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Hindi News ›   Spirituality ›   Religion ›   Where and Why Lord Hanuman Was in Mahabharata Know Mahabharat Important Facts You Must Read

Lord Hanuman in Mahabharata: पांडवों को कौरवों पर विजय हनुमानजी की कृपा से मिली थी, जानें इससे जुड़ी कथा

Thu, 10 Nov 2022 05:09 PM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमरउजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमरउजाला, नई दिल्ली Published by: श्वेता सिंह Updated Thu, 10 Nov 2022 05:09 PM IST
सार

महाभारत के युद्ध में श्री कृष्ण के कहने पर हनुमान जी ने महाभारत युद्ध में सम्मिलित होने का निर्णय लिया था। लेकिन पवनपुत्र ने भी युद्ध में शामिल होने से पूर्व एक शर्त रखी थी। कहते हैं इसी शर्त को पूर्ण करने के लिए श्रीकृष्ण ने गीता का सार अर्जुन को समझाया था।   
 

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Where and Why Lord Hanuman Was in Mahabharata Know Mahabharat Important Facts You Must Read
पांडवों को कौरवों पर विजय हनुमानजी की कृपा से मिली थी

विस्तार

Hanuman ji In Mahabharat Facts: महाभारत एक धर्म ग्रंथ के रूप में प्रसिद्ध है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, महाभारत के युद्ध में पांडवों को श्री कृष्ण की  वजह से विजय मिली थी, लेकिन कुछ ज्योतिषाचार्यों के अनुसार महाभारत के युद्ध में पांडव श्री कृष्ण नहीं बल्कि हनुमान जी के कारण विजयी हुए थे। मान्यता है कि हनुमान जी ने श्री कृष्ण के कहने पर ही महाभारत के युद्ध में सम्मिलित होने का निर्णय लिया था। हालांकि पवन पुत्र ने युद्ध में शामिल होने से पूर्व एक शर्त भी रखी थी। कहते हैं इसी शर्त को पूरा करने के लिए श्रीकृष्ण ने गीता का सार अर्जुन को समझाया था। आइए जानते हैं क्या है कथा।  

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पढ़ें पौराणिक कथा 

महाभारत युद्ध से पूर्व श्री कृष्ण ने हनुमान जी और अर्जुन दोनों को द्वारका नगरी आने का आमंत्रण दिया था। जब दोनों द्वारका पहुंचे तब श्री कृष्ण ध्यान में लीन में तो यी में हनुमान जी और अर्जुन दोनों समुद्र के किनारे उनकी प्रतीक्षा करने लगे।  बातों बातों में हनुमान जी को आभास हुआ कि अर्जुन को अपनी धनुर्विद्या का घमंड हो गया है। जब हनुमान जी के सामने अर्जुन ने भगवान राम का उपहास उड़ाते हुए कहा कि लंका के लिए पत्थर का सेतु बनाने की जगह उन्हें बाण का सेतु बनाना चाहिए था। हनुमान जी को यह बात चुभ गई। उन्होंने अर्जुन के समक्ष बाण का सेतु बनाने का प्रस्ताव रखा साथ ही यह भी कहा कि अगर उनके खड़े होने से अगर वह सेतु नहीं टूटा तो हनुयामन जी अग्नि में अपना देह त्याग करेंगे। अर्जुन ने उनकी बात माँ ली और सेतु बनाने लगे। अर्जुन ने तीन बार सेतु बनाया और तीनों बार हनुमान जी के पैर रखते ही सेतु टूट गया। सेतु टूटने के साथ ही अर्जुन का घमंड भी चूर चूर हो गया। श्री कृष्ण ने हनुमान जी के माध्यम से अर्जुन को उनकी भूल का एहसास कराया। दूसरी ओर उन्होंने हनुमान जी से ध्वजा के रूप में अर्जुन के रथ पर स्थापित होने का आग्रह किया। हनुमान जी ने प्रभु की बात का मान रखा लेकिन साथ ही उनसे शर्त राखी जिस प्रकार त्रेता ईग में रामअवतार में उन्होंने हनुमान को युद्ध के साथ साथ ज्ञान भी दिया था उसी प्रकार उन्हें महाभारत युद्ध में भी ज्ञान का सार चाहिए। कहते हैं श्रीकृष्ण ने गीता  का सार अर्जुन की आड़ में हनुमान जी की विनती पर उन्हें सुनाया था। 
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महाभारत में हनुमान जी के होने के अन्य तथ्य 

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार महाभारत युद्ध में हनुमान जी ध्वजा रूप में 18 दिनों तक अर्जुन के रथ पर  थे।
कहते हैं कि अर्जुन का रथ तो दिव्य और विस्फोटक बाणों के कारण शुरू में ही ध्वस्त हो जाता लेकिन हनुमान जी के विराजित होने के कारण अर्जुन और उनका रथ दोनों सुरक्षित रहे। 
ग्रंथों के अनुसार, युद्ध के बाद श्री कृष्ण ने अर्जुन को रथ से उतरने के लिए कहा और खुद भी रथ से दूर चले गए और उनके जाने के बाद हनुमान जी भी वहां से अंतर्ध्यान हो गए। उनके जाते ही दो पल में ही रथ भयंकर अग्नि की चपेट में आ गाया और भस्म हो गया। 

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