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Holashtak 2022 : होलाष्टक 10 से 17 मार्च तक, जानिए क्यों नहीं करते इसमें शुभ कार्य ?
Thu, 03 Mar 2022 11:54 AM IST
विनोद शुक्ला
मदन गुप्ता सपाटू, ज्योतिषविद्, चंडीगढ़
मदन गुप्ता सपाटू, ज्योतिषविद्, चंडीगढ़
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Thu, 03 Mar 2022 11:54 AM IST
सार
Holashtak 2022 Start And End Date: फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर होलिका दहन तक की अवधि को शास्त्रों में होलाष्टक कहा गया है। होलाष्टक शब्द दो शब्दों का संगम है। होली तथा आठ अर्थात 8 दिनों का पर्व। यह अवधि इस साल 10 मार्च से 17 मार्च तक अर्थात होलिका दहन तक है।
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Holashtak 2022: फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर होलिका दहन तक की अवधि को शास्त्रों में होलाष्टक कहा गया है।
- फोटो : amar ujala
विस्तार
Holashtak 2022 Start And End Date: फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर होलिका दहन तक की अवधि को शास्त्रों में होलाष्टक कहा गया है। होलाष्टक शब्द दो शब्दों का संगम है। होली तथा आठ अर्थात 8 दिनों का पर्व। यह अवधि इस साल 10 मार्च से 17 मार्च तक अर्थात होलिका दहन तक है। इन दिनों गृह प्रवेश,मुंडन संस्कार,विवाह संबंधी वार्तालाप,सगाई, विवाह,किसी नए कार्य,नींव आदि रखने,नया वाहन लेने,आभूषण खरीदने,नया व्यवसाय आरंभ या किसी भी मांगलिक कार्य आदि का आरंभ शुभ नहीं माना जाता। इस मध्य 16 संस्कार भी नहीं किए जाते। नवविवाहता को पहली होली मायके की बजाय ससुराल में मनानी चाहिए।
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इसके पीछे ज्योतिषीय एवं पौराणिक दोनों ही कारण माने जाते हैं। एक मान्यता के अनुसार कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग कर दी थी। इससे रुष्ट होकर उन्होंने प्रेम के देवता को फाल्गुन की अष्टमी तिथि के दिन ही भस्म कर दिया था। कामदेव की पत्नी रति ने शिव की आराधना की और कामदेव को पुनर्जीवित करने की याचना की जो उन्होंने स्वीकार कर ली। महादेव के इस निर्णय के बाद जन साधारण ने हर्षोल्लास मनाया और होलाष्टक का अंत दुलंहडी को हो गया। इसी परंपरा के कारण यह 8 दिन शुभ कार्यों के लिए वर्जित माने गए।
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ज्योतिषीय कारण
परंतु ज्योतिषीय कारण अधिक वैज्ञानिक तर्क सम्मत तथा ग्राह्य है। ज्योतिष के अनुसार,अष्टमी को चंद्रमा,नवमी को सूर्य,दशमी को शनि,एकादशी को शुक्र,द्वादशी को गुरु,त्रयोदशी को बुध,चतुर्दशी को मंगल तथा पूर्णिमा को राहु उग्र स्वभाव के हो जाते हैं। इन ग्रहों के निर्बल होने से मानव मस्तिष्क की निर्णय क्षमता क्षीण हो जाती है और इस दौरान गलत फैसले लिए जाने के कारण हानि होने की संभावना रहती है। विज्ञान के अनुसार भी पूर्णिमा के दिन ज्वार भाटा,सुनामी जैसी आपदा आती रहती हैं या पागल व्यक्ति और उग्र हो जाता है। ऐसे में सही निर्णय नहीं हो पाता। जिनकी कुंडली में नीच राशि के चंद्रमा,बृश्चिक राशि के जातक या चंद्र छठे या आठवें भाव में हैं उन्हें इन दिनों अधिक सतर्क रहना चाहिए। मानव मस्तिष्क पूर्णिमा से 8 दिन पहले कहीं न कहीं क्षीण,दुखद,अवसाद पूर्ण,आशंकित,निर्बल हो जाता है। ये अष्ट ग्रह,दैनिक कार्यकलापो पर विपरीत प्रभाव डालते हैं।
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इस अवसाद को दूर रखने का उपाय भी ज्योतिष में बताया गया है। इन 8 दिनों में मन में उल्लास लाने और वातावरण को जीवंत बनाने के लिए लाल या गुलाबी रंग का प्रयोग विभिन्न तरीकों से किया जाता है। लाल परिधान मूड को गर्मा देते हैं यानी लाल रंग मन में उत्साह उत्पन्न करता है। इसीलिए उत्तर प्रदेश में आज भी होली का पर्व एक दिन नहीं अपितु 8 दिन मनाया जाता है। भगवान कृष्ण भी इन 8 दिनों में गोपियों संग होली खेलते रहे और अंततः होली में रंगे लाल वस्त्रों को अग्नि को समर्पित कर दिया। सो होली मनोभावों की अभिव्यक्ति का पर्व है जिसमें वैज्ञानिक महत्ता है। ज्योतिषीय गणना है,उल्लास है,पौराणिक इतिहास है,भारत की सुंदर संस्कृति है जब सब अपने भेद भाव मिटा कर एक हो जाते हैं।