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2 वर्ष की उम्र में वेदों का ज्ञान और 8 की आयु में संन्यासी, जानिए शंकर से शंकराचार्य बनने की कहानी

Wed, 08 May 2019 12:59 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Wed, 08 May 2019 12:59 PM IST
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shankaracharya jayanti interesting facts about adi shankaracharya
adi shankaracharya

ये कहानी है एक ऐसे बालक की जिसने मात्र 2 वर्ष की अल्प आयु में वेदों, उपनिषद, रामायण, महाभारत को कंठस्थ कर लिया था। 7 वर्ष की आयु में प्रवेश करते ही इस बालक ने संन्यास ग्रहण कर लिया था। माता-पिता के वर्षों की तपस्या के बाद हुए इस बालक को उसकी मां ने संन्यासी बनने की आज्ञा दी। ऐसा संन्यासी जिसने गृहस्थ जीवन त्यागने के बाद भी अपनी मां का दाह संस्कार किया। शंकर नाम का यह बालक जगद्गगुरु शंकराचार्य कहलाया। 9 मई 2019 को आदि गुरु शंकराचार्य की जयंती है इस मौके पर आइए जानते है उनके जीवन से जुड़े कुछ रहस्यों को...

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वैशाख शुक्ल पंचमी को हिंदू धर्म की ध्वजा को देश के चारों कोनों में फहराने वाले और भगवान शिव के अवतार आदि शंकराचार्य ने जन्म लिया था। हिंदू धर्म की पुर्नस्थापना करने वाले आदि शंकराचार्य का जन्म लगभग 1200 वर्ष पूर्व कोचीन से 5-6 मील दूर कालटी नामक गांव में नंबूदरी ब्राह्राण परिवार में जन्म हुआ था। आदि शंकराचार्य बचपन में ही बहुत प्रतिभाशाली बालक थे।
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भगवान शिव के आशीर्वाद से पैदा हुए आदि शंकराचार्य
ब्राह्राण दंपति के विवाह होने के कई साल के बाद भी कोई संतान नहीं हुई। संतान प्राप्ति के लिए ब्राह्राण दंपति ने भगवान शंकर की आराधना की। उनकी कठिन तपस्या से खुश होकर भगवान शंकर ने सपने में उनको दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा।
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इसके बाद ब्राह्राण दंपति ने भगवान शंकर से ऐसी संतान की कामना की जो दीर्घायु भी हो और उसकी प्रसिद्धि दूर दूर तक फैले। तब भगवान शिव ने कहा कि या तो तुम्हारी संतान दीर्घायु हो सकती है या फिर सर्वज्ञ, जो दीर्घायु होगा वो सर्वज्ञ नहीं होगा और अगर सर्वज्ञ संतान चाहते हो तो वह दीर्घायु नहीं होगी। तब ब्राह्राण दंपति ने वरदान के रूप में दीर्घायु की बजाय सर्वज्ञ संतान की कामना की।

वरदान देने के बाद भगवान शिव ने ब्राह्राण दंपति के यहां संतान रूप में जन्म लिया। वरदान के कारण ब्राह्राण दंपति ने पुत्र का नाम शंकर रखा। शंकराचार्य बचपन से प्रतिभा सम्पन्न बालक थे। जब वह मात्र तीन साल के थे तब पिता का देहांत हो गया। तीन साल की उम्र में ही उन्हें मलयालम का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। 

मां से ऐसा लिया संन्यासी बनने की आज्ञा
शंकराचार्य के संन्यास ग्रहण की कहानी बहुत ही अनोखी है। बालक शंकर का रूझान संन्यासी बनने की तरफ था। उनकी माता अपने एकमात्र पुत्र को संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं दे रही थी। तब एक दिन नदी किनारे एक मगरमच्छ ने शंकराचार्य जी का पैर पकड़ लिया तब इस वक्त का फायदा उठाते शंकराचार्यजी ने अपने माँ से कहा माँ मुझे संन्यास लेने की आज्ञा दे दो नहीं तो यह मगरमच्छ मुझे खा जाएगा।, इससे भयभीत होकर माता ने तुरंत इन्हें संन्यासी होने की आज्ञा प्रदान कर दी। 


कम उम्र में ही वेदों का ज्ञान
कम उम्र में उन्हें वेदों का पूरा ज्ञान हो गया था और 12 वर्ष की उम्र में शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था। 16 वर्ष की अवस्था में 100 से भी अधिक ग्रंथों की रचना कर चुके थे। बाद में माता की आज्ञा से वैराग्य धारण कर लिया था। मात्र 32 साल की उम्र में केदाननाथ में उनकी मृत्यु हो गई। आदि शंकराचार्य ने हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार के लिए देश के चारों कोनों में मठों की स्थापना की थी जिसे आज शंकराचार्य पीठ कहा जाता है।

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