लेकिन इसके सामने अब भी कई चुनौतियां और तकनीकी काम बाकी हैं। उदाहरण के लिए, ISRO को अभी एक पूरी तरह से एडवांस एस्ट्रोनॉट ट्रेनिंग फैसिलिटी तैयार करनी है।

    तमाम चुनौतियों के बावजूद, सबसे अच्छी बात यह है कि अब भारत में 'एस्ट्रोनॉट बनने' का सपना किसी खास बैकग्राउंड या सिर्फ मिलिट्री तक सीमित नहीं रह जाएगा। यह देश के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के लिए अंतरिक्ष के नए दरवाजे खोलने जैसा है।

    NASA और सिविलियन मिशन: दुनिया में क्या है ट्रेंड?

    अगर हम वैश्विक स्तर पर देखें तो अमेरिकी स्पेस एजेंसी NASA काफी समय पहले ही आम नागरिकों को अंतरिक्ष मिशनों का हिस्सा बनाना शुरू कर चुकी है। इस सिलसिले में नील आर्मस्ट्रांग का नाम सबसे ऊपर आता है, जिन्हें 16 मार्च 1966 को अंतरिक्ष में भेजा गया पहला 'सिविलियन' माना जाता है। हालांकि, गौर करने वाली बात यह है कि एस्ट्रोनॉट बनने से पहले वे एक नेवी पायलट रह चुके थे।

    वहीं, अगर हम शुद्ध रूप से किसी आम नागरिक या 'स्पेस टूरिस्ट' की बात करें तो अमेरिकी बिजनेसमैन और इंजीनियर डेनिस टीटो ने साल 2001 में इतिहास रचा था। वे अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले दुनिया के पहले स्पेस टूरिस्ट बने थे। उनसे पहले अंतरिक्ष का सफर केवल मिलिट्री पायलटों या सरकारी स्पेस प्रोग्राम से जुड़े लोगों तक ही सीमित था।

    अब भारत का ISRO भी उसी आधुनिक राह पर अपने कदम बढ़ा रहा है, जहां आसमान की ऊंचाइयों तक पहुंचने के लिए केवल वर्दी नहीं, बल्कि विज्ञान और तकनीक का जुनून भी काफी होगा।

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