Shani Jayanti 2024: शनि जयंती आज, जानिए आपके ऊपर किस तरह पड़ती है शनिदेव की द्दष्टि और जन्म कथा
शनिदेव पृथ्वी वासियों को उनके शुभा-शुभ कर्मों का फल अपनी तीक्ष्णदृष्टि, शाढ़ेसाती, ढैया, महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यंतरदशा, सूक्ष्मदशा और प्राणदशा के द्वारा प्रदान करते हैं।
विस्तार
मृत्युलोक के दंडाधिकारी शनिदेव का जन्म दिवस ज्येष्ठ अमावस्या बृहस्पतिवार 06 जून को मनाया जाएगा। इनके जन्म के विषय में पौराणिक कथा है कि- एक बार असीम तेजस्वी सूर्यदेव की पत्नी संज्ञा ने अपने पति का असह्य तेज सहन न कर पाने के कारण अपने ही शरीर से एक अतिशय सुन्दरी 'छाया' नाम की स्त्री को उत्पन्न किया और कहा- हे वराराने ! तुम मेरे पतिदेव विवस्वान की सेवा करो और मेरे बालकों को माता के समान स्नेह से पालन-पोषण करो। उस अपूर्व सुन्दरी 'छाया' द्वारा इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेने पर व्रतपरायणा संज्ञा अपने पिता विश्वकर्मा के घर चली गईं किन्तु पिता ने उन्हें बगैर पति की आज्ञा के और उन्हें सूचित किए बिना आने पर अपने घर में प्रवेश नहीं दिया और वापस जाने को कहा।
पिता द्वारा अपने घर में प्रवेश न देने पर वे जंगल की ओर चली गईं और अपना रूप बदलकर घोड़ी का रूप धारण करके जंगल में ही विचरण करने लगीं। उस समय सूर्य को भी इस रहस्य का पता नहीं चला और वे छाया को ही संज्ञा समझकर आदरपूर्वक पूर्ववत व्यवहार करते रहे। कुछ समय बाद उन्होंने मनु के समान तेजस्वी और पराक्रमी पुत्र को उत्पन्न किया जो सावर्णि नाम से विख्यात हुए। इसके उपरान्त शनि नामक एक पुत्र तथा विष्टि और तपती नाम की दो कन्याओं को भी सूर्यदेव ने छाया को ही संज्ञा समझते हुए उत्पन्न किया। इसीलिए शनिदेव को छायापुत्र भी कहा जाता है। कालान्तर में इस रहस्य का पता चलने पर कि, संज्ञा सूर्य के तेज को सहन नहीं कर पा रहीं थी इसीलिए उन्होंने ऐसा किया तब उनके पिता विश्वकर्मा बहुत दुखी हुए और उन्होंने सूर्य से अपने असह्य तेज को कम करने की प्रार्थना की जिसे सूर्यदेव ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। 'मत्स्य पुराण' के अनुसार विश्वकर्मा ने उन्हें अपने भूमियंत्र पर बैठाकर उनके ही तेज से शिव का त्रिशूल, इंद्र का वज्र और विष्णु का चक्र सुदर्शन निर्मित किया। कुछ ही दिनों में सूर्य ने संज्ञा ढूंढकर पुनः प्राप्त कर किया।
शनि से शनिदेव बनने की यात्रा
माता-पिता द्वारा हो रही ऐसी घटनाओं से आहत शनि काशी जाकर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हजारों वर्षों तक घोर तपस्या की। उनके दीर्घकालिक कठोर तप से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें वरदान स्वरूप ग्रहों में स्थान देकर देवत्व प्रदान करते हुए उन्हें शनि से शनिदेव बना दिया और मृत्युलोक का दंडाधिकारी नियुक्त करते हुए कहा कि- वत्स ! तुम पृथ्वीलोक के प्राणियों को उनके शुभा-शुभ कर्मों के अनुसार दंड निश्चित करते हुए न्याय प्रदान करो। तभी से शनिदेव पृथ्वी वासियों को उनके शुभा-शुभ कर्मों का फल अपनी तीक्ष्णदृष्टि, शाढ़ेसाती, ढैया, महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यंतरदशा, सूक्ष्मदशा और प्राणदशा के द्वारा प्रदान करते हैं।
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शाढ़ेसाती की अवधि
शनिदेव की साढ़ेसाती एक राशि पर 2700 दिनों तक चलती है यह पूर्ण कालखंड कष्टकारक ही हो ऐसा नहीं हैं। किस अंग पर इनका विचरण होता है यदि आप इसे समझ कर उसी के अनुसार निर्णय और उपाय करें तो इनके अशुभ प्रभावों से बचा जा सकता है।
इसका आरंभिक प्रभाव 100 दिनों तक प्राणियों के मुख पर रहता है जो कष्ट कारक होता है। दूसरा प्रभाव 400 दिनों तक दाहिनी भुजा पर रहता है, जो सर्वथा विजयश्री दिलाता है। भारत के अधिकतर बड़े बड़े राजनेता साढ़ेसाती की इसी अवधि में सर्वोच्च शिखर तक पहुंचे हैं। तीसरा प्रभाव 600 दिनों तक प्राणियों के चरणों में रहता है, जिससे व्यक्ति देश-विदेश की यात्राएं, तीर्थ यात्राएं करता है। व्यापार और नौकरी आदि में अच्छी उन्नति और मकान-वाहन के सुख भोगता है। चौथा प्रभाव 500 दिनों तक पेट पर रहता है, जो हर प्रकार से लाभदायक सिद्ध होता है, स्वास्थ्य अच्छा रहता है और अनेकों स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद मिलता है।
पांचवां प्रभाव 400 दिनों तक बाईं भुजा पर रहता है, जो बेहद कष्टकारक रहता है। छठवां प्रभाव 300 दिनों तक प्राणियों के मस्तक पर रहता है जिसके फलस्वरूप एवं पद और गरिमा की वृद्धि होती है। इस अवधि में व्यक्ति जहां भी जाता है उसे कामयाबी और यश प्राप्त होता है। सातवां प्रभाव 200 दिनों तक नेत्रों पर रहता है, जिसके शुभ प्रभाव के फलस्वरूप वह तीर्थ यात्रा, यज्ञ, जप-तप, पूजा-पाठ, दान पुण्य आदि सभी तरह के अच्छे कर्म करता है। आठवां प्रभाव 200 दिनों तक प्राणियों के गुदास्थान पर होता है, जिसके फलस्वरूप उसे अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता है। इस कालखंड की परेशानियों को व्यक्ति जीवनपर्यंत याद रखता है।
अशुभ प्रभाओं से बचने के उपाय
सन्मार्ग पर चलना, जरूरत मंद लोगों की मदद करना, बुजुर्गों की सेवा करना, शनिदेव का कवच, स्तोत्र, वैदिक, लौकिक और तांत्रिक मंत्रों का पाठ-जप करना, पीपल वृक्ष की आराधना, परिक्रमा, आरोपण, शनिवार को वृक्ष के समीप सरसों के तेल का दिया जलाना, शमी वृक्ष की पूजा करना जैसे कार्यों से प्रसन्न होकर ये भक्तों को कष्टों से मुक्ति और अभीष्ट फल प्रदान करते हैं।