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विष्णु से उत्पन्न हुई देवी ने बचाए विष्णु के प्राण
टीम डिजिटल
Updated Fri, 29 Nov 2013 03:55 PM IST
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मार्गशीर्ष मास की एकादशी तिथि का शास्त्रों में बड़ा ही महत्व है। इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी के नाम से जाना जाता है।
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माना जाता है कि इसी दिन से एकादशी व्रत की शुरूआत हुई थी क्योंकि सतयुग में इसी एकादशी तिथि को भगवान विष्णु के शरीर से एक देवी का जन्म हुआ था। इस देवी ने भगवान विष्णु के प्राण बचाए जिससे प्रसन्न होकर विष्णु ने इन्हें देवी एकादशी नाम दिया।
इस संदर्भ में कथा है कि मुर नामक असुर से युद्घ करते हुए जब भगवान विष्णु थक गए तब बद्रीकाश्रम में गुफा में जाकर विश्राम करने लगे। मुर भगवान विष्णु का पीछा करता हुए बद्रीकाश्रम पहुंच गया। निद्रा में लीन भगवान को मुर ने मारना चाहा तभी विष्णु भगवान के शरीर से एक देवी का जन्म हुआ और इस देवी ने मुर का वध कर दिया।
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देवी के कार्य से प्रसन्न होकर विष्णु भगवान ने कहा कि देवी तुम्हारा जन्म मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को हुआ है इसलिए तुम्हारा नाम एकादशी होगा। आज से प्रत्येक एकादशी को मेरे साथ तुम्हारी भी पूजा होगी। जो भक्त एकादशी का व्रत रखेगा वह पापों से मुक्त हो जाएगा।
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मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को एकादशी देवी का अवतार हुआ था इसलिए सभी एकादशी में इसका बड़ा महत्व है। एकादशी देवी विष्णु की माया से प्रकट हुई थी। शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति श्रद्घा भाव से उत्पन्ना एकादशी का व्रत रखता वह मोहमाया के प्रभाव से मुक्त हो जाता है, छल-कपट की भावना उसमें कम हो जाती है और अपने पुण्य के प्रभाव से व्यक्ति विष्णु लोक में स्थान पाने योग्य बन जाता है।
इस वर्ष यह एकादशी 29 नवंबर को है। जो लोग यह व्रत करना चाहते हैं उन्हें एकादशी के दिन प्रातः उठकर भगवान विष्णु एवं देवी एकादशी की पूजा करनी चाहिए। पूरे दिन निराहार रहकर संध्या पूजन के बाद फलाहार चाहिए। परनिंदा, छल-कपट, लालच, द्वेष से भावना मन में न लाएं। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाने के पश्चात स्वयं भोजन करें।