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14 नवंबर को मनाया जाएगा भगवान महावीर का निर्वाण उत्सव, जानिए क्यों कहलाए महावीर ?

Wed, 11 Nov 2020 12:28 PM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन, वास्तुविद
अनीता जैन, वास्तुविद Published by: विनोद शुक्ला Updated Wed, 11 Nov 2020 12:28 PM IST
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mahavir nirvan diwas 2020 nirvayotsav of 24th tirthankara
भगवान महावीर का निर्वाण उत्सव
जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर के निर्वाण दिवस इस बार 14 नवंबर को मनाया जाएगा। जैन धर्म के लोग इस दिन को दीपावली के रूप में मनाते हैं।
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महावीर का जीवन
ईसा से 599 वर्ष पहले कुण्डलपुर में क्षत्रिय वंश में पिता सिद्दार्थ और माता त्रिशला के यहां चैत्र शुक्ल तेरस को वर्धमान का जन्म हुआ। वर्धमान को महावीर के अलावा ' वीर ' 'अतिवीर' और सन्मति भी कहा जाता है। भगवान महावीर के प्रारम्भिक तीस वर्ष राजसी वैभव एवं विलास के दलदल में  'कमल ' के समान रहे। उसके बाद बारह वर्ष घनघोर जंगल में मंगल साधना और आत्म जागृति की आराधना में वे इतने लीन हो गए कि उनके शरीर के कपड़े गिरकर अलग होते गए। भगवान  महावीर की बारह वर्ष की मौन तपस्या के बाद  उन्हें 'केवलज्ञान ' प्राप्त हुआ। केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद तीस वर्ष तक महावीर ने जनकल्याण हेतु चार तीर्थों साधु -साध्वी , श्रावक-श्राविका की रचना की। इन सर्वोदय तीर्थों में क्षेत्र, काल, समय या जाति की सीमाएं नहीं थीं।

महावीर ने कहा जीयो और जीने दो
भगवान महावीर का आत्म धर्म जगत की प्रत्येक आत्मा के लिए समान था। उनका कहना था कि हम दूसरों के प्रति भी वही व्यवहार व विचार रखें जो हमें स्वयं को पसंद हों।यही उनका ' जीयो और जीने दो ' का सिद्धांत है।उन्होंने न केवल इस जगत को मुक्ति का सन्देश दिया, अपितु मुक्ति की सरल और सच्ची राह भी बताई।आत्मिक और शाश्वत सुख की प्राप्ति हेतु सत्य , अहिंसा , अपरिग्रह , अचौर्य  और ब्रह्मचर्य जैसे पांच मूलभूत सिद्धांत भी बताए।इन्हीं सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारकर महावीर ' जिन ' कहलाए।जिन से ही 'जैन' बना है अर्थात जो काम,तृष्णा ,इन्द्रिय व भेद जयी है वही जैन है ।भगवान महावीर ने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया और जितेंद्र कहलाए ।उन्होंने शरीर को कष्ट देने को ही हिंसा नही माना बल्कि मन , वचन व कर्म से भी किसी को आहात करना उनकी दृष्टि से हिंसा ही है।
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ऐसे हुआ निर्वाण
बिहार स्थित पावापुर नगर में 72 वर्ष की आयु में अर्थात अंतिम चातुर्मास में वर्षाकाल के तीन माह हो चुके थे और चौथा महीना भी आधा बीतने वाला था। उनका सतत निर्जल उपवास व तप प्रारम्भ हो चुका था। उपदेश की अंतिम धारा चल रही थी व  चारों ओर दिव्य ध्वनि गूँज रही थी। इसी बीच कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्दशी की रात्रि के अंतिम प्रहर और अमावस्या के प्रभात के स्वाति नक्षत्र में एक दिव्य ज्योति परम ज्योति में विलीन हो गई। उनके मुक्ति के कारण से सभी भाव दीपक मंद हो गए , सारा वातावरण अंधकार में बदल गया। देवताओं ने भगवान महावीर की पूजा-अर्चना की और पावापुरी को द्रव्य दीपों से जगमग कर दिया और विश्व के अनेक राजाओं ने सत्य ज्ञान के प्रतीक के रूप में भौतिक दीप जलाकर अर्चना की। इसी उपलक्ष्य में देवताओं और राजाओं ने ज्ञान लक्ष्मी की पूजा की और दीपपर्व का प्रारंभ हो गया। उसी दिन भगवान के प्रमुख शिष्य गौतम गणधर को केवलज्ञान प्राप्त हुआ। जैन धर्म में 'निर्वाण' शब्द का अर्थ सभी कर्मों को नष्ट कर सदा के लिए जन्म -मरण से मुक्त होना अर्थात मोक्ष प्राप्त करना है।

जैन मंदिरों में चढ़ता है लड्डू
जैन धर्मानुयायी कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन प्रातःकाल की बेला में पवित्र वस्त्र धारण कर मंदिरों में जाते हैं। भगवान महावीर का सामूहिक पूजन कर व निर्वाण काण्ड पढ़ने के बाद निर्वाण लड्डू चढ़ाते हैं। भगवान को लड्डू अर्पित करने के पीछे यह भाव होता है कि जैसे लड्डू गोल होता है , जिसका न आरम्भ है न अंत है  उसी प्रकार हमारी आत्मा का भी न आरम्भ है न अंत। लड्डू बनाते समय बूंदी को कढ़ाई में तपना पड़ता है और तपने के बाद उन्हें चाशनी में डाला जाता है उसी प्रकार अखंड आत्मा को भी तप की आग में तपना पड़ता है तभी मोक्ष रूपी चाशनी की मधुरता मिलती है।उसी दिन यह आत्मा जगत को प्रिय  लगने लगती है। जैन धर्म में लक्ष्मी का अर्थ होता है निर्वाण और सरस्वती का अर्थ होता है केवल ज्ञान। इस दिन भगवान महावीर को मोक्ष लक्ष्मी की प्राप्ति हुई और गौतम गणधर को केवलज्ञान की सरस्वती की प्राप्ति हुई। इसलिए लक्ष्मी-सरस्वती का पूजन दीपावली के दिन किया जाता है।

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