नहीं रहे कैंसर का इलाज करने वाले विश्व विख्यात डॉक्टर यशी ढोंडेन, मैक्लोडगंज में ली अंतिम सांस
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डा. येशी की मृत्यु की खबर सुनते ही सुबह उनके निवास स्थान के बाहर सैकड़ों तिब्बती और स्थानीय लोग जमा हो गए। डॉ. ढोंडेन के पारिवारिक सदस्य लोबसांग त्सेरिंग ने बताया कि शुक्रवार सुबह उनका संस्कार मैक्लोडगंज में किया जाएगा। दो दिन तक उनकी देह की तिब्बतियन पद्धति के अनुसार पूजा होगी। डॉ. येशी कैंसर के अलावा ट्यूमर, एड्स, सुराइसिस, हेपेटाइटिस ल्यूकेमिया आदि गंभीर रोगों का भी इलाज करते थे।
तिब्बती चिकित्सा पद्धति में बेहतरीन कार्य के लिए उन्हें 20 मार्च, 2018 को पद्मश्री अवार्ड से राष्ट्रपति ने सम्मानित किया था। निर्वासित तिब्बत सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. लोबसंग सांग्ये ने डॉ. येशी ढोंडेन के निधन को अपूर्णीय क्षति बताया। तिब्बती चिकित्सा एवं ज्योतिष संस्थान ‘मेन ट्सी खंग’ धर्मशाला के महासचिव त्सेरिंग फुंत्सोक ने बताया कि तिब्बती चिकित्सा पद्धति को दुनिया भर में प्रचारित करने वाले बहुत बड़ा नाम चला गया।
डा. येशी के शिष्य रहे डॉक्टर केलसंग ढोंडेन, डॉक्टर नामग्याल कुसर, डॉक्टर पसांग ग्याल्मो खंगकर ने कहा कि गुरुजी ने अपना पूरा जीवन समाजसेवा में लगा दिया।
मेरे लिए भगवान बनकर आए थे डॉ. येशी : कैंसर पीड़ित
डॉ. येशी की दवा खाकर कैंसर रोग को मात देने वाले लखनऊ निवासी रवि शुक्ला ने बताया कि मेरे लिए वह भगवान बनकर आए थे। जब मेरा कैंसर रोग ठीक हुआ तो मैने दोबारा टेस्ट करवाए। टेस्ट देखकर भारतीय डॉक्टर हैरान थे।
कैंसर के इलाज के लिए हैं प्रख्यात
डॉ. येशी ने दलाईलामा के निजी चिकित्सक के रूप में काम करने के बाद मैक्लोडगंज में अपना क्लीनिक खोला। उनके पास दुनिया भर से कैंसर रोगी इलाज को आते हैं। वह रोगी के पेशाब और नब्ज का अध्ययन कर दवाई देते हैं।
डॉ. येशी का जन्म 15 मई, 1927 को लोका क्षेत्र में हुआ
डॉ. येशी का तिब्बत के लोका क्षेत्र में 15 मई, 1927 को जन्म हुआ था। उनका परिवार तिब्बत की चिकित्सा पद्धति के लिए प्रसिद्ध रहा है। 11 वर्ष की आयु में उन्होंने चाकपोरी इंस्टीट्यूट ऑफ तिब्बतन मेडिसिन ल्हासा में दाखिला लिया। नौ वर्ष तक आयुर्वेदिक दवाओं पर अध्ययन किया। 20 साल की उम्र में ही इंस्टीट्यूट ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ के रूप में मान्यता दी और दलाईलामा का निजी चिकित्सक बनाया।
1959 में वह दलाईलामा के साथ भारत आए। डॉ. येशी ने 23 मार्च, 1961 को तिब्बत से भारत में शरणार्थी के रूप में आकर धर्मशाला में तिब्बती चिकित्सा पद्धति की नींव रखी। उन्होंने धर्मशाला में तिब्बतियन मेडिकल एंड एस्ट्रो इंस्टीट्यूट की स्थापना कर तिब्बतियन चिकित्सा पद्धति को आगे बढ़ाया। वह वर्ष 1980 तक दलाईलामा के निजी चिकित्सक के रूप में कार्यरत रहे। उन्होंने 1 अप्रैल, 2019 को आधिकारिक तौर से चिकित्सा पद्धति से संन्यास ले लिया था।