गया और गंगा में श्राद्घ का आखिर क्यों है इतना महत्व?
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श्राद्घ पक्ष शुरु होते है गया और गंगा तट पर लोग जुटने लगते हैं। इन दिनों इन दोनों स्थानों पर मेले जैसे नजारा रहता है। इसका कारण यह है कि श्राद्घ पक्ष में गंगा और गया तट पर श्राद्घ करना बड़ा ही पुण्यदायी माना गया है।
शास्त्रों और पुराणों का ऐसा मनना है कि इन दोनों स्थानों पर श्राद्घ करने से पितर बहुत प्रसन्न होते हैं और श्रद्घापूर्वक दिया गया अन्न जल प्रेम पूर्वक स्वीकार करते हैं।
गया के विषय में यह भी कहा गया है कि भगवान राम भी लक्ष्मण और सीता के साथ आकर यहां पर अपने पिता दशरथ जी का श्राद्घ किया था जिससे दशरथ जी आत्मा को मुक्ति मिल गयी थी।
गंगा में पिंडदान और श्राद्घ का है महत्व
माना जाता है कि गंगा में अस्थियां विसर्जित करने से एवं गंगा किनारे प्राण त्याग करने से यमलोक में प्राप्त होने वाले कष्टों से मुक्ति मिलती है और स्वर्ग में स्थान मिलता है। इस मान्यता का कारण यह है कि शास्त्रों में गंगा को स्वर्ग की नदी कहा गया है। गंगा को त्रिपथगा भी कहते हैं क्योंकि गंगा एक मात्र नदी है जो तीनों लोको यानी स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में भी बहती है।
कपिल मुनि के शाप के कारण भष्म हुए राजा सगर के पुत्रों को मुक्ति दिलाने के लिए राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या की थी। इससे गंगा को पृथ्वी पर आना पड़ा था। गंगा के स्पर्श मात्र से सगर के पुत्र पाप और शाप मुक्त होकर स्वर्ग चले गए। महाभारत में भी गंगा को मुक्ति दायिनी बताया गया है।
राजा वशिष्ठ के शाप से मुक्ति पाने के लिए सातों वसुओं ने गंगा से प्रार्थना की। गंगा ने राजा शांतनु से विवाह करके सातों वसुओं को जन्म दिया और अपनी जल धार में बहा दिया जिससे उन्हें मुक्ति मिल गई। इसलिए व्यक्ति यही चाहता है कि गंगा का स्पर्श प्राप्त करके उसे भी मुक्ति मिल जाए। इसलिए गंगा के किनारे श्राद्घ, तर्पण एवं अंतिम संस्कार के लोग श्रद्घालु जुटते हैं।
गया का महत्व इस घटना से सिद्घ होता है
सभी तीर्थों में गया को पितरों की मुक्ति के लिए उत्तम स्थान कहा गया है। वाल्मीकि रामायण में कथा है कि पिण्डदान हेतु राम और लक्ष्मण सामग्री लाने बाजार गये। राम और लक्ष्मण को बाजार से लौटने में देर हो गयी।
पिण्डदान का समय आने पर दशरथ जी की आत्मा सीता जी के सामने उपस्थित हो गयी और पिण्ड मांगने लगी। सीता जी सोच में पड़ गयी कि क्या किया जाए। कुछ पल सोच विचार कर सीता जी ने रेत का पिण्ड बनाया और गाय, फल्गु नदी, केतकी के फूल, वट वृक्ष, कौआ को गवाह बनाकर दशरथ जी को रेत का पिण्ड दान दे दिया।
राम जब लौटे तब सीता ने बताया कि उन्होंने दशरथ जी को पिण्ड दान दे दिया है। राम ने सीता से पूछा कि बिना सामग्री के पिण्ड दान कैसे किया, इसका कोई गवाह है तो बताओ।
सीता जी ने गाय, केतकी के फूल, वट वृक्ष, कौआ को गवाही देने के लिए कहा तो वट वृक्ष को छोड़कर सभी ने गवाही देने से मना कर दिया। इसके बाद सीता जी ने दशरथ जी का ध्यान किया। दशरथ जी आत्मा पुनः प्रकट हुई और बताया कि सीता जी ने उन्हें रेत का पिण्ड दान किया है। इस तरह दशरथ जी को मुक्ति मिल गयी।
गया धाम बिहार की राजधानी पटना से लगभग 100 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। मान्यता है कि यहां पर पिण्डदान करने से सात पीढ़ियों के पितरों को मुक्ति मिल जाती है।