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विश्व किडनी दिवस: विशेषज्ञ बोले- अंतिम चरण के गुर्दा रोग में प्रत्यारोपण बेहतर विकल्प

Thu, 13 Mar 2025 11:06 AM IST
Krishan Singh अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर/शिमला
अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर/शिमला Published by: Krishan Singh Updated Thu, 13 Mar 2025 11:06 AM IST
सार

 विश्व किडनी दिवस के अवसर पर विशेषज्ञों ने बताया कि अंतिम चरण के गुर्दा रोग से जूझ रहे मरीजों के लिए प्रत्यारोपण डायलिसिस से बेहतर विकल्प है।

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World Kidney Day: Experts said- Transplantation is a better option in end stage kidney disease
एम्स बिलासपुर के नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) संजय विक्रांत । - फोटो : संवाद

विस्तार

किडनी रोग से पीड़ित लाखों मरीजों के लिए किडनी प्रत्यारोपण सबसे प्रभावी और स्थायी उपचार साबित हो सकता है। विश्व किडनी दिवस के अवसर पर विशेषज्ञों ने बताया कि अंतिम चरण के गुर्दा रोग से जूझ रहे मरीजों के लिए प्रत्यारोपण डायलिसिस से बेहतर विकल्प है। यह न केवल जीवन औसत को बढ़ाता है बल्कि मरीज की जीवनशैली को भी सामान्य बनाए रखने में मदद करता है। एम्स बिलासपुर के नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) संजय विक्रांत ने बताया कि भारत में हर साल करीब दो लाख लोग किडनी प्रत्यारोपण का इंतजार करते हैं, लेकिन मात्र 12,000 मरीजों को ही यह सुविधा मिल पाती है। इसका मुख्य कारण अंग दान की कमी है। हालांकि, सरकार और विभिन्न संस्थाएं मृतक अंग दान को प्रोत्साहित करने के लिए लगातार जागरुकता अभियान चला रही हैं।

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अंतिम चरण की गुर्दा विफलता एक गंभीर स्थिति है, जिसमें गुर्दे पूरी तरह से काम करना बंद कर देते हैं। ऐसे में मुख्य रूप से दो प्रकार के उपचार उपलब्ध हैं। इसमें डायलिसिस प्रक्रिया से शरीर से अपशिष्ट पदार्थों और अतिरिक्त तरल पदार्थों को हटाया जाता है। डायलिसिस की पहली प्रक्रिया हेमोडायलिसिस है। यह सबसे आम प्रक्रिया है, जिसमें मशीन के माध्यम से रक्त शुद्ध किया जाता है। इसे सप्ताह में तीन बार अस्पताल में करवाना पड़ता है। वहीं दूसरी प्रक्रिया पेरीटोनियल डायलिसिस है। इसमें मरीज घर पर ही पेट में एक विशेष तरल डालकर रक्त शुद्ध कर सकता है। यह प्रक्रिया अधिक सुविधाजनक हो सकती है, लेकिन इसमें संक्रमण का जोखिम अधिक होता है। डायलिसिस जीवन बचाने में मदद करता है, लेकिन यह लंबे समय तक प्रभावी समाधान नहीं है।

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वहीं दूसरे प्रकार के उपचार में गुर्दा प्रत्यारोपण किया जाता है, जोकि सबसे बेहतर विकल्प है। गुर्दा प्रत्यारोपण में स्वस्थ व्यक्ति का गुर्दा मरीज को लगाया जाता है। यह जीवित दाता (परिवार के सदस्य या दोस्त) या मृतक दाता (अंग दान करने वाला) से प्राप्त किया जा सकता है। गुर्दा प्रत्यारोपण के बाद डायलिसिस की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। मरीज की ऊर्जा और जीवन की गुणवत्ता में सुधार होता है। लंबी अवधि में मृत्यु का जोखिम कम होता है। लेकिन इसके साथ ही इसकी कुछ चुनौतियां भी हैं। इनमें मरीजों को प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त दाता मिलना कठिन होता है। मरीज को जीवन भर इम्यूनो सप्रेसेंट दवाइयां लेनी पड़ती हैं। सर्जरी से जुड़ी जटिलताएं और संभावित जोखिम रहते हैं।

