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मंजिलें और भी हैं: लावारिश शवों के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाते हैं अय्यूब अहमद

Mon, 26 Aug 2019 11:32 AM IST
अय्यूब अहमद न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: अय्यूब अहमद Updated Mon, 26 Aug 2019 11:32 AM IST
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Ayyub Ahmad takes responsibility for funeral of Unclaimed dead bodies
Ayub Ahmed - फोटो : अमर उजाला

जब मैंने पहली बार एक लावारिस शव का अंतिम संस्कार कराया, तो अचानक मेरे आसपास सबकुछ बदल गया। लोग मुझसे कतराने लगे। उन्होंने मुझसे बात करना छोड़ दिया। मैं अक्सर रात में अकेले होने पर रोता था। पर इस काम को लेकर मेरा मन और मजबूत हो गया था। यह काम करते हुए एक वक्त ऐसा आया, जब लोग मुझे देखते ही मुंह मोड़ लेते थे। लेकिन मैंने इसे जारी रखा।

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मैं कर्नाटक के मैसूर का रहने वाला हूं। मैंने सिर्फ दूसरी कक्षा तक पढ़ाई की है और छोटे-मोटे काम करके अपना और परिवार का पेट पालता हूं। मैंने अपनी कमाई को तीन भागों में बांट दिया है, अपने परिवार के लिए, मृत शरीर के अंतिम संस्कार के लिए और फुटपाथ पर रहने वाले लोगों की मदद के लिए। यह तब शुरू हुआ, जब मैं नई कार खरीदने के लिए बस से गुंदलुपेट जा रहा था।
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रास्ते में मैंने देखा कि एक जगह भीड़ जमा है। बस की खिड़की से देखा, तो मालूम हुआ कि एक शव वहां पड़ा हुआ है। कुछ समय बाद जब मैं अपनी कार से वापस लौटा, तो देखा कि शव अब भी वहीं पड़ा हुआ है। किसी ने भी, पुलिस में जानकारी देने की जहमत नहीं उठाई। मैंने उस शव को अपनी बांहों में उठाया और उसे कार में डालकर शवदाह गृह ले जाकर उसका अंतिम संस्कार कराया। तब तक मुझे इसके परिणाम की भनक नहीं थी।
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घर वापस आने के बाद मैंने जब यह घटना बताई, तो हर कोई गुस्से में था। मुझे बहुत बुरा लगा, मुझे इस कारण मैसूर छोड़ना पड़ा। मैं कुछ समय के लिए बंगलूरू चला आया। और फिर एक दिन जब मैं सिलिकॉन सिटी में लालबाग घूमने गया तो रास्ते में एक शव दिखा। मैं पिछला अनुभव भूल नहीं पाया था, इसलिए दुविधा में फंस गया। आखिरकार एक रिक्शे पर ले जाकर पुलिस की मौजूदगी में उसका भी अंतिम संस्कार कराया। पर मैंने सोंच लिया था कि किसी भी तरह से ऐसे लोगों की मदद करूंगा।

मैं दोबारा मैसूर लौट आया। यहां आकर ने माता-पिता से कहा कि मैं यह काम जारी रखना चाहता हूं। उन्होंने कहा, यदि तुम्हें कोई शव दिखाई पड़े, तो उसका चेहरा नहीं देखना चाहिए, कि तुम उसे जानते हो या नहीं, बल्कि मृत व्यक्ति के परिजनों की खोज करनी चाहिए। मेरे माता-पिता चाहते थे कि मेरा नाम अच्छी चीजों के लिए जाना जाए। मेरी मां कहती थीं कि अच्छे कामों को दुनिया देखती और सराहना करती है।

अफसोस कि जब मेरा वक्त आया, तब मेरी मां नहीं है। पर उन्हीं के प्रोत्साहन से यह यात्रा अनवरत जारी है। शादी के बाद जब पत्नी को मेरे इस काम के बारे में पता चला, तो उसने सवाल उठाने की जगह मेरा सहयोग किया। वह मुझे कभी नहीं रोकती। यहां तक कि अगर मुझे सुबह तीन बजे कॉल आती है, तो वह मुझे जैकेट पहनकर बाहर जाने के लिए कहती है।

10 हजार शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं

Ayyub Ahmad takes responsibility for funeral of Unclaimed dead bodies
funeral

यह काम करते हुए मुझे तकरीबन बीस साल हो चुके हैं। पुलिस विभाग की सहायता से मैंने तकरीबन 10 हजार लावारिश शवों का अंतिम संस्कार कराया है। अब लोग इस काम के लिए आर्थिक मदद करते हैं। इस काम के साथ मैं बेघर लोगों के लिए भोजन और कपड़ों के साथ ही अनाथ बच्चों स्कूल भेजने की व्यवस्था भी करता हूं। मैं अपनी कार को ही, बतौर एंबुलेंस उपयोग करता हूं। कभी-कभी लोगों को अपने काम को पहचानने और प्यार करने के लिए अपनी मृत्यु तक इंतजार करना पड़ता है। मैं अपने जीवन काल में लोगों का बेशुमार प्यार पाने को अपना सौभाग्य मानता हूं।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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