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नवरात्रि चौथा दिन: ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने वाली देवी कूष्माण्डा

Wed, 02 Oct 2019 12:23 AM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन
अनीता जैन Published by: विनोद शुक्ला Updated Wed, 02 Oct 2019 12:23 AM IST
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navratri 2019 story of mata Kushmanda and puja vidhi
navratri 2019

नवरात्रि में मां शेरावाली की उपासना के चौथे दिन की पूजा का अत्याधिक महत्त्व है। मां दुर्गा जी के चौथे स्वरुप का नाम कूष्माण्डा है। नवरात्रि उपासना में चौथे दिन इन्ही के विग्रह का पूजन-आराधना की जाती है। इस दिन साधक  का मन 'अनाहत' चक्र में स्थित होता है। अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरुप को ध्यान में रखकर पूजा-उपासना के कार्य में लग्न रहना चाहिए।

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अपनी मंद, हल्की हंसी द्वारा अण्ड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार परिव्याप्त था, तब इन्हीं देवी ने अपने 'ईषत' हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी। अतः यही सृष्टि की आदि-स्वरूपा,आदि शक्ति हैं।
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इनके पूर्व ब्रह्माण्ड का अस्तित्व नहीं था। इनका निवास सूर्य मंडल के भीतर के लोक में स्थित है। सूर्य लोक में निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही है, इनके तेज़ की तुलना इन्हीं से की जा सकती है।अन्य कोई भी देवी-देवता इनके तेज़ और प्रभाव की समता नहीं कर सकते।इन्हीं के तेज़ और प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित हो रहीं हैं।ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में स्थित तेज़ इन्हीं की छाया है।इनकी आठ भुजाएं हैं,अतः ये अष्टभुजादेवी के नाम से भी जानी जाती हैं।इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डलु,धनुष,बाण,कमलपुष्प,अमृतपूर्ण कलश ,चक्र तथा गदा हैं।आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है एवं इनका वाहन सिंह है।
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पूजा फल
देवी कूष्माण्डा अपने भक्तों को रोग, शोक और विनाश से मुक्त करके आयु, यश, बल और बुद्धि प्रदान करती हैं। मां कुष्मांडा अत्यंत अल्प सेवा और भक्ति से भी प्रसन्न होने वाली हैं। यदि मनुष्य सच्चे ह्रदय से इनका शरणागत बन जाए तो फिर उसे अत्यंत सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है।अपनी लौकिक-परलौकिक उन्नति चाहने वालों को इनकी उपासना में सदैव तत्पर रहना चाहिए। यदि प्रयासों के बावजूद भी मनोनुकूल परिणाम नहीं मिलता हो तो कूष्माण्डा स्वरुप की पूजा से मनोवांछित फल प्राप्त होने लगते हैं।


ऐसे करें पूजा
नवरात्रि में चौथे दिन कलश की पूजा कर माता कूष्मांडा को प्रणाम करें। देवी को पूरी श्रद्धा से फल, फूल, धूप, गंध, भोग चढ़ाएं। पूजन के पश्चात मां कुष्मांडा के दिव्य रूप को मालपुए का भोग लगाकर किसी भी दुर्गा मंदिर में ब्राह्मणों को इसका प्रसाद देना चाहिए। पूजा के बाद अपने से बड़ों को प्रणाम कर प्रसाद वितरित करें और खुद भी प्रसाद ग्रहण करें। इससे माता की कृपा स्वरूप उनके भक्तों को ज्ञान की प्राप्ति होती है। बुद्धि और कौशल का विकास होता है।

देवी का मंत्र- 
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। 
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥

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