अंग दान की जरूरत और जागरूकता
डॉ. संजय विक्रांत ने कहा कि भारत में 80 फीसदी से अधिक गुर्दा प्रत्यारोपण जीवित दाताओं से होते हैं, जबकि मृतक दान बहुत कम होता है। इसके चलते हजारों मरीजों को समय पर गुर्दा नहीं मिल पाता और उनकी जान चली जाती है। यदि अधिक लोग मृत्यु उपरांत अंग दान के लिए आगे आएं, तो यह अंतर कम किया जा सकता है। उन्होंने अपील की कि इस विश्व गुर्दा दिवस पर संकल्प लें कि हम अंगदान के प्रति जागरूकता फैलाएंगे और अधिक से अधिक लोगों को इस नेक कार्य के लिए प्रेरित करेंगे।

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सरकार और समाज की भूमिका
भारत सरकार राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन के माध्यम से अंग दान को बढ़ावा देने के लिए अभियान चला रही है। इसके तहत मृतक अंग दान को प्रोत्साहित करने, अस्पतालों में प्रत्यारोपण सुविधाओं का विस्तार करने और लोगों को जागरूक करने की दिशा में कई कदम उठाए जा रहे हैं।

शुगर, उच्च रक्तचाप किडनी के लिए खतरा
हिमाचल प्रदेश में किडनी रोग के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। खासकर डायबिटीज और उच्च रक्तचाप के कारण इनकी संख्या में बढ़ोतरी हुई है। हिमाचल में डायबिटीज की प्रचलन दर 11.5 फीसदी है। जोकि राष्ट्रीय औसत 10 फीसदी से अधिक है। पुरुषों में यह दर 11.6 फीसदी और महिलाओं में 11.4 फीसदी पाई गई है। आईसीएमआर-इंडिया डायबिटीज अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। शोध में यह भी सामने आया है कि राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में 35.89 फीसदी लोग उच्च रक्तचाप से प्रभावित हैं। वहीं 21.98 फीसदी लोग ही इसकी जानकारी रखते हैं।  विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य में बढ़ते डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के मामलों के मद्देनजर, किडनी रोग के बढ़ते संकट को नियंत्रित करने के लिए विशेष कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। आईजीएमसी के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के सहायक प्रो. डॉ. अमित सचदेवा ने बताया कि किडनी रोग के प्रमुख जोखिम कारकों में डायविटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा और पर्यावरणीय कारक भी शामिल हैं।

भारत में 17 फीसदी जनसंख्या किडनी रोग से प्रभावित
उन्होंने बताया कि किडनी रोग से जागरुकता से ही बचा जा सकता है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी 2017 के अनुसार भारत में किडनी रोग मृत्यु का आठवां प्रमुख कारण बन चुका है। यह 19.2 प्रति एक लाख आबादी है। 
भारत में किडनी रोग का बोझ लगातार बढ़ रहा है। शोध बताते हैं कि भारत में लगभग 17 फीसदी जनसंख्या किसी न किसी रूप में किडनी रोग से प्रभावित है। भारतीय सीकेडी रजिस्टर के अनुसार 31 फीसदी मामलों में डायबिटी नेफ्रोपैथी प्रमुख कारण है। आईजीएमसी के मेडिसिन विभाग के सहायक प्रो. डॉ. उष्पेंद्र शर्मा ने बताया कि मरीज नियमित स्वास्थ्य जांच कराएं। खासकर अगर परिवार में किडनी रोग का इतिहास हो। इसके अलावा रक्तचाप और शुगर को नियंत्रित रखें। संतुलित आहार खाएं, जिसमें कि कम नमक हो। इसके अलावा नियमित व्यायाम करें और धूम्रपान और शराब के सेवन से बचें।
 

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