World Environment Day: प्रकृति पूजा से लेकर पर्यावरण संरक्षण तक, धार्मिक ग्रंथों और जीवन में इसका महत्व
Vishwa Paryavaran Diwas : हिंदू धर्म में प्रकृति को देवी-देवताओं के रूप में पूजने की परंपरा रही है। वेदों और उपनिषदों में प्रकृति के पांच मूल तत्व अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश को पंचमहाभूत कहा गया है, जिनका आध्यात्मिक और भौतिक दोनों दृष्टियों से महत्व है।
विस्तार
World Environment Day 2025: ज्योतिष में पर्यावरण का महत्व, जानें कैसे ग्रहों को पेड़-पौधे करते हैं शांत
धर्मग्रंथों में पर्यावरण की उपस्थिति
हिंदू धर्म में प्रकृति को देवी-देवताओं के रूप में पूजने की परंपरा रही है। वेदों और उपनिषदों में प्रकृति के पांच मूल तत्व अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश को पंचमहाभूत कहा गया है, जिनका आध्यात्मिक और भौतिक दोनों दृष्टियों से महत्व है।
अथर्ववेद के अनुसार, "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।" अर्थात पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। ऋग्वेद में वायु के लिए कहा गया है, "वातस्य पथ्यानि मनो जुजोषत।" यानी हमारा मन वायु के पवित्र मार्ग में लगे। जल को यजुर्वेद में कल्याणकारी माना गया है, "आपः स्वस्ति नः पन्थामनुचरेन्तु।" मतलब जल हमारे लिए कल्याणकारी मार्ग का अनुसरण करे। वहीं ऋग्वेद में वृक्षों को पोषण का स्रोत बताते हुए कहा गया है, "वनस्पते, पुष्टिवर्धन, प्रजाभ्यः पुष्टिं रसं वह।" अर्थात, हे वनस्पति! तू जनसमुदाय को पोषण और ऊर्जा प्रदान कर।
इन श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि वैदिक संस्कृति में पर्यावरण केवल भौतिक संसाधन नहीं बल्कि पूजनीय और संरक्षित तत्व रहा है।
अन्य धर्मों की दृष्टि से प्रकृति
बौद्ध धर्म में अहिंसा और करुणा जैसे सिद्धांत केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सभी जीव-जंतुओं और प्रकृति पर समान रूप से लागू होते हैं। गौतम बुद्ध ने स्वयं जंगलों में साधना कर प्रकृति के साथ गहरा जुड़ाव दर्शाया।
जैन धर्म में पर्यावरण संरक्षण अत्यंत उच्च स्तर पर देखा गया है। यहां सूक्ष्म जीवों की रक्षा के लिए अनुयायी भूमि पर चलने से पहले झाड़ू लगाते हैं, ताकि किसी भी जीव की हिंसा न हो।
इस्लाम में क़ुरान के अनुसार पृथ्वी अल्लाह की अमानत है और मनुष्य उसका खलीफा यानी रक्षक है। स्वच्छता को आधा ईमान बताया गया है, जो पर्यावरण की पवित्रता का मूल संदेश देता है।
ईसाई धर्म में सृष्टि को ईश्वर की रचना माना गया है और मनुष्य को उसका रक्षक। जेनिसिस 1:25-28 में कहा गया है- "परमेश्वर ने जाति जाति के जंगली पशुओं को, जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर रेंगने वाले सब जन्तुओं को बनाया। और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। फिर परमेश्वर ने कहा, 'हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं, और वे समुद्र की मछलियों और आकाश के पक्षियों पर, और घरेलू पशुओं पर, और सारी पृथ्वी पर, और सब रेंगने वाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, प्रभुता करें।' तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया; नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की। परमेश्वर ने उन्हें आशीष दी और उनसे कहा, 'फूलो-फलो और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो। समुद्र की मछलियों और आकाश के पक्षियों और सब रेंगने वाले जन्तुओं पर प्रभुता करो जो पृथ्वी पर रेंगते हैं।"
आधुनिक संदर्भ में धर्म की भूमिका
आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और संसाधनों की कमी जैसे संकटों का सामना कर रही है, धर्म इन समस्याओं के समाधान में नैतिक मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है। विश्व पर्यावरण दिवस 2025 की थीम "प्लास्टिक प्रदूषण का अंत" हमें उपभोग की सीमाओं को पहचानने और जिम्मेदार जीवनशैली अपनाने का आह्वान देती है। धार्मिक सिद्धांत जैसे अहिंसा, अपरिग्रह (संयम), स्वच्छता, प्रकृति पूजा आधुनिक पर्यावरणीय सोच से मेल खाते हैं। धर्म हमें सिखाता है कि हम केवल संसाधनों के उपभोक्ता नहीं, बल्कि उनके रक्षक हैं।
आज अनेक धार्मिक स्थल प्लास्टिक मुक्त क्षेत्र घोषित किए जा रहे हैं। गणेश विसर्जन को पर्यावरण-अनुकूल बनाने के प्रयास हो रहे हैं। कुंभ मेले जैसे आयोजनों में भी स्वच्छता और पर्यावरणीय जागरूकता पर जोर दिया जा रहा है। यह बदलाव दर्शाते हैं कि धर्म यदि जागरूक हो तो जनसाधारण में बड़े पैमाने पर परिवर्तन ला सकता है।
पर्यावरण और धर्म का संबंध केवल आस्था का विषय नहीं बल्कि एक सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक ज़िम्मेदारी है। धर्म हमें यह सिखाता है कि प्रकृति का सम्मान और संरक्षण केवल वैकल्पिक कार्य नहीं बल्कि एक अनिवार्य कर्तव्य है।