कौन हैं सावन बरवाल?: न ट्रैक था..न बड़ी सुविधाएं! पहाड़ों पर दौड़कर बढ़ाई ताकत; मैराथन में भारत को दिलाया पदक
सावन बरवाल ने एशियन गेम्स 2026 में पुरुष मैराथन का रजत पदक जीतकर भारत का 44 साल का इंतजार खत्म किया। हिमाचल प्रदेश के मंडी से आने वाले सावन भारतीय सेना में हवलदार हैं और राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक हैं। जानें पहाड़ों से एशियाड के पोडियम तक पहुंचने वाले सावन का पूरा सफर और मैराथन के नियम।
विस्तार
एशियन गेम्स में भारत के लिए 26 सितंबर का दिन ऐतिहासिक बन गया। पुरुष मैराथन में सावन बरवाल ने रजत पदक जीतकर न सिर्फ अपने करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि हासिल की, बल्कि इस स्पर्धा में भारत का 44 साल लंबा इंतजार भी खत्म कर दिया। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले से आने वाले सावन ने 2 घंटे 11 मिनट 36 सेकंड के समय के साथ अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड बेहतर किया।
सावन के लिए यह सफर किसी तैयार ट्रैक या बड़ी खेल सुविधा से शुरू नहीं हुआ था। पहाड़ों के बीच एक साधारण परिवार में पले-बढ़े सावन ने उन्हीं कठिन चढ़ाइयों और ढलानों पर दौड़ते हुए अपनी सहनशक्ति तैयार की। उनके पिता कार चलाते थे और परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। कभी सेना में भर्ती होने के लिए दौड़ शुरू करने वाले सावन की यही दौड़ आगे चलकर उन्हें भारतीय मैराथन का राष्ट्रीय रिकॉर्डधारी और अब एशियन गेम्स का रजत पदक विजेता बना चुकी है।
मंडी के छोटे से गांव से शुरू हुई कहानी
सावन बरवाल का जन्म 18 फरवरी 1998 को हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के जोगिंदरनगर के रडाभांकर गांव में हुआ। उनका परिवार साधारण था। उनके पिता कार चालक थे और परिवार सीमित आर्थिक साधनों में जीवन चलाता था। सावन के शुरुआती दिनों में उनके पास आधुनिक खेल सुविधाएं नहीं थीं। न सिंथेटिक रनिंग ट्रैक था और न ही किसी बड़े प्रशिक्षण केंद्र की सुविधा। लेकिन पहाड़ उनके लिए किसी ट्रेनिंग ग्राउंड से कम नहीं थे। ऊंची-नीची पगडंडियों और कठिन ढलानों पर दौड़ना उनकी दिनचर्या का हिस्सा रहा। इन्हीं रास्तों ने धीरे-धीरे उनकी सहनशक्ति को मजबूत किया। स्कूल के दिनों में भी वह सिर्फ दौड़ तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने वॉलीबॉल, कबड्डी और खो-खो जैसे खेलों में भी हिस्सा लिया। शायद उस समय सावन को भी अंदाजा नहीं रहा होगा कि जिन पहाड़ी रास्तों पर वह सामान्य जिंदगी का हिस्सा समझकर दौड़ रहे हैं, वही आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनने वाले हैं।
सेना में जाने के सपने ने दौड़ से जोड़ा
सावन की दौड़ की शुरुआत किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय लक्ष्य के साथ नहीं हुई थी। उनका शुरुआती सपना भारतीय सेना में भर्ती होना था। पहाड़ी इलाकों के युवाओं के लिए सेना में नौकरी रोजगार और सम्मान दोनों का महत्वपूर्ण माध्यम रही है। 2017 में सेना की भर्ती के दौरान सावन की असाधारण सहनशक्ति ने प्रतिभा खोजने वाले अधिकारियों का ध्यान खींचा। उनकी क्षमता को पहचानते हुए उन्हें पुणे स्थित आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट में प्रशिक्षण का मौका मिला। यहीं से उनकी दौड़ को एक नई दिशा मिली। पहाड़ों पर अपने दम पर तैयार हुई सहनशक्ति को अब व्यवस्थित प्रशिक्षण मिलने लगा। 2019 में सावन भारतीय सेना में इंजीनियरिंग कोर के हवलदार के रूप में शामिल हुए। जिस सेना में जाने का सपना लेकर उन्होंने दौड़ शुरू की थी, उसी सेना ने उनकी खेल प्रतिभा को निखारने में भी अहम भूमिका निभाई।
