लोग कहते थे बेटी पराया धन है, मगर उसी ने नाम रोशन किया
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मुझे आज भी याद है जब मेरे पापा के पास मेरी फीस के पैसे तक नहीं होते थे। हमारे घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। पापा को मेरी किताबें खरीदने के लिए पैसे उधार लेने पड़ते थे।
मेरा बचपन बहुत गरीबी में बीता है। इस सब के बावजूद मेरे माता-पिता ने मेरी पढ़ाई में कोई अड़चन नहीं आने दी। यह कहना है चंबा जिले के हलेला गांव की रेखा देवी का। कहती हैं कि शायद वह मेरी जिंदगी का सबसे कठिन दौर था।
मैं ऐसे माहौल में पली-बढ़ी जहां बेटियों को बोझ समझा जाता था। गांव वाले कहते थे कि बेटियां तो पराया धन हैं, दूसरे घर ही जाएंगी।
इन्हें पढ़ा-लिखाकर हमारा क्या फायदा, लेकिन मेरे पिता देशराज और माता रेनकु देवी ने इन सब बातों को नजरअंदाज किया। वे मुझे हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे।
उधार लेकर किताबें खरीदतें थे पिताजी
उस वक्त मेरे पिताजी को महज 1500 रुपये वेतन मिलता था। इन पैसों से घर का गुजारा बहुत मुश्किल से चलता था। कई बार पिताजी को मेरी किताबें खरीदने के लिए पैसे उधार लेने पड़ते थे।
बावजूद इसके उन्होंने कभी मेरी शिक्षा में अड़चन नहीं आने दी। मेरी मां ने भी मुझे पढ़ाने के लिए बहुत संघर्ष किया। वे हमेशा मुझे प्रेरित करती रहीं। जैसे-जैसे में बड़ी हुई, पढ़ाई के प्रति मेरी रुचि और बढ़ती गई।
मैंने जमा दो आर्ट्स संकाय में वर्ष 2013 में हिमाचल में मेरिट में 8वां स्थान हासिल किया। मेरी इस उपलब्धि से गांव के लोगों की सोच में बदलाव आया और उन्होंने भी अपनी बेटियों को अच्छी शिक्षा देने का फैसला लिया।
मैं अभी चंबा कॉलेज से बीए कर रही हूं। मेरे जीवन का एक ही उद्देश्य है कि मैं समाज में बेटियों के प्रति लोगों की सोच को बदलूं।
समाज में कोई भी बेटी अशिक्षित न रहे। जिस तरह आज मेरे माता-पिता मुझ पर गर्व महसूस करते हैं, उसी तरह आपको भी एक दिन अपनी बेटी पर नाज होगा।