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पहले दिन क्यों होती है शैलपुत्री की पूजा?

Thu, 25 Sep 2014 03:53 PM IST
Updated Thu, 25 Sep 2014 03:53 PM IST
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shailputri pooja in navratra first day

मां दुर्गा के नौ रुपों में पहला रुप है शैलपुत्री का। नवरात्र के पहले दिन घट स्थापना के साथ देवी के इसी रुप की पूजा की जाती है। मां का यह रुप सौम्य और भक्तों को प्रसन्नता देने वाला है।

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ऐसी मान्यता है कि देवी पार्वती पूर्व जन्म में दक्ष प्रजापति की पुत्री सती थी। दक्ष के यज्ञ कुंड में जलकर देवी सती ने जब अपने प्राण त्याग दिए तब महादेव से पुनः मिलन के लिए इन्होंने पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रुप में जन्म लिया।
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पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण यह हैमवती और उमा नाम से जानी जाती हैं। पर्वत को शैल भी कहा जाता है इसलिए माता का प्रथम रुप शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है।

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शैलपुत्री की पूजा नवरात्र के पहले दिन क्यों

shailputri pooja in navratra first day

ऐसी कथा है कि देवी पार्वती ने अपने पूर्वजन्म के पति भगवान शिव को पुनः पाने के लिए वर्षों कठोर तप किया। इनके तप से प्रसन्न होकर महादेव ने पार्वती को पत्नी रुप में स्वीकार कर लिया।

विवाह के पश्चात देवी पार्वती अपने पति भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गई। इसके बाद मां पार्वती हर साल नवरात्र के नौ दिनों में पृथ्वी पर माता-पिता से मिलने अपने मायका आने लगी।

संपूर्ण पृथ्वी माता का मायका माना जाता है। नवरात्र के पहले दिन पर्वतराज अपनी पुत्री का स्वागत करके उनकी पूजा करते थे इसलिए नवरात्र के पहले दिन मां के शैलपुत्री रुप की पूजा की जाती है।

शैलपुत्री को प्रसन्न करने के उपाय

shailputri pooja in navratra first day

भगवती शैलपुत्री भगवान शिव की अर्धांगिनी है। भगवान शिव के साथ नित इनका निवास होने के कारण इनके स्वरुप में महादेव की झलक मिलती है। माता शैलपुत्री ने वृषभ को अपना वाहन बनाया है।

मां के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। त्रिशूल इस बात का प्रतीक है कि मां अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और कमल प्रतीक है कि भक्तों को मां से हर प्रकार की रिद्घि सिद्घि प्राप्त होती है।

इस दिन साधन करने वाले अपना ध्यान मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं। मां को प्रसन्न करने के लिए मां के ध्यान मंत्र से पूजा आरंभ करें। इसके बाद दुर्गा सप्तशती का कम से कम पहला अध्याय कवच, कीलक और अर्गला के साथ अवश्य पढ़ें।

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