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गणेश चतुर्थी 2026: भगवान गणेश की जन्म कथा से चंद्र श्राप तक, जानिए गणेश चतुर्थी से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं

Sat, 12 Sep 2026 07:15 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Sat, 12 Sep 2026 07:15 PM IST
सार

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान गणेश का जन्म भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हुआ है। शास्त्रों में भगवान गणेश के जन्म को लेकर अनेक कथाएं हैं।

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Ganesh Chaturthi 2026 Date Ganesh Ji Birth Katha And Its Significance Puja Vidhi in Hindi
जानिए भगवान गणेश की जन्म कथा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गणेश चतुर्थी केवल भगवान गणेश के जन्मोत्सव का पर्व नहीं, बल्कि श्रद्धा, आस्था और शुभारंभ का प्रतीक भी है। प्रथम पूज्य गणेश को विघ्नहर्ता और बुद्धि-विवेक का देवता माना जाता है। गणेश चतुर्थी से जुड़ी पौराणिक कथाओं में उनके जन्म, गजानन स्वरूप और अग्रपूज्य बनने की कहानी के साथ-साथ चंद्रमा को दिए गए श्राप का भी उल्लेख मिलता है। यही कथाएं इस पर्व की धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं को विशेष महत्व प्रदान करती हैं।
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माता पार्वती ने अपने शरीर के मैल से बनाया था बालक
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं। उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक सुंदर बालक की रचना की और उसे अपना पुत्र मानते हुए गणेश नाम दिया। स्नान के लिए जाते समय माता पार्वती ने गणेशजी को द्वार पर पहरा देने और उनकी अनुमति के बिना किसी को भी अंदर न आने देने का आदेश दिया।इसी दौरान भगवान शिव वहां पहुंचे। गणेशजी ने उन्हें रोकते हुए कहा कि उनकी माता अंदर स्नान कर रही हैं, इसलिए वे भीतर नहीं जा सकते। भगवान शिव ने गणेशजी को समझाया कि पार्वती उनकी पत्नी हैं, लेकिन गणेशजी अपनी माता की आज्ञा से पीछे नहीं हटे।
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शिव-पुत्र संघर्ष में गणेशजी का कटा सिर
माता की आज्ञा का पालन करते हुए गणेशजी द्वारा भगवान शिव को रोकने पर विवाद बढ़ गया। क्रोधित भगवान शिव ने त्रिशूल से गणेशजी का सिर काट दिया। जब माता पार्वती को अपने पुत्र के वध का पता चला तो उन्होंने रौद्र रूप धारण कर लिया और गणेशजी को पुनर्जीवित करने की मांग की। माता पार्वती के क्रोध से देवताओं में भी चिंता फैल गई। भगवान शिव ने उन्हें शांत करने का प्रयास किया, लेकिन वे पुत्र को जीवनदान मिलने तक नहीं मानीं। अंततः भगवान शिव ने भगवान विष्णु से ऐसे बालक का सिर लाने को कहा, जिसकी माता अपने बच्चे की ओर पीठ करके सो रही हो।
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गजमुख लगाकर मिला गणेशजी को नया जीवन
भगवान विष्णु के आदेश पर गरुड़जी ऐसे बालक की तलाश में निकले। कथा के अनुसार उन्हें एक हथिनी अपने बच्चे की ओर पीठ करके सोती हुई मिली। गरुड़जी उस बच्चे का सिर लेकर भगवान शिव के पास पहुंचे। भगवान शिव ने गज का सिर गणेशजी के धड़ पर स्थापित कर उन्हें पुनः जीवन प्रदान किया। गज का मुख धारण करने के बाद गणेशजी गजानन कहलाए। भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि संसार में होने वाली किसी भी पूजा में सबसे पहले गणेशजी की पूजा की जाएगी। तभी से किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में गणेश पूजन की परंपरा चली आ रही है। उन्हें प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता के रूप में पूजा जाता है।

चंद्रमा के अभिमान पर गणेशजी ने दिया श्राप
गणेशजी के गजानन स्वरूप में आने और अग्रपूज्य बनने के बाद सभी देवताओं ने उनकी स्तुति की। कथा के अनुसार चंद्रमा अपने सौंदर्य पर अभिमान करते थे और गणेशजी के स्वरूप को देखकर मंद-मंद मुस्कुराने लगे। गणेशजी ने इसे अपना उपहास समझा और क्रोधित होकर चंद्रमा को श्राप दिया कि वे काले हो जाएं। अपनी भूल का अहसास होने पर चंद्रमा ने गणेशजी से क्षमा मांगी। गणेशजी ने कहा कि सूर्य के प्रकाश से चंद्रमा फिर पूर्ण प्रकाशित होंगे, लेकिन चतुर्थी का दिन उनके दंड की स्मृति के रूप में हमेशा याद किया जाएगा।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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