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CWG 2022: पाकिस्तानी पहलवान को पटकने वाले दीपक नौकरी के लिए अखाड़े में उतरे, पिता के सपने को किया साकार

Sat, 06 Aug 2022 01:24 AM IST
रोहित राज स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, बर्मिंघम
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, बर्मिंघम Published by: रोहित राज Updated Sat, 06 Aug 2022 01:24 AM IST
सार

हरियाणा के झज्जर के रहने वाले दीपक के पिता सुभाष ने पहलवान बनने का सपना देखा था, लेकिन घर के हालात ऐसे नहीं थे कि वह पहलवानी कर पाते। घर में खाने के लाले थे इसलिए उन्होंने पहलवानी नहीं की।

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Commonwealth Games 2022 Deepak Punia beats pakistani player Muhammad Inam for gold medal read his life story
दीपक पूनिया ने पाकिस्तान के मोहम्मद इनाम को हराया - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

पहलवान दीपक पूनिया ने भारत को बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में यादगार स्वर्ण पदक दिलाया। उन्होंने फ्रीस्टाइल 86 किग्रा वर्ग में पाकिस्तान के मोहम्मद इनाम को हरा दिया। इनाम के खिलाफ पूनिया ने जबरदस्त प्रदर्शन किया। उन्होंने पाकिस्तानी पहलवान को एक भी मौका नहीं दिया। दीपक ने यह मैच 3-0 से अपने नाम कर लिया। यह राष्ट्रमंडल खेलों में दीपक पूनिया का पहला पदक है।  आइए जानते हैं दीपक पूनिया की कहानी...
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पिता खुद नहीं बन पाए पहलवान बेटे को बनाया
हरियाणा के झज्जर के रहने वाले दीपक के पिता सुभाष ने पहलवान बनने का सपना देखा था, लेकिन घर के हालात ऐसे नहीं थे कि वह पहलवानी कर पाते। घर में खाने के लाले थे इसलिए उन्होंने पहलवानी नहीं की। यही कारण था कि उन्होंने दो बेटियों के बाद जन्में दीपक को छोटी उम्र में ही अखाड़े के राह दिखा दी।
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Commonwealth Games 2022 Deepak Punia beats pakistani player Muhammad Inam for gold medal read his life story
दीपक पूनिया - फोटो : ट्विटर
सुशील, बजरंग को देखकर सीखा
दीपक के कोच विरेंदर ने एक बार खुलासा किया था कि दीपक उनके पास 15 की उम्र में आया था, लेकिन इससे पहले वह मिट्टी की कुश्ती के दंगल लड़ता था। पांच सौ से लेकर पांच हजार की ईनामी राशि दीपक के घर का बड़ा सहारा बनती थी, लेकिन उनके पास आने के बाद मिट्टी की कुश्ती बीते दिनों की बात हो गई। उसने छत्रसाल में सुशील कुमार, बजरंग समेत अन्य वरिष्ठ पहलवानों को देखकर कुश्ती के दांवपेच में महारत हासिल की।

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दीपक पूनिया - फोटो : सोशल मीडिया
गाय का दूध है दीपक की कमजोरी
पिता सुभाष ने एक बताया था कि दीपक को बचपन से ही गाय का दूध पसंद है। उन्होंने घर में गाय पाल रखी है और इसी का दूध वह रोजाना दीपक को भिजवाते हैं। वह सिर्फ गाय का ही दूध पीता है। सुभाष को आज भी वह दिन याद है जब दीपक को सेना में लिया गया और जूनियर विश्व चैंपियन बनने के बाद उसके पास पैसे आने लगे। उसने सबसे पहला काम उनके दूध सप्लाई करने के काम को बंद कराया। अब दीपक न तो उन्हें दूध बेचने देता है और न ही खेतों में काम करवाता है। उनका काम तो बस बेटे को गाय दूध, दही और मक्खन पहुंचाना रह गया है।
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दीपक पूनिया - फोटो : सोशल मीडिया
नौकरी के लिए अखाड़े में उतरे थे दीपक
दीपक ने जब कुश्ती शुरू की थी तब उनका लक्ष्य इसके जरिए नौकरी पाना था जिससे वह अपने परिवार की देखभाल कर सके। वह काम की तलाश में थे और 2016 में उन्हें भारतीय सेना में सिपाही के पद पर काम करने का मौका मिला, लेकिन ओलंपिक पदक विजेता पहलवान सुशील कुमार ने उन्हें छोटी चीजों को छोड़कर बड़े लक्ष्य पर ध्यान देने का सुझाव दिया। फिर दीपक ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। सुशील ने दीपक को प्रायोजक ढूंढने में मदद की और कहा, ‘कुश्ती को अपनी प्राथमिकता बनाओ, नौकरी तुम्हारे पीछे भागेगी।’ दीपक ने दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम के अपने सीनियर पहलवान की सलाह मानी और तीन साल में आयु वर्ग के कई बड़े खिताब हासिल किए।

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दीपक पूनिया - फोटो : ट्विटर
केतली पहलवान के नाम से हैं मशहूर
दीपक के पिता सुभाष 2015 से रोज लगभग 60 किलोमीटर की दूरी तय करके उसके लिए झज्जर से दिल्ली दूध और फल लेकर आते थे। उन्हें बचपन से ही दूध पीना पसंद है। वह गांव में ‘केतली पहलवान’ के नाम से जाने जाते हैं। इसके पीछे भी दिलचस्प कहानी है। गांव के सरपंच ने एक बार केतली में दीपक को दूध पीने के लिए दिया और उन्होंने एक बार में ही उसे खत्म कर दिया। उन्होंने इस तरह एक-एक कर के चार केतली खत्म कर दी जिसके बाद से उनका नाम ‘केतली पहलवान’ पड़ गया।

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दीपक पूनिया - फोटो : ट्विटर
शॉपिंग के शौकीन हैं दीपक
दीपक ने एक इंटरव्यू में अमर उजाला से कहा था कि उनकी सफलता का राज अनुशासित रहना है। उन्होंने कहा था, ‘मुझे दोस्तों के साथ घूमना, मॉल जाना और शॉपिंग करना पसंद है। लेकिन हमें प्रशिक्षण केंद्र से बाहर जाने की अनुमति नहीं है। मुझे जूते, शर्ट और जींस खरीदना पसंद है, हालांकि मुझे उन्हें पहनने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि मैं हमेशा एक ट्रैक सूट में रहता हूं। टूर्नामेंट के बाद जब भी मुझे मौका मिलता है मैं बाहर जाकर अपना मनपसंद खाना खाता हूं, लेकिन छुट्टी खत्म होने के बाद उसके बारे में सोचता भी नहीं हूं। उसके बाद कुश्ती और प्रशिक्षण ही मेरी जिंदगी होती है। 2015 तक मैं जिला स्तर पर भी पदक नहीं जीत पा रहा था। मैं किसी भी हालत में नतीजा हासिल करना चाहता था ताकि कहीं नौकरी मिल सके और अपने परिवार की मदद कर सकूं। मेरे पिता दूध बेचते थे। वह काफी मेहनत करते थे। मैं किसी भी तरह से उनकी मदद करना चाहता था।’
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