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Hindi News ›   Spirituality ›   Religion ›   Maha Shivratri 2021 Triyuginarayan Temple Rudraprayag relegious significance

Maha Shivratri 2021: यहां पर हुआ था भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह, आज भी मौजूद हैं निशानियां

Thu, 11 Mar 2021 05:04 PM IST
रुस्तम राणा धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: रुस्तम राणा Updated Thu, 11 Mar 2021 05:04 PM IST
सार

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में ‘त्रियुगीनारायण’ एक पवित्र जगह है। मान्यता है कि त्रेता युग में पर्वतराज हिमालय की पुत्री गौरा का विवाह भगवान शिव से इसी स्थान पर हुआ था। 

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Maha Shivratri 2021 Triyuginarayan Temple Rudraprayag relegious significance
त्रियुगीनारायण मंदिर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

महाशिवरात्रि का पावन उत्सव देशभर में मनाया जा रहा है। हर साल महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनायी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह हुआ था। जहां पर महादेव और मां गौरा का विवाह हुआ था वह स्थल आज भी मौजूद है। यहां भगवान शिव और मां गौरा के विवाह की कई निशानियां हैं। आइए जानते हैं कहां भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह स्थल।

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त्रियुगीनारायण में हुआ था शिव-पार्वती विवाह
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में ‘त्रियुगीनारायण’ एक पवित्र जगह है। मान्यता है कि त्रेता युग में पर्वतराज हिमालय की पुत्री गौरा का विवाह भगवान शिव से इसी स्थान पर हुआ था। उनका विवाह भगवान ब्रह्मा और विष्णु जी ने संपन्न कराया था। भगवान विष्णु स्वयं मां पार्वती के भाई बने थे। जबकि ब्रह्मा जी इस विवाह यज्ञ के आचार्य थे। यहां त्रियुगीनारायण मंदिर है, जो हिन्दू धार्मिक आस्था का मुख्य केन्द्र है। त्रियुगीनारायण मंदिर परिसर में ऐसी कई चीजें हैं, जिनका संबंध शिव-पार्वती के विवाह से माना जाता है। जैसे-
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अखंड धूनी
त्रियुगीनारायण मंदिर में एक अखंड धूनी है। इसे सप्त फेरा वेदी भी कहते हैं। मान्यता है कि अखंड धूनी हवन कुंड है जिसकी अग्नि को साक्षी मानकर मां पार्वती और भगवान शिव ने सात फेरे लिए थे। आज भी अखंड ज्योति जल रही है। कहते हैं त्रेतायुग से यह आज तक जल रही है। इस कारण मंदिर को अखंड धूनी मंदिर भी कहा जाता है। भक्त इस पवित्र हवन कुंड की राख अपने घर लेकर जाते हैं। इस ज्योति में यहां पहुंचने वाला हर श्रद्धालु लकड़ी अर्पित करता है। 
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ब्रह्म कुंड
भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह ब्रह्मा जी ने करवाया था। ब्रह्मा जी ने विवाह में शामिल होने से पहले जिस कुंड में स्नान किया था, उसे ब्रह्मकुंड के नाम से जाना जाता है। यहां आने वाले भक्त इस कुंड में स्नान करके ब्रह्मा जी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। 

विष्णु कुंड
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव और मां पार्वती के विवाह में भगवान विष्णु जिस कुंड में स्नान करके विवाह संस्कार में शामिल हुए थे, उसे विष्णु कुंड कहा जाता है। 

रुद्र कुंड
मान्यता है कि शिव विवाह में भाग लेने आए सभी देवी-देवताओं ने जिस कुंड में स्नान किया उसे रुद्र कुंड कहा जाता है। इन सभी कुंडों में जल का स्त्रोत सरस्वती कुंड को माना जाता है।


स्तंभ
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब भोलेनाथ का विवाह हुआ तो उन्हें एक गाय दान स्वरूप मिली थी। माना जाता है कि यहीं वह स्तंभ है, जहां गाय को बांधा गया था। 

भाद्रपद की द्वादशी को लगता मेला
त्रियुगीनारायण मंदिर में भाद्रपद की द्वादशी को मेला लगता है। गांव के सभी परिवार रिंगाल की टोकरी में उगाई जौ की हरियाली को भगवान नारायण (वामन) को अर्पित करते हैं। 

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