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आदि शंकराचार्य ने शिखर पर पहुंचाई वैदिक संस्कृति
पूनम नेगी
Updated Fri, 20 Apr 2018 10:54 AM IST
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आदि शंकराचार्य ने यद्यपि मात्र 32 वर्ष की आयु पाई, लेकिन इतने से जीवन काल में उन्होंने वैदिक संस्कृति की रक्षा के लिए जो प्रयास और पुरुषार्थ किए, उसकी जगत वंदना करता है। वैदिक पंरपरा को अक्षुण्ण रखने के लिए देश के चारों कोनों में चार आधार केंद्रों (बद्रीनाथ, रामेश्वरम, जगन्नाथ पुरी और द्वारिका मठ) की स्थापना की। सांस्कृतिक जागरण से लेकर राजधर्म को सही दिशा देने और अध्यात्म साधना के शिखर पर आरुढ़ होकर राष्ट्रीय एकता की स्थापना के प्रयास अनवरत चलाते हुए उन्होंने भारत भर में धर्म और अध्यात्म का जयघोष किया।
आचार्य शंकर के समय में महात्मा बुद्ध का दिव्य तत्व दर्शन अपना मूल स्वरूप खो चुका था। सीमाओं पर आक्रांताओं की ललचाई दृष्टि पड़ चुकी थी। ऐसे समय में देश की मनीषा को झकझोरते हुए उन्होंने वैदिक धर्म के प्रचार के लिए चिद्विलास, विष्णु गुप्त, हस्तामलक, समित पाणि, ज्ञानवृन्द, भानु गर्भिक, बुद्धि विरंचि, त्रोटकाचार्य, पद्मनाम, शुद्धकीर्ति, मंडन मिश्र, कृष्ण दर्शन आदि विद्वानों को संगठित किया और भारत भर में धर्म सुधार की हलचल मचा दी।
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आचार्य शंकर के समय में महात्मा बुद्ध का दिव्य तत्व दर्शन अपना मूल स्वरूप खो चुका था। सीमाओं पर आक्रांताओं की ललचाई दृष्टि पड़ चुकी थी। ऐसे समय में देश की मनीषा को झकझोरते हुए उन्होंने वैदिक धर्म के प्रचार के लिए चिद्विलास, विष्णु गुप्त, हस्तामलक, समित पाणि, ज्ञानवृन्द, भानु गर्भिक, बुद्धि विरंचि, त्रोटकाचार्य, पद्मनाम, शुद्धकीर्ति, मंडन मिश्र, कृष्ण दर्शन आदि विद्वानों को संगठित किया और भारत भर में धर्म सुधार की हलचल मचा दी।
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