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पापकर्म से मुक्ति के लिए तिल खाएं, पिएं और लगाएं
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
Updated Tue, 05 Feb 2013 02:02 PM IST
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पृथ्वी को मृत्यु लोक और कर्म भूमि कहा गया है। यहां ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो एक क्षण भी कर्म किये बिना रह सकता है। कर्म अच्छे भी हो सकते हैं और बुरे भी हो सकते हैं। कर्म से ही हमारे पाप और पुण्य का लेखा-जोखा तैयार होता है। पाप कर्म के प्रभाव से मुक्ति के लिए भी कर्म करना करना पड़ता है।
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शास्त्रों में कई ऐसे उपाय यानी कर्म बताए गये हैं जिनसे पाप कर्मों के प्रभाव से मुक्ति मिल सकती है। ऐसा ही एक कर्म है माघ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत। इस एकादशी को षटतिला एकादशी के नाम से जाना जाता है। अपने नाम के अनुसार इस एकादशी में छः प्रकार से तिल का उपयोग करना श्रेष्ठ बताया गया है।
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जो लोग षटतिला एकादशी का व्रत रखना चाहते हैं उन्हें प्रातः सूर्योदय से पहले उठकर नित्यक्रिया के बाद तिल का उबटन लगाकर पानी में तिल मिलाकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद भगवान श्री कृष्ण को तिल का प्रसाद अर्पित करें और तिल से ही हवन करें। इस एकादशी के व्रत में तिल का दान करना उत्तम बताया गया है। जल पीने की इच्छा हो तो जल में तिल मिलाकर पिएं।
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जो लोग व्रत नहीं कर सकते हैं उनके लिए जितना संभव हो तिल का उपयोग करें। तिल खाएं, तिल मिला हुआ पानी पिएं। तिल का उबटन लगाकर स्नान करें और तिल का दान भी करें। अगर इतना सबकुछ करना संभव नहीं हो तो सिर्फ तिल का उच्चारण ही करें तो भी पाप कर्मों के अशुभ प्रभाव में कमी आएगी।