दूर से आ रही आरती की मधुर ध्वनि को सुनकर अपने आप ही हृदय परमात्मा की भक्ति में डूब जाता है। हमारे नेत्र स्वयं ही श्रद्धा से झुक जाते हैं। ऐसा ही जादू है ईश्वर की आरती में। आरती को 'नीराजन' भी कहा गया है। नीराजन का अर्थ है 'विशेष रूप से प्रकाशित करना', अर्थात् देव पूजन से प्राप्त होने वाली सकारात्मक शक्ति हमारे मन को प्रकाशित कर व्यक्तित्व को उज्जवल कर दे।
आरती है तारती : जानें पूजा के बाद की जाने वाली ईश्वर की आरती का महत्व और नियम
आरती से पूर्ण होती है ईश्वर की पूजा
स्कन्द पुराण में भगवान की आरती के सम्बन्ध में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता हो, पूजन की विधि भी नहीं जानता हो, तो ऐसे पूजन कार्य में यदि श्रद्धा के साथ सिर्फ आरती ही कर ली जाए तो भी प्रभु उसकी पूजा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेते हैं।
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आरती करने का नियम
मान्यता है कि आरती करने से ही नहीं देखने से भी बहुत पुण्य लाभ मिलता है। पद्म पुराण के अनुसार कुमकुम, अगर, कपूर, घृत और चन्दन की पांच या सात बत्तियां बनाकर अथवा रुई और घी से बत्तियां बनाकर शंख, घंटा आदि बजाते हुए प्रभु की आरती करनी चाहिए। आरती दिन में एक से पांच बार की जा सकती है। घरों में आम तौर पर प्रात:कालीन और संध्याकालीन आरती ही की जाती है।
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आरती का धार्मिक महत्व
प्राचीन मान्यता के अनुसार आरती ऊंचे स्वर व एक ही लय ताल में गाई जाती है, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय, संगीतमय हो जाता है। यह माहौल हर स्थिति में मन को सुकून देने वाला होता है। अलग-अलग देवताओं की स्तुति के लिए अलग-अलग वाद्ययंत्रों को बजाकर गायन करने से देवी-देवता शीध्र प्रसन्न हो जाते हैं। धर्म शास्त्रों के अनुसार आरती करने वाले व्यक्ति पर ईश्वर की सदैव कृपा बनी रहती है।
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आरती के बाद जरूर करें ये काम
आरती के पश्चात दोनों हाथों से आरती ग्रहण करना चाहिए। ऐसा करने के पीछे माना गया है कि ईश्वर की शक्ति उस ज्योति में समा जाती है, जिसको भक्त अपने मस्तक पर ग्रहण करके धन्य हो जाते हैं। आरती वह माध्यम है, जिसके द्वारा दैवीय शक्ति को पूजन-स्थल तक पहुंचने का मार्ग मिल जाता है।
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