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Hanuman Jayanti 2019 : बजरंगी का वह पावन धाम जहां भगवान से पहले भक्त को करते हैं नमन
Tue, 16 Apr 2019 11:58 AM IST
Madhukar Mishra
अनीता जैन, वास्तुविद्
अनीता जैन, वास्तुविद्
Published by: Madhukar Mishra
Updated Tue, 16 Apr 2019 11:58 AM IST
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सालासर बालाजी
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सनातन संस्कृति में मानव जीवन का लक्ष्य भौतिक सुख तथा आध्यात्मिक आंनद की प्राप्ति के लिए अनेकों-अनेक देवी देवताओं की पूजा-अर्चना का विधान है, जिसमें पंचदेव प्रमुख है। पंच देवों का तेज पुंज श्री हनुमान जी है। अतुलनीय बलशाली होने के फलस्वरूप इन्हें बालाजी की संज्ञा दी गई है। मन में श्रृद्धा, जुबां पर जयकारे, लहराती लाल ध्वजा और गूंजती जय हनुमान ज्ञान गुण सागर ..की चौपाईयां। ऐसा ही भव्य, आलौलिक, आध्यात्मिक नजारा देखने को मिलता है सालासर बालाजी के मंदिर में।
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दाढ़ी मूछ वाले हनुमान जी
यह मन्दिर वीर भूमि राजस्थान के चुरू जिले के सालासर में स्थित जन-जन की आस्था और विश्वास को समेटे सभी हनुमान भक्तों का परम पावन धाम है। बालाजी मन्दिर राजस्थानी शैली में निर्मित एक भव्य एवं विशाल मन्दिर है। श्री बालाजी की भव्य प्रतिमा सोने के सिंहासन पर विराजमान है। इसके ऊपरी भाग में श्रीराम दरबार है तथा निचले भाग में श्रीराम के चरणों में दाढ़ी-मूंछ से सुशोभित हनुमानजी श्री बालाजी के रूप में विराजमान है।
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शालिग्राम पत्थर की है प्रतिमा
श्री बालाजी का ऐसा वयस्क रूप यहाँ के अलावा और कही देखने को नहीं मिलता है, इसी कारण भक्त इन्हें बड़े हनुमान जी कहकर भी पुकारते हैं। बालाजी की प्रतिमा शालिग्राम पत्थर की है, जिसे सिंदूरी रंग और सोने से सजाया गया है।
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प्रतिदिन होता है भव्य श्रृंगार
दिन में कई बार इनकी पोशाक बदलकर इनका भव्य श्रृंगार किया जाता है। कभी गुलाब तो कभी मोगरा के फूलों से इनकी झांकी सजाई जाती है। बालाजी का यह रूप अद्भुत, आकर्षक एवं प्रभावशाली लगता है। प्रतिमा के चारों तरफ सोने से सजावट की गई है और सोने का रत्न जड़ित भव्य मुकुट बालाजी के सिर की शोभा बढ़ाता है।
जल रहा है अखंड दीप
प्रतिष्ठा के समय से ही मन्दिर के अन्दर अखण्ड दीप प्रज्वलित है। मन्दिर में निरन्तर रूप से बालाजी महाराज की कथा-पाठ, जप तथा कीर्तन चलता रहता है। दर्शन करने वाले भक्त भी सुन्दरकाण्ड पाठ एवं हनुमान चालीसा कर बालाजी को मानाने में लगे रहते हैं।
साल में दो बार लगता है भव्य मेला
प्रत्येक वर्ष चैत्र पूर्णिमा तथा आश्विन पूर्णिमा के पावन पर्व पर यहां बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को भक्तों की भारी भीड़ रहती है। मान्यता है कि पूर्णिमा के पावन दिन यहां आने वाले सभी भक्तों की मुरादें पूरी होती है, भक्त यहां स्थित एक अति प्राचीन वृक्ष पर नारियल बांध कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की अभिलाषा करते है।
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सालासर हनुमान जी कथा
इस मन्दिर के संदर्भ में एक कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार राजस्थान के एक गांव असोता में अचानक एक दिन खेती करते हुए एक किसान का हल किसी वस्तु से टकराकर वहीं पर रूक गया, जब किसान ने देखा तो उसे वहां एक शिला दिखाई दी और जब उसने उस स्थान पर खुदाई आरंभ की तो वहां से मिट्टी से सनी हनुमान जी की मूर्ति प्राप्त हुई। उस दिन शनिवार का समय था तथा श्रावण शुक्ल की नवमी थी। किसान ने इस घटना के बारे में लोगों को बताया। कहते हैं कि जब वहां के जमींदार को भी उसी दिन एक सपना आया कि भगवान हनुमान जी उसे आदेश देते हैं कि उन्हें सालासर में स्थापित किया जाए तो उसी रात सालासर के एक निवासी मोहनदास को भी भगवान हनुमान जी ने सपने में दर्शन देकर आदेश दिया कि मुझे असोता से सालासर में ले जाकर स्थापित किया जाए।
भगवान से पहले होते हैं भक्त के दर्शन
अगले दिन भक्त मोहन दास जमींदार के पास जाकर अपने सपने के बारे में उन्हें बताते हैं तो जमींदार भी उसे उसी सपने के आदेश के बारे में बताते है। इस पर दोनों ही आश्चर्य चकित रह जाते हैं तथा भगवान के आदेश अनुसार मूर्ति को सालासर में स्थापित कर दिया जाता है। इस मन्दिर में बालाजी के परम भक्त मोहनदास जी की समाधि स्थित है। इस मंदिर की यही मान्यता है कि भक्त इनके दर्शन करने के पश्चात् ही बालाजी के दर्शन करते है। मोहनदास जी द्वारा प्रज्वलित अग्नि कुंड धूनी आज भी मौजूद है। मान्यता है कि इस अग्नि कुंड की विभूति समस्त दु:खों एवं कष्टों को दूर कर देती है।