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कब है सर्वपितृ अमावस्या 9 या 10 अक्तूबर ? जानें तर्पण की तिथि, महत्व और कुतुप-रौहिण मुहूर्त

Tue, 06 Oct 2026 06:31 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Tue, 06 Oct 2026 06:31 PM IST
सार

हर साल आश्विन माह की अमावस्या पर सर्वपितृ अमावस्या मनाई जाती है। इस दिन पितरों का तर्पण करते हुए उनकी विदाई करते हैं। 
 

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sarva pitru amavasya 2026 date kab kare shradh and importance of sarva pitru amavasya
सर्वपितृ अमावस्यासर्वपितृ अमावस्या - फोटो : अमर उजाला AI

विस्तार

हिंदू धर्म में सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व होता है। इस दिन को पितरों को तर्पण और पिंडदान करने का आखिरी दिन माना जाता है। यह दिन 15 दिनों तक चलने वाले पितृपक्ष का आखिरी दिन होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन सभी पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है। जिन पूर्वजों की मृत्यु की तिथि ज्ञान नहीं होती या फिर किसी कारण से उनका श्राद्ध नहीं हो पाता है उनका इस तिथि पर श्रद्धापूर्वक पितरों को स्मरण करने और दान-पुण्य करने की परंपरा होती है। सर्वपितृ अमावस्या पर पीपल के पेड़ की पूजा करना बहुत ही शुभ और पवित्र माना जाता है। आइए जानते हैं कब है पितृ अमावस्या की तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व। 

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सर्वपितृ अमावस्या तिथि 2026
सर्वपितृ अमावस्या तिथि की शुरुआत- 9 अक्तूबर को रात 9 बजकर 35 मिनट पर।
सर्वपितृ अमावस्या तिथि का समापन- 10 अक्तूबर को रात 9 बजकर 19 मिनट पर। 
वैदिक पंचांग के अनुसार, सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्तूबर को मनाई जाएगी। 

सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध का महत्व 2026
सर्वपितृ अमावस्या पर कुतुप मुहूर्त का समय सुबह 11 बजकर 45 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा। वहीं रौहिण मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 31 मिनट से लेकर दोपहर 01 बजकर 18 मिनट तक रहेगा। अपराह्न काल का मुहूर्त दोपहर 01 बजकर 18 मिनट से लेकर 3 बजकर 37 मिनट तक रहेगा। 
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सर्वपितृ अमावस्या तिथि का महत्व
शास्त्रों में सर्वपितृ अमावस्या तिथि का महत्व अत्यधिक बताया गया है क्योंकि यह तिथि उन सभी पितरों के श्राद्ध के लिए होती है जिनकी तिथियां भूल जाने पर, या किसी कारणवश श्राद्ध न कर पाने पर, इस दिन सामूहिक रूप से श्राद्ध एवं तर्पण किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन दान-पुण्य, पितरों का स्मरण और श्राद्ध करने से वे प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। इससे जीवन की कठिनाइयां दूर होती हैं और घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। शास्त्रों के अनुसार पितृदेव ही देवताओं से पहले पूजनीय हैं। मनुस्मृति और गरुड़ पुराण में कहा गया है कि यदि पितर प्रसन्न हों तो देवता भी प्रसन्न होते हैं। वहीं पितरों की नाराजगी को पितृदोष कहा जाता है, जो जीवन में बाधाएं, असफलताएं और अशांति का कारण बनता है। ऐसे में सर्वपितृ अमावस्या के दिन किए गए दान और तर्पण से पितृदोष समाप्त होता है और परिवार पर सुख-समृद्धि बनी रहती है।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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