जनजातीय महिलाओं को पैतृक संपत्ति में हक देने पर सुपीम कोर्ट ने लगाया स्टे
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हिमाचल के जनजातीय क्षेत्रों की महिलाओं को पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी देने के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट ने स्टे लगा दिया है। याचिकाकर्ता नवांग और सुनील कारवा की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी किए हैं। बता दें कि हिमाचल हाईकोर्ट ने जनजातीय क्षेत्रों की महिलाओं को भी पैतृक संपत्ति का अधिकार होने का फैसला सुनाया था। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 4 अप्रैल 2016 को प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले के बाद इस मामले पर अपना अंतरिम आदेश जारी किया था।
न्यायाधीश रंजन गोगाई और न्यायाधीश नवीन सिन्हा की डबल बेंच ने यह आदेश जारी कर प्रदेश उच्च न्यायालय के पैरा-63 पर रोक लगा दी है। इसी पैरा के तहत हाईकोर्ट ने 23 जून 2015 को आरएसए संख्या 8/2003 के मामले में चंबा के बहादुर बनाम बरतिया एंड अदर्स में हिंदू सेक्शन एक्ट को आधार मान कर जनजातीय इलाकों में महिलाओं को पैतृक संपत्ति पर अधिकार देने का फैसला सुनाया था।
21 सालों से चल रही कानूनी लड़ाई
अदालतों में इस मसले को लेकर बीते करीब 21 सालों से कानूनी लड़ाई चल रही है। हाईकोर्ट के फैसले के बाद लाहौल के नवांग और सुनील ने 4 अप्रैल 2016 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं की अपील पर तब सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश हाईकोर्ट के पैरा-63 पर दिए गए फैसले पर अंतरिम आदेश जारी किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर अंतिम निर्णय आने तक जनजातीय इलाकों में महिलाओं को पैतृक संपत्ति को लेकर प्रक्रियाओं पर पूरी तक रोक लगा दी है। स्टे आर्डर के बावजूद अगर कोई रेवेन्यू अधिकारी इस मामले से जुडे़ म्यूटेशन को अंजाम देता है तो यह सुप्रीम कोर्ट की अवमानना माना जाएगा।
नवांग और सुनील ने बताया कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में इसके लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी है। प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। अदालत में पक्ष रखा गया कि हाईकोर्ट में जो मामला गया था वह भाई-बहन का विवाद था। इस मामले पर हाईकोर्ट का जो निर्णय आया है उसे जनजातीय इलाकों में लागू करना वाजिब नहीं है।