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Ganesh Chaturthi 2025: कैसे बने माता पार्वती के लाड़ले गणेश गजमुख देव, जानिए पौराणिक कथा
Sat, 23 Aug 2025 04:51 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Sat, 23 Aug 2025 04:51 PM IST
सार
गणेश जी का वाहन मूषक है और उनका सर्वप्रिय भोग मोदक माना जाता है। माता पार्वती और भगवान शिव इनके माता-पिता हैं। भाई कार्तिकेय और बहन अशोकसुंदरी हैं।
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Ganesh Chaturthi
- फोटो : Adobe stock
विस्तार
भारतीय संस्कृति में भगवान गणेश का स्थान अत्यंत श्रेष्ठ और सर्वोपरि माना गया है। प्रत्येक शुभ कार्य की शुरुआत गणेशजी की पूजा-अर्चना से होती है। वे विघ्नहर्ता, बुद्धि, ज्ञान और समृद्धि के अधिष्ठाता देव हैं। धर्मग्रंथों में उनका स्वरूप, गुण और महत्व विस्तार से वर्णित है।
गणेश जी का स्वरूप और परिवार
गणेश जी का वाहन मूषक है और उनका सर्वप्रिय भोग मोदक माना जाता है। माता पार्वती और भगवान शिव इनके माता-पिता हैं। भाई कार्तिकेय और बहन अशोकसुंदरी हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उनकी दो पत्नियां- रिद्धि और सिद्धि हैं, जिनसे इन्हें शुभ और सफलता का वरदान प्राप्त है।
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गणेशजी के बारह नाम
गणेश जी के अनेक नाम हैं, जिनमें बारह नाम विशेष रूप से प्रमुख माने जाते हैं- समुख, एकदंत, कपिल, गजकर्णक, लंबोदर, विकट, विघ्ननाशक, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र और गजानन। विद्यारंभ, विवाह अथवा किसी भी शुभ कार्य के अवसर पर इन नामों से गणपति का स्मरण करना विशेष फलदायी माना गया है।
गणेश चतुर्थी की पौराणिक कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणेश चतुर्थी के पर्व से जुड़ी कथा अत्यंत प्रसिद्ध है। एक बार माता पार्वती ने स्नान के लिए जाने से पहले अपने शरीर के उबटन से एक सुंदर बालक की रचना की और उसे द्वार पर पहरा देने का आदेश दिया। यह बालक गणेश कहलाया। पार्वती जी ने गणेश को निर्देश दिया कि जब तक वह स्नान पूर्ण न कर लें, किसी को भी भीतर प्रवेश न करने दें। इसी बीच भगवान शिव वहां आए। गणेश जी ने उन्हें रोका और कहा कि मेरी माता भीतर हैं, आप प्रवेश नहीं कर सकते। शिवजी ने बहुत समझाया कि पार्वती उनकी पत्नी हैं, पर गणेश जी अडिग रहे। अंततः क्रोधित होकर शिवजी ने त्रिशूल से गणेश का सिर काट दिया और भीतर चले गए। जब पार्वती ने यह देखा तो वे रौद्र रूप में प्रकट हुईं और अपने पुत्र को पुनर्जीवित करने की जिद पर अडिग रहीं।
स्थिति गंभीर देखकर सभी देवताओं ने हस्तक्षेप किया। भगवान शिव ने विष्णु जी को आदेश दिया कि किसी ऐसे शिशु का सिर लाया जाए जिसकी माता अपने बच्चे की ओर पीठ किए सो रही हो। गरुड़ की खोज में केवल एक हथिनी ऐसी मिली। उसका शिशु ही इस शर्त पर खरा उतरा। गरुड़ ने हाथी का सिर लाकर शिव जी को सौंप दिया। शिवजी ने उस सिर को गणेश जी के धड़ पर स्थापित किया और उन्हें पुनर्जीवन प्रदान किया। उसी समय यह वरदान भी दिया कि गणेश जी की पूजा सर्वप्रथम होगी। तभी से किसी भी धार्मिक अनुष्ठान, पूजन अथवा शुभ कार्य में विघ्नहर्ता गणपति का आह्वान सबसे पहले किया जाता है। यही कारण है कि गणेश चतुर्थी का पर्व केवल एक उत्सव ही नहीं, बल्कि उनके अद्वितीय महत्व और उपासना की परंपरा का जीवंत प्रतीक है।
