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Navratri 2019: क्यों इतना अधिक महत्व है शक्तिपीठों का ?

Fri, 20 Sep 2019 08:51 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Fri, 20 Sep 2019 08:51 AM IST
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Navratri 2019: significance of 51 shakti peethas of goddess in navratri
vaishno devi
मां दुर्गा के नौ स्वरूप है और नवरात्रि में मां के इन्हीं स्वरूपों की आराधना की जाती है। नवरात्रि के दिनों में मां के मंदिरों में भारी संख्या में भक्तों का ताता लगता है, उनमें भी मां के शक्तिपीठ मंदिरो का विशेष महत्व है। पवित्र शक्तिपीठ धाम विभिन्न-विभिन्न स्थानों पर स्थापित हैं। देवी पुराण के अनुसार 51 शक्तिपीठ  है जिनमें भारत में 42, पाकिस्तान में 1, बांग्लादेश में 4, श्रीलंका में 1, तिब्बत में 1 तथा नेपाल में 2 शक्तिपीठ स्थापित हैं। 
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शक्तिपीठ की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार माता दुर्गा ने राजा प्रजापति दक्ष की पुत्री सती के रूप में जन्म लिया और भगवान शिव से उनका विवाह हुआ। एक बार ऋषि-मुनियों के एक समूह ने यज्ञ का आयोजन करवाया जिसमें सभी देवी-देवताओं को निमंत्रण दिया गया। प्रजापति दक्ष जब यज्ञ में पहुंचे तो आए हुए सभी लोग उनके आदर में खड़े हो गए परंतु भगवान शिव खड़े नहीं हुए।
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भगवान शिव दक्ष के दामाद थे तो यह देखकर उन्होंने खुद को बहुत अपमानित महसूस किया और वे बेहद क्रोधित हो गए। उन्होंने भी अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए एक यज्ञ का आयोजन करवाया, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया लेकिन भगवान शिव को इस यज्ञ का आमंत्रण नहीं भेजा गया।
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इस यज्ञ में भगवान शिव शामिल नहीं हुए और जब नारद जी ने देवी सती को यज्ञ कि जानकारी दी तो वे क्रोधित हो उठीं। तब नारद ने उन्हें सलाह दी कि पिता के घर पर जाने के लिए निमंत्रण की जरूरत नहीं होती है। नारद की बात सुन मां सती ने भगवान शिव से चलने का आग्रह किया। प्रभु ने स्वयं जाने से इंकार कर दिया और उन्हें समझाया कि बिना निमंत्रण नहीं जाना चाहिए। सती नहीं मानी और अकेले ही पिता के घर यज्ञ में चलीं गई।

सती ने जब अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित न करने का कारण पूछा तो पिता  राजा दक्ष ने उग्र विरोध प्रकट किया और इस पर भगवान शंकर के बारे में अपमानजनक बातें करने लगे। इस अपमान से पीड़ित होकर मां सती ने उसी यज्ञ-कुंड में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दें दी। 

भगवान शंकर को इस बात का पता चलते ही क्रोध से उनकी तीसरी आंख खुल गई और समस्त ब्रम्हाण्ड में प्रलय व हाहाकार मच गया। शिव जी ने वीरभद्र को राजा दक्ष का सिर काटने का आदेश दिया। वीरभद्र जी ने अन्य सभी देवताओं को शिव निंदा सुनने की भी सजा दी। भगवान शंकर ने दुखी होकर यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को बहार निकाला और कंधे पर उठाकर सारे भूमंडल में घूमने लगे। 


सती का शव लेकर शिव पृथ्वी पर तांडव करने लगे। ऐसा करने से पृथ्वी पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न होने लगी। पृथ्वी समेत तीनों लोकों पर प्राणी व्याकुल होने लगे तब भगवान विष्णु अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंड-खंड कर धरती पर गिराते गए। जब-जब शिव नृत्य करते  हुए जमीन पर पैर पटकते, विष्णु अपने चक्र से मां सती के शरीर का कोई अंग काटकर उसके टुकड़े पृथ्वी पर गिरा देते। 
 

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शास्त्रों के अनुसार जिस-जिस स्थान पर सती के अंग के टुकड़े, उनके वस्त्र या आभूषण गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ का उदय हुआ।
 
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