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गुलाम भारत को दी पहचान पर आजादी के बाद उपेक्षित रहे ध्यानचंद  

Sat, 23 Sep 2017 03:24 PM IST
amarujala.com-presented by: शरद मिश्र
amarujala.com-presented by: शरद मिश्र Updated Sat, 23 Sep 2017 03:24 PM IST
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dhyanchand in last interview that nobody will a tear for me in this country
फाइल फोटो
जब हमारा देश गुलाम था तब दुनिया में भारत की पहचान गांधी, हॉकी और ध्यानचंद की वजह से होती थी। लेकिन आजाद भारत में हॉकी और ध्यानचंद हमेशा से उपेक्षित रहे। हॉकी और उसके जादूगर पर देश और उसकी सरकार का ध्यान नहीं गया। फुटबॉल के साथ जिस तरह पेले और मुक्कबाजी के साथ मोहम्मद अली का नाम जुड़ा है उसी तरह हॉकी से ध्यानचंद जुड़े हैं। 
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मेरे लिए एक आंसू भी नहीं निकलेंगे

dhyanchand in last interview that nobody will a tear for me in this country
मेजर ध्यानचंद
ध्यानचंद को शायद अपनी उपेक्षा का अंदाजा हो गया था। तभी तो उन्होंने अपने अंतिम साक्षात्कार में कहा था कि जब मेरा निधन होगा तो पूरा विश्व रो रहा होगा लेकिन भारत के लोगों की आंखों से मेरे लिए एक आंसू भी नहीं निकलेंगे। मैं अपने देश के लोगों को अच्छी तरह जानता हूं। 
 
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मुझे भारत सबसे अच्छा लगता है, मुझे कुछ नहीं चाहिए

dhyanchand in last interview that nobody will a tear for me in this country
मेजर ध्यानचंद
क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर से पहले ध्यानचंद को भारत रत्न मिलना भी एक तरह का नया विवाद है। सचिन तेंदुलकर को इसमें कतई दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने क्रिकेट के जरिए देश की बहुत सेवा की है। लेकिन सरकार को उनको भारत रत्न देने की घोषणा करने से पहले ध्यानचंद और उनके हॉकी के योगदान पर जरूर सोचना चाहिए ‌था। यह वहीं ध्यानचंद थे जिन्होंने हिटलर का ऑफर यह कहकर ठुकरा दिया था कि मुझे मेरा देश भारत सबसे अच्छा लगता है, मुझे कुछ नहीं चाहिए। हॉकी की जादूगरी को देखते हुए हिटलर ने ध्यानचंद को जर्मनी में सेना में सर्वोच्च पद देने की पेशकश की थी। 

पढ़े:- जब ध्यानचंद की हॉकी तुड़वा कर हुई जांच, चुंबक होने की थी आशंका
 
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ब्रिटिश साम्राज्य ध्यानचंद से डरता था

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ASDAS - फोटो : DAS
क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर से बड़ा नाम डान ब्रैडमैन का है। लेकिन हॉकी में ध्यानचंद से आगे दुनिया में कोई नहीं था। इसके बाद भी भारत रत्न में ध्यानचंद यानी दद्दा की अनदेखी हॉकी प्र‌ेमी जनता को निराश कर सकती है। भारत जब गुलाम था तो अंग्रेज सभी भारतीयों को धमका कर रखते थे। लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य ध्यानचंद से डरता था। लिहाजा 1936 के बर्लिन ओलंपिक में ब्रिटेन ने ध्यानचंद के डर से अपनी टीम ही मैदान में नहीं उतारी। 

उनके जन्मदिन को खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है

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ध्यानचंद - फोटो : sdfsd
ध्यानचंद को दुनिया में लगभग 55 देशों के 400 से अधिक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। उनके जन्मदिन को देश में खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसके बाद भी उन्हें भारत रत्न देने के लिए सरकार को विचार करना पड़ता है। ऐसी स्थिति का ध्यानचंद को शायद बहुत पहले ही एहसास हो गया था। तभी तो उन्होंने अंतिम साक्षात्कार में कहा, 'मैं अपने देश को अच्छी तरह जानता हूं'।

ध्यानचंद को भारत रत्न दिलाने के लिए हस्ताक्षर करें यहां- goo.gl/hYuwMF




 
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