1500 मीटर से 10 हजार मीटर और फिर मैराथन
सावन का शुरुआती ध्यान छोटी और मध्यम दूरी की ट्रैक स्पर्धाओं पर था। उन्होंने 1500 मीटर, 5000 मीटर और 10,000 मीटर में हिस्सा लिया। राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने 5000 मीटर और 10,000 मीटर में अपनी क्षमता साबित की और नेशनल गेम्स तथा नेशनल फेडरेशन सीनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में मीट रिकॉर्ड भी बनाए। लेकिन उनके करियर में अगला बड़ा बदलाव तब आया, जब लंबी दूरी की दौड़ की ओर जाने की सलाह मिली। सेना के साथी धावक मोहम्मद यूनुस खान ने उन्हें लंबी सड़क दौड़ की ओर रुख करने की सलाह दी। इसके बाद सावन ने 42.195 किलोमीटर की मैराथन को अपना लक्ष्य बनाया। उन्होंने कूनूर स्थित रिलायंस फाउंडेशन एथलेटिक्स सेंटर में कोच अजीत मार्कोस की निगरानी में प्रशिक्षण शुरू किया। ट्रैक की छोटी दूरी से मैराथन जैसी कठिन स्पर्धा तक पहुंचना उनके करियर में एक बड़ा बदलाव था।
अप्रैल 2026 में शिवनाथ सिंह का 48 साल पुराना रिकॉर्ड टूटा
सावन ने अप्रैल 2026 में नीदरलैंड्स की एनएन रॉटरडैम मैराथन में हिस्सा लेकर इस स्पर्धा में अपना प्रतिस्पर्धी पदार्पण किया। रेस के अंतिम हिस्से में उन्हें मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। लगभग दो किलोमीटर बाकी रहते तेज ठंडी हवा के बीच उनकी स्थिति खराब हुई और वह फिनिश लाइन से करीब 20 मीटर पहले दो बार गिर पड़े। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। आखिरकार उन्होंने 2 घंटे 11 मिनट 58 सेकंड का समय निकालकर रेस पूरी की। वह 20वें स्थान पर रहे, लेकिन इस प्रदर्शन ने उन्हें भारतीय एथलेटिक्स के इतिहास में दर्ज करा दिया। सावन ने शिवनाथ सिंह का 48 साल पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ दिया। शिवनाथ सिंह ने 1978 में 2 घंटे 12 मिनट का समय निकालकर यह रिकॉर्ड बनाया था। यानी जिस खिलाड़ी ने पहाड़ों में दौड़कर अपनी सहनशक्ति बनाई थी, उसने अब भारत के सबसे पुराने एथलेटिक्स रिकॉर्ड में से एक को अपने नाम कर लिया था।
दूसरी ही मैराथन में एशियन गेम्स का रजत
रॉटरडैम में रिकॉर्ड तोड़ने के कुछ महीनों बाद सावन एशियन गेम्स के मैराथन ट्रैक पर उतरे। यह उनके करियर की सिर्फ दूसरी मैराथन थी। 26 सितंबर को जापान के नागोया में हुई रेस में उन्होंने शुरुआत से ही खुद को आगे रहने वाले धावकों के समूह में बनाए रखा। रेस के बीच में वह बढ़त बनाने में भी सफल रहे। रेस आगे बढ़ी तो जापान के इचिटाका यामाशिता, चीन के पेइयू फेंग और सावन के बीच मुकाबला सिमट गया। करीब 35 किलोमीटर के बाद मुकाबला बेहद रोमांचक हो गया। 36 किलोमीटर के आसपास यामाशिता ने बढ़त बनाई और अंत तक उसे बरकरार रखा। सावन ने भी आखिरी हिस्से में अपनी पूरी ताकत झोंक दी और चीनी धावक को पीछे छोड़ते हुए दूसरा स्थान हासिल किया। सावन ने 2:11:36 का समय निकाला और अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड बेहतर कर दिया। जापान के इचिटाका यामाशिता ने 2:10:51 के समय के साथ स्वर्ण पदक जीता।