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गणेश जी का स्वरूप और परिवार
गणेश जी का वाहन मूषक है और उनका सर्वप्रिय भोग मोदक माना जाता है। माता पार्वती और भगवान शिव इनके माता-पिता हैं। भाई कार्तिकेय और बहन अशोकसुंदरी हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उनकी दो पत्नियां- रिद्धि और सिद्धि हैं, जिनसे इन्हें शुभ और सफलता का वरदान प्राप्त है।
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Ganesh Chaturthi 2025: गणेश चतुर्थी पर पूजा के लिए मिलेगा इतना समय, यहां जानें शुभ मुहूर्त और पूजन विधि
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गणेश जी के अनेक नाम हैं, जिनमें बारह नाम विशेष रूप से प्रमुख माने जाते हैं- समुख, एकदंत, कपिल, गजकर्णक, लंबोदर, विकट, विघ्ननाशक, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र और गजानन। विद्यारंभ, विवाह अथवा किसी भी शुभ कार्य के अवसर पर इन नामों से गणपति का स्मरण करना विशेष फलदायी माना गया है।
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गणेश चतुर्थी की पौराणिक कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणेश चतुर्थी के पर्व से जुड़ी कथा अत्यंत प्रसिद्ध है। एक बार माता पार्वती ने स्नान के लिए जाने से पहले अपने शरीर के उबटन से एक सुंदर बालक की रचना की और उसे द्वार पर पहरा देने का आदेश दिया। यह बालक गणेश कहलाया। पार्वती जी ने गणेश को निर्देश दिया कि जब तक वह स्नान पूर्ण न कर लें, किसी को भी भीतर प्रवेश न करने दें। इसी बीच भगवान शिव वहां आए। गणेश जी ने उन्हें रोका और कहा कि मेरी माता भीतर हैं, आप प्रवेश नहीं कर सकते। शिवजी ने बहुत समझाया कि पार्वती उनकी पत्नी हैं, पर गणेश जी अडिग रहे। अंततः क्रोधित होकर शिवजी ने त्रिशूल से गणेश का सिर काट दिया और भीतर चले गए। जब पार्वती ने यह देखा तो वे रौद्र रूप में प्रकट हुईं और अपने पुत्र को पुनर्जीवित करने की जिद पर अडिग रहीं।
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गजमुख गणेश का पुनर्जन्म और प्रथम पूज्य का वरदानस्थिति गंभीर देखकर सभी देवताओं ने हस्तक्षेप किया। भगवान शिव ने विष्णु जी को आदेश दिया कि किसी ऐसे शिशु का सिर लाया जाए जिसकी माता अपने बच्चे की ओर पीठ किए सो रही हो। गरुड़ की खोज में केवल एक हथिनी ऐसी मिली। उसका शिशु ही इस शर्त पर खरा उतरा। गरुड़ ने हाथी का सिर लाकर शिव जी को सौंप दिया। शिवजी ने उस सिर को गणेश जी के धड़ पर स्थापित किया और उन्हें पुनर्जीवन प्रदान किया। उसी समय यह वरदान भी दिया कि गणेश जी की पूजा सर्वप्रथम होगी। तभी से किसी भी धार्मिक अनुष्ठान, पूजन अथवा शुभ कार्य में विघ्नहर्ता गणपति का आह्वान सबसे पहले किया जाता है। यही कारण है कि गणेश चतुर्थी का पर्व केवल एक उत्सव ही नहीं, बल्कि उनके अद्वितीय महत्व और उपासना की परंपरा का जीवंत प्रतीक है।