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ऋषि तर्पण 2026: पितृपक्ष में ऋषि तर्पण का क्या है महत्व? जानें क्यों माना जाता है जरूरी

Sat, 12 Sep 2026 10:21 PM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: श्वेता सिंह Updated Sat, 12 Sep 2026 10:21 PM IST
सार

Pitru Paksha 2026: पितृपक्ष में पितरों के तर्पण के साथ ऋषि तर्पण का भी विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए यह परंपरा निभाई जाती है। जानें ऋषि तर्पण का महत्व और इससे जुड़ी मान्यता।

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Pitru Paksha 2026 Know the Religious Significance of Rishi Tarpan in hindi
pitru paksh 2026 - फोटो : amar ujala

Pitru Paksha 2026 Date: पितृपक्ष का नाम सुनते ही सबसे पहले श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की परंपरा ध्यान में आती है। इस अवधि में लोग अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण कर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं। हालांकि, पितृपक्ष से जुड़ी परंपराओं में ऋषि तर्पण का भी विशेष स्थान बताया गया है। साल 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से होगी और 10 अक्तूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा। धार्मिक मान्यताओं में ऋषि तर्पण को ज्ञान और वैदिक परंपरा के प्रवर्तक ऋषि-मुनियों के प्रति सम्मान प्रकट करने का माध्यम माना जाता है। आइए जानते हैं ऋषि तर्पण क्या है, इसका महत्व क्यों बताया गया है और किन ऋषियों का स्मरण किया जाता है।


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Pitru Paksha 2026 Know the Religious Significance of Rishi Tarpan in hindi
क्या है ऋषि तर्पण?

क्या है ऋषि तर्पण?
तर्पण का अर्थ श्रद्धा और सम्मान के साथ जल अर्पित करना माना जाता है। हिंदू परंपरा में देव तर्पण, ऋषि तर्पण और पितृ तर्पण का अलग-अलग महत्व बताया गया है। ऋषि तर्पण के दौरान उन ऋषि-मुनियों का स्मरण किया जाता है, जिन्होंने ज्ञान, धर्म, संस्कार और वैदिक परंपराओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसके जरिए उनके प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा प्रकट करने की भावना जुड़ी हुई है।

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पितृपक्ष में ऋषि तर्पण क्यों है महत्वपूर्ण? - फोटो : गढ़ी गांव में खलिहान की भूमि से जेसीबी के माध्यम से हटाया जा रहा अतिक्रमण।

पितृपक्ष में ऋषि तर्पण क्यों है महत्वपूर्ण?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण बताए गए हैं-देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। देव ऋण को देवताओं के प्रति कर्तव्य, ऋषि ऋण को ज्ञान एवं धर्म की परंपरा के प्रति जिम्मेदारी और पितृ ऋण को अपने पूर्वजों के प्रति कर्तव्य से जोड़ा जाता है। इसी मान्यता के आधार पर ऋषि तर्पण को ऋषि ऋण के प्रति सम्मान व्यक्त करने की परंपरा माना जाता है। मान्यता है कि ऋषि-मुनियों ने समाज को ज्ञान और धार्मिक जीवन की दिशा दिखाई। ऐसे में उनका स्मरण करना और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करना भारतीय धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।

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पितृ तर्पण से पहले ऋषियों का स्मरण क्यों? - फोटो : freepik

पितृ तर्पण से पहले ऋषियों का स्मरण क्यों?
पितृपक्ष से जुड़ी मान्यताओं में भाद्रपद पूर्णिमा को ऋषि तर्पण के लिए विशेष माना जाता है। इसके बाद पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण की प्रक्रिया शुरू होती है। इसके पीछे धार्मिक दृष्टि से यह भाव बताया जाता है कि श्राद्ध और तर्पण जैसी परंपराएं जिस धार्मिक एवं वैदिक ज्ञान पर आधारित हैं, उसे आगे बढ़ाने में ऋषि-मुनियों की अहम भूमिका रही है। इसलिए पहले ऋषि परंपरा के प्रति सम्मान व्यक्त करने और फिर अपने पूर्वजों का स्मरण करने की मान्यता प्रचलित है।

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कैसे हुआ सप्तऋषि की प्रतिमा का निर्माण

किन ऋषियों का किया जाता है स्मरण?
ऋषि तर्पण की परंपरा में सप्तऋषियों का विशेष रूप से स्मरण किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार सप्तऋषियों के नाम हैं:

  • कश्यप
  • अत्रि
  • भारद्वाज
  • विश्वामित्र
  • गौतम
  • जमदग्नि
  • वशिष्ठ

इन सप्तऋषियों को भारतीय धार्मिक और ज्ञान परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। ऋषि पंचमी के अवसर पर भी इन ऋषियों की पूजा और वंदना करने की परंपरा बताई जाती है।

 

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