44 साल बाद भारत को मिला मैराथन पदक
सावन का रजत पदक इसलिए और खास है क्योंकि एशियन गेम्स की पुरुष मैराथन में भारत को इससे पहले आखिरी पदक 1982 में मिला था। इस तरह सावन ने 44 साल बाद भारत को इस स्पर्धा में पदक दिलाया। एशियन गेम्स की मैराथन में भारत के पदकों की सूची देखें तो 1951 में छोटा सिंह ने स्वर्ण और सूरत सिंह माथुर ने कांस्य जीता था। 1982 में होसुर कुक्कप्पा सीथारण ने कांस्य पदक अपने नाम किया था। इसके बाद 2026 में सावन बरवाल ने रजत जीतकर इस सूची में अपना नाम जोड़ दिया।
एशियन गेम्स में भारत के मैराथन पदक
| साल | खिलाड़ी | पदक | समय |
|---|---|---|---|
| 1951 | छोटा सिंह | स्वर्ण | 2:42:58.6 |
| 1951 | सूरत सिंह माथुर | कांस्य | 2:53:49.8 |
| 1982 | होसुर कुक्कप्पा सीथारण | कांस्य | 2:25:07 |
| 2026 | सावन बरवाल | रजत | 2:11:36 |
सावन की कहानी में सबसे खास बात सिर्फ उनका पदक या रिकॉर्ड नहीं है। यह सफर उस खिलाड़ी का है जिसने अपने शुरुआती दिनों में आधुनिक सुविधाओं के बजाय पहाड़ों को अपना अभ्यास स्थल बनाया। जिस परिवार में पिता कार चलाकर घर चलाते थे, वहां से निकलकर सावन ने पहले सेना में जगह बनाई, फिर ट्रैक पर अपनी पहचान बनाई, लंबी दूरी की ओर कदम बढ़ाया, 48 साल पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ा और आखिरकार एशियन गेम्स के पोडियम तक पहुंचे। उनकी कहानी यह भी बताती है कि किसी खिलाड़ी की शुरुआत भले ही छोटी हो, लेकिन उसके सपने छोटे होना जरूरी नहीं हैं। सावन के लिए दौड़ पहले सेना तक पहुंचने का जरिया बनी और फिर वही दौड़ उन्हें भारत के लिए एशियन गेम्स का पदक दिलाने तक ले गई।
मैराथन एथलेटिक्स की सबसे लंबी और चुनौतीपूर्ण सड़क दौड़ स्पर्धाओं में से एक है। एशियन गेम्स में भी इसका आयोजन अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स नियमों के अनुसार किया जाता है।
42.195 किलोमीटर होती है दूरी
मैराथन की आधिकारिक दूरी 42.195 किलोमीटर यानी करीब 26.2 मील होती है। धावकों को पूरी दूरी तय करके फिनिश लाइन पार करनी होती है।
मैराथन में अलग-अलग राउंड या नॉकआउट मुकाबले नहीं होते। सभी योग्य धावक एक ही रेस में एक साथ शुरुआत करते हैं। इसी एक रेस के परिणाम से पदक विजेताओं का फैसला होता है।
सड़क पर होती है रेस
मैराथन आमतौर पर खुले सड़क मार्ग पर आयोजित की जाती है। मेजबान शहर की सड़कों से गुजरने वाले रूट में सीधे हिस्से, चढ़ाई, ढलान और कई मोड़ हो सकते हैं। रेस का समापन स्टेडियम में भी कराया जा सकता है।
सबसे पहले फिनिश लाइन पार करने वाला विजेता
मैराथन में सबसे पहले 42.195 किलोमीटर की दूरी पूरी करके फिनिश लाइन पार करने वाला धावक स्वर्ण पदक जीतता है। दूसरे स्थान पर रहने वाले को रजत और तीसरे स्थान पर रहने वाले को कांस्य पदक मिलता है।
मैराथन में केवल तेज दौड़ना ही पर्याप्त नहीं होता। 42.195 किलोमीटर की दूरी में धावकों को अपनी गति, ऊर्जा और ताकत को सही तरीके से इस्तेमाल करना पड़ता है। शुरुआत में बहुत तेज गति से दौड़ने का असर रेस के अंतिम हिस्से में पड़ सकता है। इसलिए लंबे समय तक अपनी गति बनाए रखना मैराथन की बड़ी चुनौती होती है। सावन बरवाल ने भी इसी लंबी चुनौती को पार करते हुए एशियन गेम्स में भारत को 44 साल बाद मैराथन का पदक दिलाया। पहाड़ों की कठिन चढ़ाइयों से शुरू हुआ उनका सफर अब एशियाड के पोडियम तक पहुंच चुका है।